Sunday, January 22, 2012

ब्लॉगर भी कम कहां हैं ? Salman Rushdie

ब्लॉगर भी कम कहां हैं ?
1- यहां भी आए दिन नित नए इल्ज़ाम लगाने वाले और नित नए फ़ित्ने फैलाने वाले ब्लॉगर मौजूद हैं। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. के बारे में शायद ऐसी असभ्य बातें तो जयपुर आने और न आने वाले किसी साहित्यकार ने भी न कही होंगी जैसी कि ब्लॉगर आए दिन यहां कहते रहते हैं.
ब्लॉगर मीट में गन्ना चूसने ये भी आते हैं और सम्मान पाते हैं और जिसे देस का ‘गन्ना‘ चूसे हुए अर्सा लंबा गुज़र गया. उसका भी यही मशग़ला रोज़ का है.
ख़ैर ग़लतफ़हमियां दूर करने वाले ब्लॉगर भी यहां है.
यह एक प्लस प्वाइंट है।
देखें -

http://ahsaskiparten.blogspot.com/2012/01/love-jihad.html

2- सलमान रूश्दी के भारत आगमन की चिंता में वे लोग घुल रहे हैं जिन्होंने मक़बूल फ़िदा को वतन से जुदा कर दिया। वाक़ई यह दोहरेपन की बात हुई। यही लोग लव जेहाद का फ़र्ज़ी हौआ खड़ा करते हैं।

♥ ♥ एक अच्छी चर्चा के लिए आपका आभार !
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हमने यह कमेट इस पोस्ट पर दिया है -

साहित्यकार ऐसे होते हैं तो हम ब्लॉगर ही भले...खुशदीप


बॉलीवुड का एक बात के लिए मैं बहुत सम्मान करता हूं कि यहां एक दूसरे को कभी मज़हब के चश्मे से नहीं देखा जाता...सब एक दूसरे से घी-शक्कर की तरह ऐसे घुले-मिले हैं कि कोई एक दूसरे को अलग कर देखने की सोच भी नहीं सकता...बल्कि जब भी देश की एकता या सामाजिक सौहार्द के लिए कोई संदेश देने की ज़रूरत पड़ी तो बॉलीवुड पीछे नहीं हटा....लेकिन समाज को दिशा देने का दावा करने वाले साहित्यकारों का एक वर्ग किस तरह की मिसाल पेश करना चाहता है....जयपुर साहित्य सम्मेलन में विवादित लेखक सलमान रूश्दी के नाम पर जो कुछ हुआ वो किसी भी लिहाज़ से देश के माहौल के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता....
मुझे इस पूरे प्रकरण में आयोजको की मंशा समझ नहीं आई आखिर वो करना क्या चाहते थे...एक तरफ वो कानून के पालन की बात करते हैं, दूसरी तरफ रुश्दी जैसे विवादित लेखक को न्योता देकर पूरे आयोजन को ही हाशिये पर डाल देते हैं...रुश्दी के भारत आने या ना आने का सवाल ही सुर्ख़ियों में छाया रहता है...विवादित किताब के अंशों को पहले मंच से पढने का मौका दिया जाता है, फिर कानून की दुहाई दी जाती है...बहस इस पर हो सकती है कि किसी किताब पर प्रतिबन्ध लगाना सही है या नहीं...बहस इस पर हो सकती है कि किसी लेखक का विचारों कि आज़ादी के नाम पर कहाँ तक लिबर्टी लेना सही है...बहस इस बात पर हो सकती है कि कोई पेंटर देवी-देवताओं की नग्न पेंटिंग बना कर कला का कौन सा उद्देश्य पूरा करता है...लेकिन सब से पहले देश है....यहाँ के कानून को मानना हर नागरिक का फ़र्ज़ है...अगर कोई सोच-समझ कर कानून को तोड़ता है तो फिर उसे नतीजे भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए...

अगर साहित्यकारों का ऐसा चेहरा हैं तो फिर हम ब्लॉगर ही भले हैं जो सांपला जैसी जगह पर मिलते हैं तो बिना किसी भेदभाव सिर्फ प्यार और शांति का सन्देश फ़ैलाने के लिए...
पूरा लेख पढने के लिए लिंक पर जाएँ .

Thursday, January 12, 2012

धार्मिक सद्भाव भी बढ़ाती है सुबह की सैर Morning walk in Deoband

सुबह की सैर का कोई विकल्प नहीं है।
हम इस टिप्पणी के शीर्षक में दी गई एक लाइन लिखकर ही जाने वाले थे कि हमें मौलाना वहीदुदीन ख़ान साहब याद आ गए। उनकी उम्र तक़रीबन 100 साल है और वे आज भी फ़िट हैं। पूरी दुनिया में आ जा रहे हैं। सेंटर फ़ॉर पीस एंड स्प्रिच्युएलिटि चला रहे हैं। ख़ुद भी सकारात्मक हैं और दूसरों को भी सकारात्मक बना रहे हैं। सुबह की सैर उनकी नियमित दिनचर्या का हिस्सा है। उनके चेहरे की आभा देखते ही बनती है।
 www.cpsglobal.org पर आप उनसे आमने सामने रू ब रू भी हो सकते हैं।
इसके बाद हमें याद आ गया देवबंद और देवबंद के याद आते ही हमें यह भी याद आ गया कि सुबह की सैर धार्मिक सद्भाव भी बढ़ाती है।
देवबंद में इस समय 4 हज़ार से ज़्यादा तालिब इल्म इस्लामी मदरसों में शिक्षा पा रहे हैं और उन्हें शिक्षा देने वाले उस्तादों की तादाद भी 300 से ज़्यादा होगी। सहायक स्टाफ़ की गिनती इससे अलग है। छोटे छोटे मदरसों को भी जोड़ा जाए तो गिनती मुश्किल हो जाती है।
शहर के बाहर जंगल में त्रिपुर बाला सुंदरी देवी का मंदिर है और उससे मिला हुआ संस्कृत महाविद्यालय है। वहीं एक बहुत बड़ा कुंड भी है जिसे देवीकुंड भी कहते हैं और उसमें बड़ी बड़ी मछलियां भी बहुत हैं। कुंड के पास एक फूलों से भरा हुआ बग़ीचा भी है।
शहर के एक किनारे पर लालक़िला और ताजमहल की याद दिलाने वाले मदरसों की इमारतें हैं तो दूसरी तरफ़ मंदिर और गुरूकुल और शहर भर में मंदिर मस्जिद पास पास तो हैं ही और कहीं कहीं तो बहुत ही पास पास हैं। मिले हुए भी हैं। मदरसों के उस्ताद अपने शिष्यों के साथ घूमते हुए देखे जाएं तो एक अच्छा अनुभव होता है। उस्ताद तो देवीकुंड की तरफ़ नहीं जाते लेकिन मदरसों के छात्र रोज़ाना ही उधर जाते हैं। कितने भी कम जाएं फिर भी तादाद बहुत हो जाती है। हिंदू आचार्य और आम शहरी हिंदू भाई भी घूमने के लिए और अपने मेहमानों को दिखाने के लिए दारूल उलूम की तरफ़ चले आते हैं।
इस तरह एक संस्कृति का दूसरी संस्कृति से परस्पर मिलन होता है और सारी आशंकाएं स्वतः ही निर्मूल हो जाती हैं। देवबंद एक धार्मिक नगरी मानी जाती है। हिंदू और मुस्लिम, दोनों के ही मंदिर, मस्जिद और दरगाहें यहां हैं। इसके बावजूद यहां धार्मिक सदभाव बना हुआ है।
आज आपका लेख पढ़कर ध्यान आया कि इसके पीछे सुबह की सैर का भी बड़ा योगदान है।
सुबह की सैर से ज्ञान भी मिलता है और दिल की दुनिया में प्रेम के अंकुर भी फूटते हैं। सुबह की सैर मन को निर्मल भी करती है।
‘उपचार की सहज वृत्ति‘ एक अंग्रेज़ी किताब का अनुवाद है। इसमें बहुत पहले हमने एक मनोचिकित्सक के बारे में पढ़ा था कि उसके पास अवसाद का एक मनोरोगी आया। उसके लिए कोई भी दवा कारगर नहीं हो पा रही थी। तब उसे एक विशेष मनोचिकित्सक के पास भेजा गया। उसने उसे कहा कि आप सुबह उस वक्त उठ जाएं जबकि अंधेरा हो और आप पौ फटने के क़ुदरती सीन को देखा करें। उसने ऐसा ही किया और कुछ दिनों बाद उसका अवसाद बिना किसी दवा के ही ठीक हो गया।
इंसान अगर अपनी बायो क्लॉक (जैव घड़ी) का पालन करे जैसे कि दूसरे पशु-परिंदे करते हैं तो वह बहुत सी बीमारियों से बचा रहेगा। जो लोग बीमार हो चुके हैं। उनके लिए बहुत ज़रूरी है कि वे अपनी दवा गोली के साथ अपना सोना जागना ठीक कर लें और नियमित रूप से सैर किया करें।
वाक़ई सुबह की सैर का कोई विकल्प नहीं है।
एक अच्छा लेख पढ़वाने के लिए आपका शुक्रिया !

A Visit to Darul Uloom Deoband - Masjid e Qadeem,Masjid e ...

www.youtube.com/watch?v=vpimOU_sMjY19 Mar 2011 - 19 min - Uploaded by bismillahnews
A Visit to Darul Uloom Deoband - Masjid e Qadeem,Masjid e Rasheed,Qasmi Qabristan ...

कुमार राधा रमण जी के ब्लॉग पर  डॉ. आभा पंडित का लेख भी देखिए जिस पर हमने यह टिप्पणी दी है-

मॉर्निंग वाक का कोई विकल्प नहीं

आप चाहें तो सारा दिन कसरत करें, लेकिन सुबह की सैर का कोई विकल्प नहीं है। रात को सो चुकने के बाद आप तरोताजा रहते हैं। थकान नहीं रहती और मन से भी प्रफुल्लित रहते हैं। ऊषाकाल में पैदल चलने पर आपके फेफड़ों में ताजी और ऑक्सीजन से भरपूर हवा भरती है। दिन भर के लिए ऊर्जा भी इसी दौरान हासिल की जाती है। 
दो-तीन महीनों तक नियमित सुबह की सैर और जीवनशैली में परिवर्तन करने के बाद कराए गए परीक्षणों में वह नॉर्मल पाया गया। सुबह जल्दी उठने की हिदायत होने के कारण मरीज की रात की पार्टीज बंद हो गई। वह समय पर सोने लगा। भरपूर नींद से थकान दूर होकर सुबह शरीर तरोताजा रहने लगा। ४० मिनट तक तेज गति से पैदल चलने के कारण शरीर में रक्तसंचार तेज हो गया और खराब कोलेस्ट्रॉल की मात्रा घट गई। सुबह पैदल चलने के दौरान हुए आत्म-मंथन ने उसके सोचने की दिशा बदल दी। उसका तनाव घटने लगा और वह ज्यादा खुश रहने लगा। फेफड़ों में भरपूर ऑक्सीजन भरने के कारण रक्त शुद्धि हो गई और शरीर से विषैले पदार्थों का निष्कासन होने लगा। त्वचा अधिक चमकदार हो गई। आज चिकित्सक उनके पास आने वाले दस में से सात मरीजों को प्रातःकाल कम से कम ४० मिनट तक तेज चाल में चलने की सलाह देते हैं। पैदल चलने से श्वास गति, हृदय गति तथा रक्तचाप पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। जठराग्नि तेज होती है, पाचन प्रणाली अधिक सक्रिय हो जाती है। भूख भी बढ़ती है। 
मयंक (२८) एक आईटी कंपनी में एक्जीक्यूटिव है। वह लगभग १२ घंटे काम करने के बाद भी थकता नहीं है। अक्सर देर रात तक दोस्तों के साथ आउटिंग भी करता है। दूसरों को हमेशा एकदम फिट नजर आता है। कंपनी द्वारा कराए गए वार्षिक एक्जीक्युटिव चैकअप में मयंक के बारे में डॉक्टरों की राय एकदम विपरीत निकली। परीक्षण के नतीजों से जाहिर हुआ कि उसका रक्तचाप बढ़ा हुआ है और कोलेस्ट्रॉल भी खतरे के निशान से ऊपर है। डॉक्टरों ने उसे अनेक दवाइयाँ लिखने के साथ ढेर सारी हिदायतें भी दे डालीं, जिनमें खान-पान में अनेक परहेज के साथ-साथ सुबह की सैर भी शामिल थी। मयंक के साथ उसके सभी साथी आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे कि "एकदम फिट" दिखने वाला इंसान एकाएक दिल की बीमारी के जोखिम के इतने करीब कैसे पहुँच गया? 


कैसे चलें... 
मार्निंग वॉक का पूरा फायदा उठाने के लिए शरीर बिलकुल सीधा तथा तना हुआ होना चाहिए। टहलते समय मुँह बिलकुल बंद हो तथा साँस पूरी तरह नाक से ही लें। मार्निंग वॉक एक प्राकृतिक प्रशांतक है। इससे मस्तिष्क से उठने वाली विभिन्ना लहरें तनावरहित होकर शिथिल हो जाती हैं। इससे मन-मस्तिष्क को सुकून प्राप्त होता है। स्वभाव भी प्रसन्नाचित्त रहने लगता है। मार्निंग वॉक से मस्तिष्क में एन्डोर्फिन हार्मोन स्रावित होता है, जिससे हमारे स्वभाव में परिवर्तन आता है तथा सकारात्मक भावनाएं पैदा होती हैं। यदि पति-पत्नी साथ-साथ टहलते हैं,तो उनमें अंतरंगता बढ़ती है तथा उनमें "मैं" के स्थान पर "हम" के भाव पैदा होते हैं। साथ ही,उनमें परस्पर सहारा देने की भावना और परस्पर विश्वास के भावों में भी स्थायित्व आने लगता है। हम जैसे ही मॉर्निंग वाक के लिए बाहर निकलते हैं, घर के वातावरण,जिम्मेदारियों तथा तनाव को पैदा करने वाले कारकों से चाहे अस्थायी रूप से ही सही,परन्तु कुछ देर के लिए मुक्ति जरूर पा जाते हैं।


अवसाद पर विजय पाने का यह भी एक सरल तरीक़ा है। दूसरी ओर,यदि हम समूह में टहलते हैं तो आपस में हंसी मज़ाक होता है,जिससे हमारा मनोदैहिक स्वास्थ्य सुधरता है। अनुसंधानों से मालूम हुआ है कि हंसने से रक्तसंचार तेज़ होता है,जिससे दिमागी समस्याओं से पीड़ित रोगियों को लाभ होता है क्योंकि रक्तसंचार में वृद्धि होने से मस्तिष्क को अधिक ऑक्सीजन तथा ग्लूकोज प्राप्त होता है। सकारात्मक भावनाओं का संचार होता है। भावनाओं का हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता से गहरा संबंध होता है। विशेषज्ञों की राय में,आशावादी व्यक्ति तनाव का अनुभव कम करते हैं। इससे रोग प्रतिरोधी क्षमता उत्तम बनी रहती है। ब्लड प्रेशर कोलेस्ट्रॉल,मोटापा आदि बढ़ा हुआ हो,तो चिकित्सक की सलाह लेने के बाद ही वॉक पर जाएं(डॉ. आभा पंडित,सेहत,नई दुनिया,जनवरी 2013 प्रथमांक)

Wednesday, January 11, 2012

कब वह समय था जब आपकी नज़र में यहां बराबरी और इंसाफ़ के गुणों से भरे पूरे लोग बसते थे ?

पल्लवी जी ! आपका लेख बहुत अच्छा है और हम सभी को यह ज़रूर सोाचना चाहिए कि हम अपने देश और अपने समाज के लिए क्या कर रहे हैं ?
हमारे अंदर इंसानियत कितनी है ?

लेकिन इसी के साथ आपने कहा है कि हमारे देश की संस्कृति के मूल आधार अब हमारे पास नहीं रहे।

आपको इन्हें स्पष्ट करना चाहिए था।
इस देश की संस्कृति के मूलाधार आपकी नज़र में क्या हैं ?
और वे इस देश में कब थे ?
कब वह समय था जब आपकी नज़र में यहां बराबरी और इंसाफ़ के गुणों से भरे पूरे लोग बसते थे ?
वह कौन सा समय था जब यहां औरत और कमज़ोर वर्ग आनंद मना रहे थे ?
उस समय की संस्कृति को चिन्हित करने के बाद ही उस काल की संस्कृति की पनर्स्थापना का प्रयास किया जा सकता है।
देखिये  पल्लवी  जी  का  लेख 
आज आज़ादी के इतने सालों बाद भी मुझे तो ऐसा लगता है कि आगे बढ़ने के बाजये और पिछड़ गए हैं हम, क्यूंकि हमारी संस्कृति के मूल आधार ही अब हमारे नहीं रहे। जिसमें झलकती थी हमारे देश कि संस्कृति और सभ्यता की खुशबू अब उसकी जगह ले ली है आपसी मतभेद और नकल ने फिर उसका क्षेत्र चाहे जो हो वो मायने नहीं रखता। जिस देश के नेता भ्रष्ट हों ,जिस देश कि आने वाली नस्लें खुद अपना ही देश छोड़ के जाने पर आमादा हों, जिस देश के लोगों में अपनी मात्र भाषा को लेकर द्वंद मचा रहता हो। क्या ऐसे देशवासियों को अधिकार है राष्ट्रीय त्योहार मनाने का आज़ादी के गीत गाने का ???? खुद को सच्चा हिन्दुस्तानी कहने का ...??? यदि मेरे इन सवालों का कोई जवाब आपके पास हो तो कृपया ज़रूर अवगत करायें ....

Thursday, January 5, 2012

नास्तिक विचार इंसान को भ्रष्टाचार की प्रेरणा देता है। Atheist

@ भाई सुज्ञ जी ! वाक़ई आपने हक़ीक़त बयान की है। डर इंसान की प्रवृत्ति का अंग है। उसका सही इस्तेमाल किया जाए तो एक अच्छे चरित्र का निर्माण किया जा सकता है। हरेक इंसान को अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल भोगना ही है। इसीलिए कुछ भी करने से पहले उसे उसके फल के बारे में ज़रूर सोच लेना चाहिए।
क़ुरआन में कहा गया है-
ऐ ईमान वालो! परमेश्वर का डर (तक़वा) इख्तियार करो और हर आदमी को देखना चाहिये कि उसने आने वाले कल के लिए आगे क्या भेजा है ? और डरो परमेश्वर से निस्संदेह परमेश्वर को उन तमाम कामों की ख़बर है जो तुम करते हो । -पवित्र कुरआन, 59, 18
 
आदमी का स्वभाव है कि वह काम का अंजाम चाहता है। परमेश्वर ने उसे उसके स्वभाव के अनुसार ही शिक्षा दी है कि हरेक आदमी को चाहिए कि वह पहले फल की चिन्ता करे ताकि उसका काम फलप्रद हो। जो भी उपदेशक आदमी को फल से बेफ़िक्र करता है दरअस्ल वह उसका दिल काम से ही उचाट कर देता है।

आपने बिल्कुल सही कहा है कि ‘नास्तिक सदाचार के पांव ही नहीं हैं।‘
झूठ के पांव होते भी नहीं हैं।
नास्तिकता के पांव तो क्या, शायद सिर भी नहीं होता वर्ना इंसान की प्रवृत्ति को तो नास्तिक जान ही लेते। जब ये लोग इंसान के दिल से डर ही निकाल देते हैं कि कर्मों का फल देने वाली कोई अलौकिक व्यवस्था नहीं है तो फिर लोग ऐसी जगह जुर्म करने से क्यों डरेंगे, जहां क़ानून के हाथ पहुंचते ही नहीं या वे उसे भी ख़रीदने की ताक़त रखते हैं। इस तरह ताक़तवर के लिए डरने की कोई वजह नहीं रह जाती।
आपके इस लेख की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है।
Fruit n work हरेक आदमी को चाहिए कि वह पहले फल की चिन्ता करे ताकि उसका काम फलप्रद हो।
http://vedquran.blogspot.com/2010/05/fruit-n-work.html

अब आप सुज्ञ जी की पोस्ट भी देखें :

ल मैने चर्चा के दौरान कहा था कि “नास्तिक-सदाचार अपने पैरों पर क्या खड़ा होगा? उस सदाचार के तो पैर ही नहीं होते”।

हमारे में सभी सद्गुण भय से ही स्थायित्व पाते है। भय प्रत्येक जीव की प्राकृतिक संज्ञा है। ईश्वर-आस्तिक को ईश्वर के नाराज़ होनें का भय रहता है। कर्म-फल-आस्तिक को बुरे प्रतिफल मिलने का भय रहता है। तो नास्तिक को बुरा व्यक्तित्व कहलाने का भय रहता है। इसी भय से सभी सदाचारी रहना उचित मानते है। आस्तिको को ईश्वर और कर्म-फल का आधार रहता है। उन्हें सदाचार की प्रसंसा और प्रतिफल अगर त्वरित नहीं मिलते तो आस्तिक सब्र कर लेता है। और निर्णायक दिन या अगले जन्म का इन्तजार कर लेता है। 

किन्तु भौतिकवादी नास्तिक, सदाचार के प्रतिफल में अनुकूल परिणाम न मिलने पर निराश होकर सदाचार से पल्ला झाड़ लेता है। इसप्रकार सदाचार पर टिके रहने को उसके पास पर्याप्त आधार नहीं होता। उसी आशय से मैने कहा था, “नास्तिकी सदाचार के पैर ही नहीं होते”

चुकिं सदाचार घोर परिश्रम, सहनशीलता और धैर्य मांगता है। कईं बार उपकार का बदला अपकार से मिलता है। कईं बार सदाचारी कायरों में गिन लिया जाता है। तो कभी भयभीत भी मान लिया जाता है। सदाचारी के शत्रुओं की संख्या भी बढ जाती है। कभी अपकीर्ती भी आरोपित हो जाती है। इस मार्ग पर डटे रहना तलवार की धार पर चलनें के समान है।

कर्म-फल पर विश्वास करता हुआ आस्तिक इस विश्वास के साथ अटल रहता है कि देर-सबेर मुझे अच्छे कर्मों का प्रतिफल अच्छा ही मिलना है। आज नहीं तो कल, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में। मै अपने सब्र की डोर न छोडूं। वह दृढता से निभाता चला जाता है। इसी आत्मबल के कारण सदाचार निभ भी जाते है।

वहीं प्रतिकूल परिस्थिति में नास्तिक के सब्र का बांध टूट जाता है। भलाई का बदला बुराई से मिलते ही उसके भौतिक नियमों में खलबली मच जाती है। वह सोचता है तब तो सदैव सदाचार का बदला बुरा ही मिलता है। फिर क्यों वह अनावश्यक सदाचार निभाकर दुख पीड़ा और प्रतीक्षा मोल ले? धर्मग्रंथों से मिलने वाली उर्ज़ा के अभाव में, नास्तिक-सदाचार वह लम्बी दौड नहीं दौड सकता। स्टैण्ड़ विहिन इस नास्तिक-सदाचार को मैनें पैर रहित पाया। बिना आधार के वे सदाचार किसके पैरों पर खड़े होंगे? http://shrut-sugya.blogspot.com/2011/06/blog-post.html

Monday, December 5, 2011

औरत का मक़ाम


जो दे न सके
वह कंगाल है
पुरूष वह है
जो देता है
न देने वाले भी
अमृत बरसाते हैं
फूटते हैं नए अंकुर
मिलता है संतान सुख
जो कि सबसे बड़ा है
अपने वुजूद की मंज़िल
पाना बड़ा है
औरत को मर्द
यहीं तक पहुंचाता है।
वह न चाहे,
तब भी।
औरत का घर
उसका मक़ाम
यही तो है
कोई छत या दीवार नहीं
कोई धरा या आकाश नहीं।
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आज हमने रश्मि प्रभा जी की रचना पढ़ी तो हमारे मन में यह आया।
क्या आप सहमत हैं ?
पढ़िए आप रश्मि प्रभा जी की रचना का एक अंश

पुरुष और स्त्री


एक स्त्री बचपन से घर का सपना देखती है
दहलीज से आँगन तक
अपनी पायल के मोहक रुनझुन में
वह खुद को तलाशती है
जिम्मेदारियां उसे तीर्थ लगती हैं
सुबह से रात की परिक्रमा में
वह कुछ शब्द चाहती है -
प्यार के
एहसास के
सम्मान के ....
जिससे वह सर्वथा वंचित होती है !
सबकुछ खोकर
एक घर के लिए
साँसों की माला पे अपने घर को ही जपती है
तब तक - जब तक उसकी आँखें शुष्क न हो जाएँ
सोच शमशान न बन जाए .....

Monday, November 28, 2011

वैदिक यज्ञों में पशुबलि पर एक टिप्पणी

निरामिष: वैदिक यज्ञों में पशुबलि---एक भ्रामक दुष्प्रचार 
नामक यह पोस्ट स्वयं ही भ्रामक है.

वैदिक यज्ञों में पशुबलि पर विचार करके आपने एक अच्छी पहल की है।
इस विषय पर पिछले काफ़ी समय से चर्चा होती आ रही है और हरेक विद्वान ने इस विषय पर विचार किया है कि
क्या वैदिक यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी ?
और अगर दी जाती थी तो फिर उसे बौद्धों और जैनियों के विरोध के कारण छोड़ क्यों दिया गया ?

क्या हिन्दू कभी गोमांस नहीं खाते थे ?

प्रत्येक हिन्दू इस प्रश्न का उत्तर में कहेगा नहीं, कभी नहीं। मान्यता है कि वे सदैव गौ को पवित्र मानते रहे और गोह्त्या के विरोधी रहे।

उनके इस मत के पक्ष में क्या प्रमाण हैं कि वे गोवध के विरोधी थे? ऋग्वेद में दो प्रकार के प्रमाण है; एक जिनमें गो को अवध्य कहा गया है और दूसरा जिसमें गो को पवित्र कहा गया है। चूँकि धर्म के मामले में वेद अन्तिम प्रमाण हैं इसलिये कहा जा सकता है कि गोमांस खाना तो दूर आर्य गोहत्या भी नहीं कर सकते। और उसे रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहन, अमृत का केन्द्र और यहाँ तक कि देवी भी कहा गया है।

शतपथ ब्राह्मण (३.१-२.२१) में कहा है; “..उसे गो या बैल का मांस नहीं खाना चाहिये, क्यों कि पृथ्वी पर जितनी चीज़ें हैं, गो और बैल उन सब का आधार है,..आओ हम दूसरों (पशु योनियों) की जो शक्ति है वह गो और बैल को ही दे दें..”।
इसी प्रकार आपस्तम्ब धर्मसूत्र के श्लोक १, ५, १७, १९ में भी गोमांसाहार पर एक प्रतिबंध लगाया है। हिन्दुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया, इस पक्ष में इतने ही साक्ष्य उपलब्ध हैं।

मगर यह निष्कर्ष इन साक्ष्यों के गलत अर्थ पर आधारित है।
ऋग्वेद में अघन्य (अवध्य) उस गो के सन्दर्भ में आया है जो दूध देती है अतः नहीं मारी जानी चाहिये। फिर भी यह सत्य है कि वैदिक काल में गो आदरणीय थी, पवित्र थी और इसीलिये उसकी हत्या होती थी।
श्री काणे अपने ग्रंथ धर्मशास्त्र विचार में लिखते हैं;”
ऐसा नहीं था कि वैदिक काल में गो पवित्र नहीं थी। उसकी पवित्रता के कारण ही वजसनेयी संहिता में यह व्यवस्था दी गई है कि गोमांस खाना चाहिये। “

♥ ऋग्वेद में इन्द्र का कथन आता है (१०.८६.१४), “वे पकाते हैं मेरे लिये पन्द्र्ह बैल, मैं खाता हूँ उनका वसा और वे भर देते हैं मेरा पेट खाने से” ।
♥ ♥ ऋग्वेद में ही अग्नि के सन्दर्भ में आता है (१०. ९१. १४)कि “उन्हे घोड़ों, साँड़ों, बैलों, और बाँझ गायों, तथा भेड़ों की बलि दी जाती थी..”

Thursday, October 6, 2011

अवज्ञा का अंजाम दंड के सिवाय क्या है ?

नास्तिकों ने बता दिया है कि ईश्वर होता नहीं है
और सत्ता पर काबिज लोगों का कानून कुछ बिगाड नहीं पाता।
सो न तो ये लोग ईश्वर-अल्लाह के प्रकोप से डरते हैं और न ही ये कानून से डरते हैं।
ये किसी से नहीं डरते और जो भी इन्हें सुधरने के लिए कहता है उसे ये जेल के भीतर कर देते हैं, चाहे अन्ना हो या संजीव भट्‌ट।
गरीबों की उपेक्षा असंतोष को जन्म देगी और अंसतोष से बगावत पैदा होगी, उसमें भी जनता ही मरेगी।
उसके बाद फिर जो सरकार बनेगी, उसमें फिर खुदगर्ज और बेईमान लोग कुर्सियों पर कब्जा जमा लेंगे।
हालात अब ऐसे हैं कि अब इंसान की अक्ल फेल है और फिर भी वह खुदा पर ईमान लाने के लिए और उसकी आज्ञा मानने के लिए तैयार नहीं है।
अवज्ञा का अंजाम दंड के सिवाय क्या है ?
वही मिल रहा है।
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देखिये 

गरीबी ----- एक आकलन



देश के गरीबों में भी एच आई जी, एम आई जी और एल आई जी निर्धारण करने की बहस आजकल जोर शोर से चल रही है ! गरीबों में गरीब यानी की महा गरीब की प्रतिदिन आय ३२ रुपये तय हो या अधिक इस पर सरकार ने खूब समय और धन व्यय किया है ! जब एक बार यह तय हो जायेगा तब इस पर विचार किया जायेगा कि इन दुखी लोगों की किस तरह और क्या मदद की जाये ! आखिर इसमें भी लंबा समय लगेगा ही ! अंत में यह सहायता भी तो उसी पाइप लाइन से गरीबों को उपलब्ध कराई जायेगी जिसमें भ्रष्टाचार के अनेकों छेद हैं और जिनसे लीक होकर सारा धन असली हकदारों तक पहुँचने से पहले ही काफी मात्रा में बाहर निकल जाता है ! यह सब ड्रामा उसी प्रकार है जिस तरह हमें पता होता है कि बाढ़ हर साल आनी ही है इसलिए बाढ़ पीड़ितों के लिये नाव, कम्बल और आटे दाल का प्रबंध तो किया ही जाना है परन्तु बाढ़ रोकने के लिये क्षतिग्रस्त बाँधों की मरम्मत और नये बाँध बनाने का कोई उपाय नहीं किया जाता !
गरीबों और महा गरीबों को पहचान कर फौरी मदद पहुँचाने की कोशिश अपनी जगह है पर सरकार का प्रमुख लक्ष्य गरीबी हटाना होना चाहिये ! गरीब को गरीब ही रख कर उसको सस्ता अनाज खिलाना ही सरकार का एकमात्र कर्तव्य नहीं होना चाहिये ! यह काम तो तत्काल हो ही जाना चाहिये क्योंकि हमारे पास अनाज सरकारी गोदामों में भरा पड़ा है और सड़ रहा है जिसको रखने तक के लिये जगह नहीं है ! लेकिन प्रमुख समस्या है लोगों की गरीबी दूर करना !
इस समस्या का हल ऐसे लोगों के लिये रोज़गार पैदा करना है जो शिक्षा से तो वंचित हैं ही उनके पास ज़मीन व धन भी नहीं हैं जिसकी सहायता से वे कोई रोज़गार कर सकें ! ऐसे गरीबों की आमदनी का सिर्फ एक ही ज़रिया है और वह है किसी कारखाने अथवा निर्माण स्थल पर मजदूरी करना या खेत खलिहानों में नौकरी करना क्योंकि इन सभी स्थानों में अकुशल या अप्रशिक्षित व्यक्ति भी खप जाते हैं ! अब करना यह है कि ऐसे प्रोजेक्ट्स को चिन्हित किया जाये और उन्हें बढ़ावा दिया जाये जिसमें गरीब तबके के लोगों को बड़ी मात्रा में काम मिल सके !
व्यापार के क्षेत्र में वैश्वीकरण की नीतियों ने हमारे देश में बड़ा विप्लव ढाया है ! भारत का सारा बाज़ार चीनी सामानों से भरा पड़ा है ! यही सामान अगर हमारे देश में बने तो यहाँ के लोगों के लिये रोज़गार के अवसर बढ़ें और हमारे देश में औद्योगीकरण को सहारा मिले लेकिन सरकार की दोषपूर्ण नीतियों के कारण यह संभव नहीं हो पाता ! चीन से आयातित सामान जिस कीमत पर बाज़ारों में उपलब्ध है वही सामान अपने देश में जब हम बनाते हैं तो उसकी कीमत कहीं अधिक बैठती है ! चीन अपने देश के बने हुए सामान को भारत और विश्व में सस्ता बेचने के लिये अपने उद्योगों को सस्ती बिजली, सस्ता कच्चा माल व सस्ती सुविधाएँ उपलब्ध कराता है ! इसी की वजह से वहाँ के उत्पादों की बिक्री बढ़ती है और अधिक से अधिक चीनी जनता को रोज़गार के अवसर मिलते हैं ! इसके विपरीत हम इस सस्ते सामान को इम्पोर्ट कर अपने उद्योगों की कठिनाइयों को बढ़ा रहे हैं ! इस तरह ना सिर्फ हम अपने देश के हुनरमंद कामगारों को बेरोजगार बना कर घर बैठा रहे हैं बल्कि उनके आत्मसम्मान को चोट पहुँचा कर उन्हें महा दरिद्रों की श्रेणी में पहुँचा रहे हैं ! अपने देश में व्यापारी को ना सिर्फ अपने लिये कमाना पड़ता है बल्कि उसे अपने सिर पर सवार नौकरशाह और चिर क्षुधित नेताओं की भूख मिटाने के लिये भी जोड़ तोड़ करनी पड़ती है ! नतीजतन भारत के उत्पाद अपने देश में ही मंहगे हो जाते हैं !
यह ध्यान देने की बात है कि इतना संपन्न अमेरिका मात्र 9% बेरोजगारी से चिंतित है और इसे अपनी सरकार की असफलता मान रहा है ! अपने देश में तो यदि परिवार में एक व्यक्ति भी रोज़गार में लगा है तो उस परिवार को बेरोजगार नहीं माना जाता ! हकीकत तो यह है कि हमारे देश में काम करने योग्य जन शक्ति का 40% तो पूर्ण रूप से बेरोजगार है और बाकी 30% आंशिक रूप से व बचे हुए 30% ही पूर्ण रूप से बारोजगार हैं !
लेकिन इस समस्या का हल भी मुश्किल नहीं है ! नीतियों का बदलाव ज़रूरी है ! ऐसे उपक्रम जिसमें अधिक से अधिक मैन पावर का इस्तेमाल हो उन्हें बढ़ावा मिलना चाहिये ! कच्चे माल पर और सुविधाओं पर अनावश्यक टैक्स नहीं लगने चाहिये ! ऑटोमैटिक मशीनों का इस्तेमाल सिर्फ उसी दशा में किया जाना चाहिये जिसमें बेहतर गुणवत्ता का लाभ मिल रहा हो और वह ज़रूरी भी हो ! उदाहरण के लिये हथकरघे से बुनी चादरें, परदे और तौलिए आदि यदि हमको सस्ते बनाने हैं तो कपास, लघु उद्योगों में काम आने वाली बिजली आदि व अन्य सुविधाओं को सस्ता करना होगा ! शायद इसके लिये सब्सीडी भी देनी पड़ेगी ! इस तरह की वस्तुओं को आयातित वस्तुओं के अनहेल्दी कम्पीटीशन से बचाने के लिये उचित नीतियां भी बनानी होंगी ! मकसद सिर्फ एक है कि हमारी जनता को रोज़गार मिले और गरीबी दूर हो ! हो सकता है कि इससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़े लेकिन वह दबाव निश्चित रूप से उस भार से तो कम ही होगा जो गरीबों के नाम से सब्सीडी देने के लिये खर्च किया जायेगा क्योंकि परिपाटी के अनुसार इस योजना में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला तो रहेगा ही रहेगा !
सबसे महत्वपूर्ण बात जो होगी वह यह है कि रोज़गार मिलने पर हमारे देश के गरीब का आत्मसम्मान बढ़ेगा और वह महसूस करेगा कि उसने अपनी मेहनत से रोटी कमाई है ना कि महा दरिद्र की श्रेणी में खड़े होकर सरकारी राशन भीख में माँग कर अपना पेट भरा है !

साभार : साधना वैद जी