Showing posts with label 'मनोरंजन'. Show all posts
Showing posts with label 'मनोरंजन'. Show all posts

Saturday, September 3, 2011

नफ़रत दिल में रखने के बाद आप किसी भी सच्चाई को नहीं समझ सकते

आज एक भाई का लेख पढ़ा जो वास्तव में एक ग़ैर मुस्लिम भाई हैं लेकिन दावा करते हैं कि उन्होंने देवबंद के मदरसे से क़ुरआन और हदीस की तालीम हासिल की है और उनका हाल यह है कि इस्लाम की पारिभाषिक शब्दावली को भी ठीक से नहीं लिख सकते।
एक पोस्ट में उन्होंने वाक़या ए मैराज पर ऐतराज़ जताया है और पैग़ंबर साहब स. को सताने वाले ज़ालिमों को सत्य का पुजारी घोषित कर दिया है।
यह हिंदी ब्लॉगिंग है, यहां कोई भी ब्लॉगर कुछ भी कर सकता है लेकिन हक़ीक़त यह होती है कि वे दूसरों का तो क्या अपना भी भला नहीं कर सकते। जो सत्य को असत्य कह दे नफ़रत की वजह से, उसका भला तब तक हो भी नहीं सकता जब तक कि वह नफ़रत को दिल से निकाल न दे।
हमने उनसे कहा कि 
एस. प्रेम जी ! आपके लहजे से इस्लाम और इस्लाम के पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. के लिए कितनी घोर घृणा टपक रही है, इसे हरेक पाठक पहली ही नज़र में जान लेता है।
इस तरह घृणा दिल में रखने के बाद आप किसी भी सच्चाई को नहीं समझ सकते।
मैराज हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पेश आई। उसे बेशक आपने नहीं देखा और आप क़ुबूल भी कर सकते हैं और इंकार भी कर सकते हैं लेकिन हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अरब समाज में बिना सूद क़र्ज़ के लेन देन की व्यवस्था की जो कि आज भी दुनिया के सबसे विकसित देश अपने नागरिकों के लिए नहीं कर पाए हैं।
उन्होंने लड़कियों के जीवित गाड़े जाने की प्रथा का पूरी तरह ख़ात्मा कर दिया।
लोगों को ग़ुलाम आज़ाद करने की प्रेरणा दी।
ग़रीबों और ज़रूरतमंदों का हक़ मालदारों के माल में मुक़र्रर किया जिसे मुसलमान आज उनके जाने के लगभग 1400 साल बाद भी निभा रहा है।
इस तरह के बहुत से काम उनके जीवन में देखे जा सकते हैं।
इन कामों को दुनिया के जिस चिंतक ने भी देखा, उसी ने सराहा।
लेकिन आपने इन सब कामों को नज़रअंदाज़ कर दिया।
जैसे ये काम कुछ भी हैसियत न रखते हों।
ऐसा काम वही आदमी करता है जिसके दिल में कूट कूट कर नफ़रत भरी हो और जिसे सत्य की तलाश न हो।
जिन लोगों ने मुहम्मद साहब को उनके शहर में तरह तरह से तकलीफ़ें बिना बात दीं और फिर मक्का से निकाल दिया, उन्हें आपने सत्य का पुजारी घोषित कर दिया ?
अगर ये सत्य के पुजारी थे तो फिर ये सत्य से क्यों फिर गए और थोड़े दिन बाद ही मुसलमान हो गए। पूरा मक्का ही मुसलमान हो गया और आज तक वहां मुसलमान ही हैं और आज भी वहां बिना सूद के ही लेन देन होता है और ज़कात का सिस्टम आज भी क़ायम है।
आप ख़ुद को ज़्यादा लायक़ समझते हैं तो इससे बेहतर व्यवस्था इस देश में या कम से कम अपने गांव देहात में ही स्थापित करके दिखाएं।
मालिक आप पर दया करे,

आमीन !
आप शिक्षित और सभ्य हैं। ज्ञान की बात के अवसर पर इस तरह अज्ञान की बातें करना महान आर्य परंपरा पर कलंक लगाना है। अतः आपसे हमारी विनम्र विनती है कि हमारा काम आपसी नफ़रतों को मिटाना है और इसके लिए आपस में एक दूसरे की परंपराओं और मान्यताओं को जानना बहुत ज़रूरी है। हमारे स्वभाव को समझने के लिए आप यह पोस्ट देखिए
हमारा यह प्रयास कैसा लगा ?
आप भी बताइयेगा।
देखिए अलग-अलग लेखकों के कुछ लिंक्स :
1- अच्छी टिप्पणियाँ ही ला सकती हैं प्यार की बहार Hindi Blogging Guide (22)
http://hbfint.blogspot.com/2011/08/hindi-blogging-guide-22.html

2- औरत हया है और हया ही सिखाती है , ‘स्लट वॉक‘ के संदर्भ में
http://hbfint.blogspot.com/2011/08/blog-post_5673.html 
------------------------

Saturday, August 13, 2011

हमारे बेटे अमन ख़ान की पैदाइश पर Welcome And Prayer

ब्लॉगर के बेटे के जन्म का चर्चा Amn Khan
अच्छाई और बुराई, दोनों ही ख़सलतें हरेक इंसान के अंदर मौजूद होती हैं।
समाज में अमन तब आएगा जब इंसान के अंदर ईमान आएगा, ईमानदारी आएगी।
ईमानदारी की पहली पहचान यह है कि इंसान जिस बात को अपने लिए पसंद करे , दूसरों के लिए भी वही बात पसंद करे।
जो आदमी किसी को दो बोल शुभकामनाओं के भी न दे सके, वह दूसरों को कुछ और भला क्या दे सकता है ?
...हम ख़ुशनसीब हैं कि हमारे बेटे अमन खान की पैदाइश पर मासूम साहब को ख़ुशी हुई और उन्होंने एक लेख लिखकर अपनी ख़ुशी में बहुत से लोगों को शरीक किया और उन्होंने हमारे बेटे को अपना प्यार और आशीर्वाद दिया। कुछ भाई बहनों ने दूसरी पोस्ट्स पर भी अपनी नेक ख्वाहिशात का इज़्हार किया है।
इसके लिए हम अमन से प्यार करने वाले सभी भाई बहनों के तहे दिल से शुक्रगुज़ार हैं।
अल्लाह हम सबको अमन की राह चलाए और हमारी नस्लों को इसी राह का वारिस बनाए,
आमीन ! 
See my comment : 
http://www.amankapaigham.com/2011/08/blog-post_10.html?showComment=1313279550196#c4068502343906902771

Sunday, May 15, 2011

डा. दिव्य जी, बुलंद हौसला दिलाएगा आपको मुश्किलों पर विजय

@ डा. दिव्य जी ! आपका हौसला तोड़ते होंगे वे हार्मोनजीवी , जिन्होंने आपसे कोई उम्मीद ख़ामख़्वाह पाल ली होगी ।
मैं तो ऐसे लोगों को अपनी ब्लॉग रूपी फ़सल में खाद की तरह इस्तेमाल करता हूँ।
भाग जाते हैं सब, जो आते हैं मेरा हौसला तोड़ने । वे बेचारे ख़ुद ही अपना हौसला तोड़-छोड़ बैठते हैं।
मेरा अनुसरण कीजिए और 'मार्ग' पर चलिए। विरोधी खुद मार्ग पर आ जाएँगे ।
विरोधी कुछ भी नहीं हैं बल्कि उल्टे वे तो आपकी गरिमा का सामान हैं ।
जो आपको चित करने आएगा और ख़ुद ही चित हो जाएगा तो आपकी शान बुलंद होना तय है ।
मैं तो इंतज़ार ही नहीं बल्कि दुआ भी करता हूँ कि मालिक आज तो किसी को भेज दे !
...लेकिन कोई आने-गाने के लिए तैयार ही नहीं होता । इस मामले में आप ख़ुशनसीब हैं और फिर भी गिला-शिकवा कर रही हैं ?   

अल्लामा इक़बाल फ़रमाते हैं कि

तुन्दी ए बादे मुख़ालिफ़ से न घबरा ऐ उक़ाब
ये तो चलती हैं तुझे ऊँचा उड़ाने के लिए 


......

शब्दार्थ ,
बादे मुख़ालिफ़-विपरीत हवा , उक़ाब-बाज़
Please see 

And also see

Saturday, May 14, 2011

क्या हिंदुस्तानी अदालतें ईरानी अदालत से बेहतर हैं ?

इकतरफ़ा प्रेम के मारे अंधे प्रेमी लड़की का इंकार सुनकर लड़की के चेहरे पर तेज़ाब फेंक देते हैं ताकि अगर वह उनकी न हो सकी तो वह किसी और की भी न हो सके । भारत में ऐसी घटनाएं आए दिन घटती रहती हैं ।
भारतीय क़ानून ईरान के इस्लामी क़ानून की तरह अपराधी को तुरंत दंडित नहीं करता । तुरंत क्या बल्कि अक्सर तो करता ही नहीं ।
एक औरत की क्या वैल्यू है ?
यहाँ तो पूरे के पूरे समुदाय का संहार कर दीजिए , क़ातिलों का बाल टेढ़ा होने वाला नहीं है ।
सन 1984 के दंगे में मारे गए सिक्खों के क़ातिलों में से आज तक किसी एक को भी फाँसी न हुई और अफ़ज़ल गुरू वग़ैरह को जिन्हें फाँसी की सज़ा सुना भी दी है तो उसे देते हुए डर लग रहा है ।
हमारे देश की अदालतें बढ़िया हैं और यहाँ सबको बिना कुछ ख़र्च किए जल्दी इंसाफ़ मिलता है , इसलिए ईरान को भारतीय अदालतों की तरह इंसाफ़ करना चाहिए ।
ऐसा कहने वाला कौन है ?

ख़ुद तो इंसाफ़ करना आता नहीं और जहाँ हो रहा है , वहाँ से सीखते नहीं , देखते नहीं।
ये वे आँखें हैं जो नफ़रत के तेज़ाब से खुद अंधी कर चुके हैं और अब सत्य और मार्ग दिखता ही नहीं ।

जयहिंद ।
वंदे ईश्वरम ।

Tuesday, May 10, 2011

सारी ज़मीन एक प्रेतलोक बन चुकी है Ghostland

आप असीमा बहन की पोस्ट पर जायेंगे तो आपको वहां मेरा यह कमेंट नज़र आएगा : 


@ असीमा, मेरी बहन ! यह दुनिया ख़ुदग़र्ज़ और अहसान फ़रामोश है। इसके पूंजीपति भी ऐसे ही हैं और इसके ग़रीब भी ऐसे ही हैं। आपके आदरणीय पिता जी ने अपनी नैतिक चेतना के प्रभाव में आकर जो कुछ किया, वह अपनी जगह दुरूस्त है। किसी के मानने या उसे नकारने से उसके सही होने में कोई अंतर नहीं आएगा और न ही आपके पिता की महानता में कोई कमी-बेशी होगी। जो भी नेकी और सच्चाई की राह पर चला है, आर्थिक रूप से वह अपने साथियों से पिछड़ता ही गया और अंत में उसे वह जनता भी भुला देती है, जिसके लिए वह लड़ता है।
जलियां वाला बाग़ में गोलियां खाने वालों को इस देश के नेता और जनता भुला चुके हैं, आपके पिता के साथ भी यही किया जा रहा है और देशसेवा करने वालों के साथ हमेशा यही किया जाएगा। यह एक सच है। 
आपके मन की पीड़ा को मैं समझ सकता हूं। जो लोग कंधों पर उठाए जाने के लायक़ हों, उन्हें यूं नज़रअंदाज़ करने का मतलब है कि आगे से कोई भी ऐसा बलिदान नहीं करेगा और अगर करेगा तो उसका अंजाम भी यही होगा। जितने पढ़े-लिखे लोग हैं, वे इस सच्चाई से वाक़िफ़ हैं, इसीलिए वे 90 प्रतिशत भ्रष्ट हो चुके हैं। नेकी का बदला दुनिया कभी किसी को दे ही नहीं पाई, बदला तो सिर्फ़ वह मालिक ही देता है जिसने बंदे को पैदा किया और उसे नेकी की प्रेरणा दी है। दुनिया की सामूहिक नैतिक चेतना मृत प्रायः है, केवल शरीर ज़िंदा हैं। सारी ज़मीन एक प्रेतलोक बन चुकी है। इन प्रेतों के पास शरीर भी है। लगभग सभी भटक रहे हैं। सत्य और न्याय से तो बहुत कम मतलब रह गया है। हरेक आदमी ऐश करना चाहता है और समृद्ध होना चाहता है। 
<b>जो भी नेकी सच्चे मालिक को भुलाकर की जाती है, वह हसरत और अफ़सोस के सिवा कुछ और नहीं दे पाती।</b> आपके आदरणीय पिता जी के द्वारा जो भी सत्य आप पर प्रकट हुआ है, उसे आप एक और महानतर सत्य को पाने का माध्यम बना लेंगी तो आपके मन की दुनिया में शिकायत और मायूसी के अंधेरों के बीच एक नई आशा का सूरज उगेगा। मुझे यह उजाला हासिल है, आपको भी मैं यही भेंट करता हूं। 
आपके लिए और आपके आदरणीय पिता जी के लिए मैं पालनहार से विशेष प्रार्थना करूंगा।
धन्यवाद !

Wednesday, May 4, 2011

मैं जज़्बात से भरा हुआ एक पठान आदमी आदमी हूं Afghan Blood

@ आदरणीय भाई खुशदीप सहगल जी ! मैंने आपकी नसीहत को ग़ौर से दो बार पढ़ा, आधे घंटे के अंतराल से। आपने मुझे नसीहत की है जिससे मेरे प्रति आपकी फ़िक्रमंदी का पता चलता है लेकिन आपकी नसीहत पर अमल करने से पहले मुझे अपनी पूरी स्ट्रैटेजी पर ग़ौर करना होगा और आपको भी यह जानना ज़रूरी है कि यह सब आखि़र हो क्यों रहा है ? 
हालांकि इसे बयान करने के लिए एक पूरी पोस्ट दरकार है लेकिन संक्षेप में अर्ज़ करता हूं कि ‘मैं न कोई संत हूं और न ही कोई जोकर।‘
संत का काम क्षमा करना होता है और जोकर का हंसाना। मैं जज़्बात से भरा हुआ एक आम आदमी हूं, एक पठान आदमी। पठान का मिज़ाज क़बायली होता है, वह आत्मघाती होता है। वह हर चीज़ भूल सकता है लेकिन वह इंतक़ाम लेना नहीं भूलता। मैं आर्यन ब्लड हूं। इस्लाम को पसंद करने के बावजूद मैं अभी भी इस्लाम के सांचे में पूरी तरह ढल नहीं पाया हूं। अभी मैं अंडर प्रॉसैस हूं। इसी हाल में मैं हिंदी ब्लॉगर बन गया। मेरे दीन का और खुद मेरा तिरस्कार किया गया। एक लंबे अर्से तक सुनामी ब्लॉगर्स मेरी छवि को दाग़दार करते रहे और बाक़ी ब्लॉगर्स मुझे दाग़दार करने वालों की चिलम भरते रहे। ये वही लोग हैं जिन्हें नेकी और नैतिकता का ख़ाक पता नहीं है। जो कुछ मुझे दिया गया है, मैं उसके अलावा उन्हें और क्या लौटा सकता हूं ?
इसीलिए आपको मेरे लेख में आक्रोश मिलेगा, प्रतिशोध मिलेगा, अपमान और तिरस्कार भी मिलेगा, कर्कश स्वर और दुर्वचन भी मिलेगा, टकराव और संघर्ष मिलेगा। आपको मेरे लेख में बहुत कुछ मिलेगा लेकिन असत्य नहीं मिलेगा। ‘छिनाल छिपकली प्रकरण‘ भी ऐसी ही एक घटना है जो कि एक वास्तविक घटना है। औरत को सरेआम नंगा किया गया लेकिन कोई मर्द नहीं आया इसकी निंदा करने। द्रौपदी की साड़ी ज़रा सी खींचने पर तो दुःशासन आज तक बदनाम है और जिन्होंने औरत को पूरा नंगा कर दिया, उसे अपमानित ही कर डाला वे नेकनाम कैसे बने घूम रहे हैं ‘सम्मान बांटने का पाखंड‘ रचाते हुए ?
इस प्रकरण को लेख से निकालने का मतलब है अपने लेख के मुख्य संदेश को निकाल देना, फिर इसमें बचेगा ही क्या ?
इसी संदेश को रूचिकर बनाने के लिए अन्य मसाले भरे गए हैं। जिसे आप एक कंकर की तरह अप्रिय समझ रहे हैं, वास्तव में वही मुद्दे की बात है। हां, अगर वह झूठ हो तो मैं उसे निकाल दूंगा , झूठ से मेरा कोई संबंध नहीं है। अपने विरोधी के खि़लाफ़ भी मैं झूठ नहीं बोलूंगा।
मेरा बहिष्कार करके मेरे विरोधियों ने और उनके सपोर्टर्स ने मेरा क्या बिगाड़ा ?
किसी से कोई रिश्ता बनने ही नहीं दिया कि किसी से कोई मोह होता, किसी के दिल दुखने की परवाह होती। जब किसी को हमारी परवाह नहीं है तो फिर भुगतो अपने कर्मों को। मत आओ हमारे ब्लॉग पर, मत दो हमें टिप्पणियां और फिर भुगतो फिर उसका अंजाम। ऐसा मैं सोचता हूं और जो मैं सोचता हूं वही अपने ब्लॉग पर लिखता हूं।
क्या ब्लॉग पर सच्चाई लिखना मना है ?
इसके बावजूद मेरे दिल में कुछ लोगों के प्यार भी है और सम्मान भी। प्रिय प्रवीण जी के साथ आप और डा. अमर कुमार जी ऐसे ही लोग हैं। डा. अमर कुमार जी के ज्ञान में वृद्धि की कोशिश करना सूरज को दिया दिखाना है और आपको मैं अपना मानता हूं।
आपकी सलाह प्रैक्टिकल दुनिया में जीने का बेहतरीन उपदेश है। मैं इस सलाह की क़द्र करता हूं। महानगरीय जीवन में यह उसूल लोगों की ज़िंदगी में आम है लेकिन मैं एक क़स्बाई सोच वाला आदमी हूं, मेरा माहौल भी आपसे थोड़ा अलग है। इसलिए हो सकता है कि आपकी सलाह पर अमल करने में मुझे कुछ समय लग जाए।
एक नेक सलाह के लिए मैं आपका दिल से आभारी हूं।
शुक्रिया !
और देखें 

Tuesday, May 3, 2011

हमने इस पूरे प्रकरण को ब्लॉग जगत के सामने जैसे रखा था यह ठीक वैसे ही घटित हुआ है

एक भविष्यवाणी : खुशदीप जी बहुत जल्द लौट आएंगे।
सैद्धांतिक आधार : सच्चा ब्लॉगर ब्लॉगिंग छोड़ना भी चाहे तो ब्लॉगिंग खुद ही उसे छोड़ने को तैयार नहीं होती।

रश्मि रविजा जी से सहमत।

हमने इस पूरे प्रकरण को ब्लॉग जगत के सामने जैसे रखा था यह ठीक वैसे ही घटित हुआ है। इसे आप देख सकते हैं निम्न लिंक पर
अगर किसी को बड़ा ब्लॉगर बनना है तो क्या उसे औरत की अक्ल से सोचना चाहिए ? Hindi Blogging

और अंत में एक प्यारा सा शेर आप सभी की नज़्र करता हूं

झील हो, दरिया हो, तालाब हो या झरना हो
जिस को देखो वही सागर से ख़फ़ा लगता है

Monday, May 2, 2011

जो सीखना चाहते हैं वे उर्दू सीख सकते हैं मात्र तीन घंटे में Know Urdu within 3 hours

मात्र 3 घंटों मे ही उर्दू 
ग़ज़ल एक बार पढ़ी और बार-बार सुनी। 
अच्छी लिखी गई है और पढ़ी भी अच्छी गई है।
लेकिन अगर अर्चना जी अपने तलफ़्फ़ुज़ अर्थात उच्चारण को सुधार लें तो प्रभाव कई गुना बढ़ जाएगा।
मस्लन उन्होंने 
‘साज़-संगीत को छेड़ देना ज़रा‘
यह पंक्ति बिल्कुल ठीक पढ़ी है
इसमें उन्होंने ‘ज़‘ की ध्वनि ही उच्चारित की है लेकिन दूसरी जगहों पर जहां भी उन्होंने ‘ज़रा‘ कहने की कोशिश की है उनके मुंह से ‘जरा‘ ही निकला है। उर्दू जानने वालों के लिए यह बेहद खटकता है। 
ऐसे उन्होंने ‘खत‘ कहा है जबकि यह आवाज़ ‘ख़त‘ गले से निकलती है। गले से कहा जाता है ‘ख़‘।
‘हम तरन्नुम में भरकर ग़ज़ल गाएंगे‘
में भी उन्होंने ‘ज़‘ तो सही कह दिया लेकिन ‘ग़‘ के बजाय ‘ग‘ कह गईं। ‘ग़‘ की ध्वनि भी गले से ही निकलती है।
किसी उर्दू जानने वाले से एक सिटिंग ले लेंगी तो सदा के लिए ग़लत उच्चारण से मुक्ति मिल जाएगी।
कभी-कभी उर्दू न जानने वाले लोगों के लिए यह जानना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि किस अक्षर के नीचे बिंदी है और उसे कैसे उच्चारित किया जाए ?
अर्चना चाओजी  जी और इससे पहले शिखा जी के पाठ को यह ज़रूरत महसूस हो रही है कि जो सीखना चाहते हैं, उन्हें उर्दू भी सिखा दी जाए।
मैं मात्र 3 घंटों मे ही उर्दू सिखा देता हूं। इसके लिए मैं 6 दिन तक आधा घंटा रोज़ाना लेता हूं और बस 6 दिनों में काम हो जाता है। इसके लिए मैंने एक स्पेशल कोर्स डिज़ायन किया है।
आमने सामने 6 दिनों में सिखा देता हूं तो नेट पर ज़्यादा से ज़्यादा 10-12 दिन लग जाएंगे।
इसके बाद उर्दू का विशाल साहित्य आपके सामने होगा।
तब आप हरेक हर्फ़ को वैसे ही जानेंगे जैसा कि वास्तव में वह है। हिन्दी जानने वाले तबक़े में उर्दू शायरी का बेहद शौक़ है बल्कि उनके दिल में उर्दू जानने का भी शौक़ है। उनके शौक़ का ख़याल हमें अहसास दिला रहा है कि कुछ करना चाहिए।

Please go to 
http://mushayera.blogspot.com/2011/05/blog-post_03.html

Sunday, May 1, 2011

बहरहाल और आखि़रकार , Blog Fixing के संदर्भ में


यशवंत जी ! आपकी पोस्ट पहली बार पढ़ी और अच्छी ही नहीं लगी बल्कि मज़ा आ गया। कम लोग हैं जिन्हें पढ़कर हमें मज़ा आता है। आपकी पोस्ट पर जो कमेंट्स पढ़े उन्होंने तो मज़े को दोबाला ही कर दिया। हम बहुत दिनों से blogkikhabren.blogspot.com  पर कह रहे थे कि
1. ब्लॉगर्स मीट हिंदी ब्लॉगिंग के स्तर को गिरा रही है।
2. ईनाम अपने चहेतों को आब्लाइज करने के लिए अंधे की रेवड़ियों की तरह दिए जा रहे हैं।
3. ब्लॉगर्स जिस नेता बिरादरी के भ्रष्ट होने पर एकमत और सहमत हो चुके हैं, उसी बिरादरी के एक फ़र्द से पुरस्कार लेना कैसे जायज़ है ?
4. ईनाम की मूल सूची को क्यों बदल दिया गया ?
5. किसी चर्चित ब्लॉगर को जानबूझकर ईनाम से वंचित क्यों किया जा रहा है ? बल्कि उसे निमंत्रित तक क्यों नहीं किया जा रहा है ?
हम कहते रहे और हिंदी ब्लॉगर्स भी सुनते रहे लेकिन इन्होंने कान नहीं धरा हमारी बात पर। खुशदीप जी ने भी हमारा समर्थन नहीं किया। जो कुछ बीता, यह सब तो हम बीतने से पहले ही बता रहे थे लेकिन भाई लोग कार्यक्रम को जबरन भव्य बनाने पर तुले हुए थे। कोई भी कार्यक्रम भव्य तभी बनेगा जबकि उसमें मालदार पूंजीपति और सत्तापक्ष के नेता शामिल हों और ये लोग इस मक़ाम तक आम तौर से पहुंचते ही तब हैं जबकि ये लोग अपनी ‘न्याय चेतना‘ का गला घोंट डालते हैं। कार्यक्रम के आयोजकों के अपने व्यावसायिक हित थे, उनकी पूर्ति बहरहाल हो ही गई है।
खुशदीप भाई ने जब निशंक जी को देख ही लिया था तो आयोजकों से अपनी मजबूरी ज़ाहिर करके इधर-उधर टल जाना था। अगर पुण्य प्रसून जी नाखुश न होते तो खुशदीप जी भी अपने घर ईनाम सहित खुश खुश ही लौटते जैसे कि शाहनवाज़ भाई और ललित भाई लौटे। इन्होंने तो अपने ईनाम नहीं लौटाए तो क्या इनकी आत्मा को खुशदीप जी के मुक़ाबले कम अंक दिए जाएं ?
इन्हें पुण्य प्रसून जी से कुछ लेना देना ही नहीं था सो ये अपने ईनाम साथ लेते आए।
खुशदीप भाई स्वस्थ होने के बाद ही पुण्य प्रसून जी के सामने पड़ेंगे और दो चार दिन बाद उनके अंदर भी ‘जाने भी दो यार‘ वाला भाव जाग चुका होगा और तब उनकी तरफ़ से संतुष्ट होते ही खुशदीप जी फिर से ब्लॉगिंग करने लगेंगे। उन्हें जो इंटरनेशनल पहचान मिली है वह हिंदी ब्लॉगिंग की वजह से ही मिली है। इस मंच से हटकर वे अपना ही कुछ खोएंगे और खोने के लिए वे कभी तैयार होंगे नहीं। वैसे भी ब्लॉगिंग का अभ्यस्त बीवी-बच्चे छोड़ सकता है लेकिन ब्लॉगिंग हरगिज़ नहीं छोड़ सकता। वे ऐसा ज़ाहिर करेंगे जैसे कि अगर लोगों ने उनसे आग्रह न किया होता तो वे अब दोबारा बिल्कुल भी न लिखते।
हमारे उस्ताद का कथन है कि हिंदी ब्लॉगर बेचारा जाएगा कहां ?
लिहाज़ा सब तसल्ली रखें और खुशदीप जी के सेहतयाब होने की दुआ करें।
इस सबके बाद में हम श्री रवीन्द्र प्रभात जी और अविनाश वाचस्पति जी से यह कहना चाहेंगे कि आदमी ग़लतियों से ही सीखता है। किसी की आलोचना और असहयोग के कारण आप अपना मनोबल मत गंवा बैठिएगा। आपने एक आयोजन किया, चाहे उसमें कुछ भूल-चूक हुईं लेकिन आपने बहुत से लोगों को आपस में एक जगह तो किया।
आप बहरहाल बधाई के पात्र हैं।
अगली बार के आयोजन में इन ग़लतियों को शून्य करने की कोशिशें कीजिएगा और जल्दी ही आपको हम बुलाएंगे अपने सम्मान समारोह में।
जय हिंद!   
Please go to

Thursday, April 28, 2011

खुशामद के रूप


@ शन्नो जी ! गोपालकृष्ण गांधी जी एक प्रशासनिक अधिकारी रह चुके हैं और भारत सरकार के लिए वह ऊंचे पदों पर काम कर चुके हैं। उन्हें अक्सर खुशामदी लोगों से वास्ता पड़ता रहा है और इसीलिए उन्हें खुशामद करने वाले मतलबी लोगों से नफ़रत हो गई है। इस लेख उन्होंने अपने अनुभव को ही बयान किया है। लेकिन खुशामद के कुछ रूप और भी हैं जो कि उनकी नज़र से या तो चूक गए हैं या फिर इस लेख में नहीं आ पाए होंगे।
कोई बच्चा जब दूध पीने से इंकार कर देता है तो मां-बाप उसकी खुशामद करते हैं कि वह दूध पी ले। ज़ाहिर है कि यह ख़ालिस खुशामद होती है लेकिन इसमें अपने बच्चे से नफ़रत करना नहीं पाया जाता। कोई लड़की जब किसी के झूठे प्यार में गिरफ़्तार हो जाती है तो भी उसके मां-बाप उसकी खुशामद करते हैं कि वह उसे अपने दिल से निकाल दे। रूठकर मायके गई बीवी को वापस लाने के लिए उसकी कितनी खुशामद करनी पड़ती है, इसका मुझे तो पता नहीं है और हो सकता है कि डा. श्याम गुप्ता जी को भी इसका पता न हो। बैंक में अनपढ़ लोगों को अपने फ़ॉर्म भरवाने के लिए पढ़े-लिखे लोगों की खुशामद करते हरेक देख सकता है। शादी-विवाह में लंबे-लंबे मंत्र पढ़ने वाले पंडित जी को जल्दी से निपटाने के लिए खुशामद करते हुए भी देखा जा सकता है। ग़र्ज़ यह कि ऐसे बहुत से मौक़े होते हैं जहां खुशामद ज़रूरी होती है और वह कभी एक जायज़ अमल होती है और कभी पसंदीदा भी। खुशामद का मात्र वही रूप घृणित है जहां उसके पीछे सिर्फ़ और सिर्फ़ नाजायज़ लालच पोशीदा हो और खुशामद करने वाले का दिल ख़ैरख्वाही से ख़ाली हो।
आपकी टिप्पणी के लिए आपका शुक्रिया। 
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/04/praise.html

Wednesday, April 27, 2011

जिन लोगों का ब्लागस्पाट पर ब्लॉग नहीं है, उन्हें ये लोग सम्मानित .क्यों नहीं कर रहे हैं ?


अलबेला जी ! पूरा मामला यह है कि दो अदद ब्लॉगर्स ने बिना मिले पहले तो दो किताबें लिख डालीं और फिर मिलकर अपने गुट के ब्लॉगर्स के गले में गमछा लटकाने का प्रोग्राम तय कर लिया। यह पूरी तरह एक गुटीय ब्लॉगर मीट है जिसे इस तरह प्रचारित किया जा रहा है जैसे कि इसका संबंध हिंदी ब्लॉगिंग के व्यापक हितों से हो। जिन लोगों का ब्लागस्पाट पर ब्लॉग नहीं है, उन्हें ये लोग सम्मानित ही नहीं कर रहे हैं।
क्या दूसरी वेबसाइट पर हिंदी ब्लॉगिंग के लिए कुछ भी रचनात्मक नहीं किया जा रहा है ?
इनकी माफ़ियागिरी को बेनक़ाब करने के लिए ही मैं यह सीरीज़ लिख रहा हूं।
आप आए बहार आई।
शुक्रिया । 
-------------------
Please go to 

Tuesday, April 26, 2011

एकजुट हो जाओ जुल्म के खि़लाफ़ Unity is best policy


माही जी ! आपकी तरह मैं भी यहां कुछ अरमान लेकर आया था। हिंदी ब्लॉगिंग का मतलब मैं यही समझता था कि हम अपने विचार दूसरों के साथ शेयर करें और दूसरों के लेख पढ़कर हम लाभ उठाएं लेकिन धीरे-धीरे यह सच्चाई सामने आई कि जिन लोगों को लिखने का ख़ाक पता नहीं है वे यहां बड़े ब्लॉगर बने बैठे हैं और ब्लॉगर्स के चक्रवर्ती सम्राट बनने के चक्कर में हैं। मैंने तुरंत से ही उनकी मुख़ालिफ़त शुरू कर दी तो उन्होंने मेरे धर्म को कोसना शुरू कर दिया और मुझे एक और लड़ाई में उलझा दिया। ताकि मुझ पर अन्य धर्मों का विरोधी होने का ठप्पा लगाया जा सके जिससे नए ब्लॉगर्स मेरी बात पर कान ही न धरें। धीरे-धीरे मैंने ऐसे सभी लोगों के होश ठिकाने लगा दिए और कुछ जगहों पर खुद को पीछे हटा लिया ताकि मैं फ़ालतू में इन बड़े ब्लॉगर्स की साज़िश का शिकार न बनूं। मैं चाहूं तो मैं भी ख़ामोश रह सकता हूं लेकिन मुझसे अन्याय होता देखकर चुप रहा ही नहीं जाता। इस बार मैं देख रहा हूं कि औरत को सरेआम नंगा करने वाले हिंदी व्यंग्यकार अपने यार-दोस्तों की टीम को सम्मानित कर रहे हैं और खुद भी सम्मानित हो रहे हैं।  
एक मशहूर एग्रीकटर की लगभग पूरी टीम को ही अहाने-बहाने से ऑबलाइज   किया जा रहा है। इस तरह औरत के सतीत्व और स्त्रीत्व को अपमानित करने वाले ये लोग तमाशेबाज़ी करके हिंदी ब्लॉग जगत में अपना नाम ऊंचा करने की फ़िराक़ में हैं। अगर ये लोग कामयाब हो गए तो नेकी-बदी और सम्मान-अपमान का पैमाना और उसकी तमीज़ ही ख़त्म हो जाएगी। इस क्राइसिस से बचाने के लिए मुझे अकेले ही आवाज़ उठानी पड़ी वर्ना ऐसा नहीं है कि मैं जोड़-तोड़ करके एक अदद सम्मान हासिल न कर सकता था। ऐसे जुगाड़ और ऐसी तकनीक मुझे भी आती है लेकिन सम्मान मेरा मक़सद नहीं है , मेरा मक़सद तो सत्य है। जो भी काम हो उसमें ईमानदारी और पारदर्शिता हो। अगर इन्होंने कोई सूची जारी कर ही दी थी तो अब पुरस्कार भी उसी के अनुरूप बांटे जाने चाहिएं थे और अगर श्रेष्ठ व्यंग्यकार को अपने द्वारा नंगा फ़ोटो लगाने पर कोई अफ़सोस है तो समस्त हिंदी ब्लॉगर्स से सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांग लेते तो बात ख़त्म हो जाती। दूसरी बातों को हम भी नज़रअंदाज़ कर देते।
कार्यक्रम तो इनका होकर रहेगा क्योंकि इन्होंने एक लंबे अर्से से गुटबाज़ी करके एक नेटवर्क बना लिया है लेकिन इनका मज़ा तो ख़राब कर ही दिया जाएगा। जब ये लोग सम्मान सभा में सजकर बैठे हों तब भी इनकी एक नज़र आपकी पोस्ट पर रहनी चाहिए। इससे आइंदा इन पर दबाव बनेगा और ये इस बार की तरह हिंदी ब्लागर्स को मूर्ख बनाकर उन्हें अपमानित करने का साहस नहीं कर पाएंगे।
हमारे अंदर किसी भी मुद्दे पर कितनी भी असहमति क्यों न हो ? लेकिन हमें इनके चैधरीपने के सपने को चकनाचूर करने के लिए आपस में एकजुट होना ही पड़ेगा। जितने भी नए ब्लॉगर्स हैं, जितने ब्लॉगर्स भी गुटबाज़ी से दूर हैं उन्हें एकजुट करने के उद्देश्य से ही ‘हिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम इंटरनेशनल‘ की स्थापना की गई है। जो लोग इस संघर्ष में मेरे साथ आना चाहते हैं यदि वे फ़ोरम में शामिल होना चाहें तो उनका स्वागत है।
http://hbfint.blogspot.com/
--------------------------------------------
Please go to

Monday, April 25, 2011

रावण को निंदनीय ही मानना चाहिए Ramayana


गगन शर्मा जी ! आपने मेरे कथन पर मनन किया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। आप जानते हैं कि आरूषि हत्याकांड हमारे समय की ही घटना है और हज़ारों लोगों ने इसे लिखा भी है। इसके बावजूद हम नहीं जानते कि वास्तव में उस बच्ची के साथ क्या मामला पेश आया था ?
श्री रामचन्द्र जी का काल लगभग 8-9 करोड़ साल पुराना है। कथाकार बाल्मीकि भी उनके समकालीन ही थे। अलग अलग लोगों ने उनके काल की अलग अलग गणना की है। पं. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ जी ने आज से 12 लाख 96 हज़ार साल पहले उनका काल माना है। बहरहाल जो भी काल माना जाए लेकिन न तो संस्कृत भाषा इतनी पुरानी है और न ही यह रामायण।
इस संबंध में भाषा वैज्ञानिकों की आधुनिक खोज पर भी आप एक नज़र डाल लीजिए।

आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि इसी बाल्मीकि रामायण में बौद्धों की निंदा भी भरी हुई है, जिससे पता चलता है कि यह गौतम बुद्ध के बाद की रचना है। देखिए :
यथा हि चोरः स तथा हि बुद्धः तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि,
तस्माद् हि सः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात्
                  -अयोध्या कांड, 109, 34
अर्थात जैसे चोर दंडनीय होता है, इसी प्रकार (वेदविरोधी) बुद्ध (बौद्ध मतावलंबी) भी दंडनीय है। तथागत (नास्तिक विशेष) और नास्तिक (चार्वाक) को भी इसी कोटि में समझना चाहिए। इसीलिए प्रजा पर अनुग्रह करने के लिए राजा द्वारा जिस नास्तिक को दंड दिलाया जा सके, उसे चोर के समान दंड दिलाया ही जाए, परंतु जो वश के बाहर हो, उस नास्तिक के प्रति विद्वान ब्राह्ममण कभी उन्मुख न हों, उस से वार्तालाप तक न करें। (देखें श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण, हिंदी अनुवाद, पृ. 303, गीता प्रेस गोरखपुर, सं 2033)
इस संबंध में आप सुरेन्द्र कुमार शर्मा जी का एक शोधपरक लेख ‘रामायण की ऐतिहासिकता‘ भी अवश्य देखें, जो कि उनकी पुस्तक ‘क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिंदू धर्म ?‘ में संकलित है। उपरोक्त अंश उनकी इसी पुस्तक के पृ. सं. 424 से लिया गया है। यह पुस्तक आप ‘विश्वबुक्स दिल्ली‘ से हासिल कर सकते हैं।
मेरा मानना है कि रावण निंदनीय था तभी तो उसे श्री रामचनद्र जी ने मारा। उसके निंदनीय होने में जो बात भी शक पैदा करे उसे ग़लत समझा जाए। श्री रामचन्द्र जी समता, न्याय और वीरता के गुणों से युक्त थे। जो बात भी उनके इन गुणों के विपरीत जाए, उसे तुरंत ही त्याज्य मान लेना चाहिए। इस प्रकार हम चाहे श्री रामचन्द्र जी की वास्तविक कथा से भले ही परिचित न हो पाएं लेकिन इस प्रकार हम उनका आदर तो ढंग से कर पाएंगे और रामायण के केन्द्रीय पात्रों पर उठने वाली आपत्तियों का निराकरण भी हो जाएगा।
ऐसा मेरा मत है। इससे बेहतर कोई और बात संभव हो तो उसे आप बताएं ताकि मैं उसे मान लूं।
Please go to 

Sunday, April 24, 2011

जिन्होंने औरत को पूरा नंगा कर दिया, उसे अपमानित ही कर डाला वे नेकनाम कैसे बने घूम रहे हैं ‘सम्मान बांटने का पाखंड‘ रचाते हुए ? Shamefull act

Anwer Jamal , Srinagar , Kashmir
@ आदरणीय भाई खुशदीप सहगल जी ! मैंने आपकी नसीहत को ग़ौर से दो बार पढ़ा, आधे घंटे के अंतराल से। आपने मुझे नसीहत की है जिससे मेरे प्रति आपकी फ़िक्रमंदी का पता चलता है लेकिन आपकी नसीहत पर अमल करने से पहले मुझे अपनी पूरी स्ट्रैटेजी पर ग़ौर करना होगा और आपको भी यह जानना ज़रूरी है कि यह सब आखि़र हो क्यों रहा है ?
हालांकि इसे बयान करने के लिए एक पूरी पोस्ट दरकार है लेकिन संक्षेप में अर्ज़ करता हूं कि ‘मैं न कोई संत हूं और न ही कोई जोकर।‘
संत का काम क्षमा करना होता है और जोकर का हंसाना। मैं जज़्बात से भरा हुआ एक आम आदमी हूं, एक पठान आदमी। पठान का मिज़ाज क़बायली होता है, वह आत्मघाती होता है। वह हर चीज़ भूल सकता है लेकिन वह इंतक़ाम लेना नहीं भूलता। मैं आर्यन ब्लड हूं। इस्लाम को पसंद करने के बावजूद मैं अभी भी इस्लाम के सांचे में पूरी तरह ढल नहीं पाया हूं। अभी मैं अंडर प्रॉसैस हूं। इसी हाल में मैं हिंदी ब्लॉगर बन गया। मेरे दीन का और खुद मेरा तिरस्कार किया गया। एक लंबे अर्से तक सुनामी ब्लॉगर्स मेरी छवि को दाग़दार करते रहे और बाक़ी ब्लॉगर्स मुझे दाग़दार करने वालों की चिलम भरते रहे। ये वही लोग हैं जिन्हें नेकी और नैतिकता का ख़ाक पता नहीं है। जो कुछ मुझे दिया गया है, मैं उसके अलावा उन्हें और क्या लौटा सकता हूं ?
इसीलिए आपको मेरे लेख में आक्रोश मिलेगा, प्रतिशोध मिलेगा, अपमान और तिरस्कार भी मिलेगा, कर्कश स्वर और दुर्वचन भी मिलेगा, टकराव और संघर्ष मिलेगा। आपको मेरे लेख में बहुत कुछ मिलेगा लेकिन असत्य नहीं मिलेगा। ‘छिनाल छिपकली प्रकरण‘ भी ऐसी ही एक घटना है जो कि एक वास्तविक घटना है। औरत को सरेआम नंगा किया गया लेकिन कोई मर्द नहीं आया इसकी निंदा करने। द्रौपदी की साड़ी ज़रा सी खींचने पर तो दुःशासन आज तक बदनाम है और जिन्होंने औरत को पूरा नंगा कर दिया, उसे अपमानित ही कर डाला वे नेकनाम कैसे बने घूम रहे हैं ‘सम्मान बांटने का पाखंड‘ रचाते हुए ?
इस प्रकरण को लेख से निकालने का मतलब है अपने लेख के मुख्य संदेश को निकाल देना, फिर इसमें बचेगा ही क्या ?
इसी संदेश को रूचिकर बनाने के लिए अन्य मसाले भरे गए हैं। जिसे आप एक कंकर की तरह अप्रिय समझ रहे हैं, वास्तव में वही मुद्दे की बात है। हां, अगर वह झूठ हो तो मैं उसे निकाल दूंगा , झूठ से मेरा कोई संबंध नहीं है। अपने विरोधी के खि़लाफ़ भी मैं झूठ नहीं बोलूंगा।
मेरा बहिष्कार करके मेरे विरोधियों ने और उनके सपोर्टर्स ने मेरा क्या बिगाड़ा ?
किसी से कोई रिश्ता बनने ही नहीं दिया कि किसी से कोई मोह होता, किसी के दिल दुखने की परवाह होती। जब किसी को हमारी परवाह नहीं है तो फिर भुगतो अपने कर्मों को। मत आओ हमारे ब्लॉग पर, मत दो हमें टिप्पणियां और फिर भुगतो फिर उसका अंजाम। ऐसा मैं सोचता हूं और जो मैं सोचता हूं वही अपने ब्लॉग पर लिखता हूं।
क्या ब्लॉग पर सच्चाई लिखना मना है ?
इसके बावजूद मेरे दिल में कुछ लोगों के प्यार भी है और सम्मान भी। प्रिय प्रवीण जी के साथ आप और डा. अमर कुमार जी ऐसे ही लोग हैं। डा. अमर कुमार जी के ज्ञान में वृद्धि की कोशिश करना सूरज को दिया दिखाना है और आपको मैं अपना मानता हूं।
आपकी सलाह प्रैक्टिकल दुनिया में जीने का बेहतरीन उपदेश है। मैं इस सलाह की क़द्र करता हूं। महानगरीय जीवन में यह उसूल लोगों की ज़िंदगी में आम है लेकिन मैं एक क़स्बाई सोच वाला आदमी हूं, मेरा माहौल भी आपसे थोड़ा अलग है। इसलिए हो सकता है कि आपकी सलाह पर अमल करने में मुझे कुछ समय लग जाए।
एक नेक सलाह के लिए मैं आपका दिल से आभारी हूं।
शुक्रिया !
http://tobeabigblogger.blogspot.com/2011/04/family-life.html 
---------------------------------------------------
कृपया देखें

कैसा होता है एक बड़े ब्लॉगर का वैवाहिक जीवन ? Family Life

Saturday, April 23, 2011

गांधी जी के ' ब्रह्यचर्य के प्रयोग' Brahmcharya


डॉ० वेद प्रताप वैदिक जी ! आपने लिखा है कि<b>
 वे चाहते थे कि वे स्वेच्छया पूर्णरूपेण नपुंसक बन जाएं, जैसा कि बाइबिल और कुरान में कहा गया है| </b>

और आपने यह भी लिखा कि
<b>भारत लौटकर 15-16 साल बाद गांधी जी ने ब्रह्यचर्य के कुछ ऐसे प्रयोग शुरू कर दिए, जो गांधी के पहले दुनिया में किसी ने नहीं किए|</b>

अब आप खुद सोच सकते हैं कि जब उनसे पहले ब्रह्मचर्य के ऐसे घिनौने प्रयोग किसी ने भी नहीं किये तो फिर उनके प्रयोगों को बाइबिल और कुरआन से जोड़ना क्या शरारतपूर्ण नहीं है ?
 ऐसे प्रयोगों की शिक्षा तो गीता भी नहीं देती जिसके वह मुरीद थे और न ही ऐसे प्रयोग श्रीकृष्ण जी ने किये तब गांधी जी को ऐसे प्रयोग करने कि सूझी कैसे ?
इस्लाम में अजनबी औरतों को ही नहीं बल्कि अपनी माँ बहन को भी नग्न देखना मना है . संतानोत्पत्ति ही यौनक्रिया का एकमात्र मक़सद नहीं है . आनंद और साहचर्य के लिए भी पति पत्नी आपस में एकाकार हो सकते हैं , इस्लाम इसकी इजाज़त देता है और मानवीय प्रकृति के विरुद्ध व्रत लेने को निषिद्ध ठहराता है . इसीलिए इस्लाम में संन्यास भी हराम और वर्जित है . धर्म का पालन सरल है लेकिन जो इस्लाम को नहीं मानता वह अपने लिए नए नए दर्शन घड़ता है . सारी समस्याओं की जड़ यही है कि आदमी अपने मन की करता है और वह अपने मालिक का हुक्म मानने के लिए तैयार नहीं है .
--------------------------------------------------
यह कमेन्ट हमने निम्न लेख पर किया 

गांधी के ब्रह्यचर्य पर नई बहस

2011-04-22 05:57 PM को विचार पर प्रकाशित
जोज़फ लेलीवेल्ड का भला हो कि उनकी वजह से गांधी पर एक बार फिर लंबी-चौड़ी बहस शुरू हो गई है| कृतज्ञ भारत गांधी को सिर्फ हर 2 अक्तूबर या 30 जनवरी को याद करने को मजबूर हो जाता है वरना गांधी अब अजायबघर की वस्तु हो गए हैं| लेलीवेल्ड की पुस्तक ”ग्रेट सोल : महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विथ इंडिया” कोई चालू किताब नहीं है| लेलीवेल्ड ने वर्षों के अनुसंधान के बाद यह पुस्तक लिखी है| वे ‘पुलिट्रजर’ जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के विजेता हैं| वे ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के कार्यकारी संपादक भी रह चुके हैं| उन्हें भारत और दक्षिण अफ्रीका में रहकर काम करने का भी अच्छा अनुभव है| उन्होंने अपनी पुस्तक पर लगे प्रतिबंध की कड़ी भर्त्सना की है और इस आरोप को बिल्कुल निराधार बताया है कि उन्होंने गांधी को समलैंगिक या नस्लवादी कहा है| उनका कहना है कि इस तरह के शब्द उनकी पुस्तक में कहीं आए ही नहीं हैं|
लेलीवेल्ड बिल्कुल ठीक हैं| उन्हें उनके शब्दों के आधार पर कोई भी नहीं पकड़ सकता लेकिन उनकी पुस्तक की एक समीक्षा ने उन्हें विवादास्पद बना दिया| एक बि्रटिश अखबार ने इस समीक्षा को आधार बनाकर महात्मा गांधी और उनके शिष्य हरमन कालेनवाख के संबंधों को उछाल दिया| उसने लेलीवेल्ड द्वारा वर्णित तथ्यों की ऐसी वक्र-व्याख्या की कि गांधी एक बार फिर चर्चा के घेरे में आ गए| लेलीवेल्ड ने गांधी और कालेनबाख के संबंधों के बारे में जो भी लिखा है, वह प्रामाणिक दस्तावेजों के आधार पर लिखा है| संपूर्ण गांधी वाड्रमय से उन्होंने कालेनबाख के नाम गांधी के पत्रें को उद्रधृत किया है|
ये हरमन कालेनबाख कौन थे ? कालेनबाख गांधी से दो साल छोटे थे| वे जर्मन-यहूदी थे| वे 1904 में गांधी से मिले| गांधी और कालेनबाख इतने घनिष्ट मित्र् बन गए कि वे एक-दूसरे को दो शरीर और एक आत्मा मानते थे| कालेनबाख ने ही अपनी 1100 एकड़ भूमि गांधीजी को दी थी, जिस पर उन्होंने ”तॉल्सतॉय फार्म” नामक आश्रम खड़ा किया था| वे गांधी से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने ब्रह्यचर्य और शाकाहार का व्रत ले लिया| वे गांधीजी के सत्याग्रहों में जमकर भाग लेते, संगठनात्मक कार्य करते और आश्रम की व्यवस्था भी चलाते| ऐसे दो परम मित्रें के बीच समलैंगिक संबंधों की बात कैसे उठी ?
लेलीवेल्ड ने गांधीजी के पत्रें के कुछ शब्दों को इस तरह उद्रधृत किया कि उनके दोहरे अर्थ लगाए जा सकते हैं| जैसे गांधीजी खुद को ‘अपर चेंबर’ (उच्च सदन) और कालेनबाख को ‘लोअर चेम्बर’ (निम्न सदन) लिखा करते थे| लेलीवेल्ड ने इन दो शब्दों को तो उछाला लेकिन उन्होंने और उनके समीक्षकों ने यह नहीं बताया कि वे ऐसा क्यों लिखते थे ? कालेनबाख ‘लोअर हाउस’ की तरह बजट बनाते थे और गांधीजी ‘अपर हाउस’ की तरह उसमें  कतरब्योंत कर देते थे| इस आर्थिक पदावलि को यौन पदाविल में बदलनेवाले मस्तिष्क को आप क्या कहेंगे ? यह आधुनिक पश्चिमी जीवन-पद्घति का अभिशाप है| इसी तरह गांधी के पत्रें में जगह-जगह कालेनबाख के लिए लिखे गए ”स्नेह और अधिक स्नेह” जैसे शब्दों का भी गलत अर्थ लगाया गया| गांधी द्वारा अपने शयन-कक्ष में रखे गए कालेनबाख के चित्र् को भी उसी अनर्थ से जोड़ा गया| गांधी के  लगभग 200 पत्रें में उन्होंने कालेनबाख से अपने पूर्व-जन्म के संबंधों की बात भी कही है| ये सब बातें किसी भी भौतिकवादी सभ्यता के ढांचे में पले-बढ़े विद्वान या पत्र्कार के लिए अजूबा ही हो सकती हैं| वे यह मानकर चलते हैं कि दो पुरूषों या दो महिलाओं के बीच परम आत्मीयता का भाव रह ही नहीं सकता| यौन संबंधों के बिना आत्मीय संबंध संभव ही नहीं हंंै|
वास्तव में गांधी इतने विलक्षण और इतने अद्वितीय थे कि उन्हें न तो परंपरागत पश्चिमी चश्मों से देखा जा सकता है और न ही परंपरागत भारतीय चश्मों से ! गांधी का सही रूप देखने के लिए मानवता को अपना एक नया चश्मा बनाना पड़ेगा| गांधी ने अपनी आत्म-कथा को ”मेरे सत्य के प्रयोग’ कहा है| यदि वे कुछ वर्ष और जीवित रहते और मेरी उनसे भेंट हो जाती तो मैं उनसे कहता कि आप एक आत्म-कथा और लिखिए और उसका शीर्षक दीजिए ‘मेरे ब्रह्यचर्य के प्रयोग’ ! उनकी यह दूसरी आत्म-कथा भी मानवता की बड़ी सेवा करती| मानव-समाज को तब यह मालूम पड़ता कि दुनिया में महापुरूष तो एक से एक बढ़कर हुए लेकिन गांधी-जैसा कोई नहीं हुआ| पिछले 55 वर्षों में गांधीजी के निजी जीवन पर चार-पांच ग्रंथ आ चुके हैं| जिनमें प्रो. गिरजाकुमार का शोध सर्वश्रेष्ठ है लेकिन अभी इस रहस्यमय मुद्दे पर काफी काम होना शेष है|
कामदेव से कौन पराजित नहीं हुआ ? क्या माओ, क्या लेनिन, क्या हिटलर, क्या आइंस्टीन, क्या कार्ल मार्क्स, क्या सिगमिंड फ्रायड, क्या तॉल्सतॉय, क्या लिंकन, क्या केनेडी और क्या क्लिंटन ? दुनिया के किसी भी बलशाली या धनशाली व्यक्ति का नाम लीजिए और उसके पीछे कोई न कोई रेला निकल आएगा| जिन्हें विभिन्न मज़हब और संप्रदाय अपना जनक कहते हैं और जिन्हें अवतारों और देवताओं की श्रेणी में रखा जाता है, ऐसे महापुरूष भी यौन-पिपासा के शिकार हुए बिना नहीं रहे लेकिन गांधी गजब के आदमी थे, वे 79 साल की उम्र में भी कामदेव से लड़ते रहे और उसे परास्त करते रहे| 37 साल की भरी जवानी में उन्होंने जो ब्रह्यचर्य का व्रत लिया, उसे उन्होंने अंतिम सांस तक निभाया| उन्होंने अपनी यौन-शक्ति का उदात्तीकरण किया| वे ऊर्ध्वरेता बने| जब कभी कुछ लड़खड़ाहट का अंदेशा हुआ, उन्होंने उसे छिपाया नहीं| अपने अति अंतरंग अनुभवों को भी उन्होंने अपने संपादकीय में लिख छोड़ा| वे सत्य के सिपाही थे| यदि मन में सोते या जागते हुए भी कोई कुविचार आया तो उन्होंने उसे अपने साथियों को बताया और उसके कारण और निवारण में वे निरत हुए|
ज़रा याद करें कि अपनी आत्म-कथा में उन्होंने अपनी कामुकता का चित्र्ण कितनी निर्ममता से किया है| उन्होंने अंतिम सांसें गिनते हुए पिता की उपेक्षा किसलिए की ? सिर्फ काम-वासना के वशीभूत होने के कारण ! इस काम-शक्ति ने अंतिम दम तक गांधी का पीछा नहीं छोड़ा| दक्षिण अफ्रीका में सिर्फ कालेनबाख ही नहीं, हेनरी पोलक और उनकी पत्नी मिली ग्राहम तथा उनकी 16 वर्षीय सचिव सोन्या श्लेसिन के साथ गांधी के संबंध इतने घनिष्ट और आत्मीय रहे कि कोई चाहे तो उनकी कितनी ही दुराशयपूर्ण व्याख्या कर सकता है| मिस श्लेसिन को केलनबाख ही गांधीजी के पास लाए थे| गांधीजी ने लिखा है कि श्लेसिन बड़ी नटखट निकली ”लेकिन एक महिने के भीतर ही उसने मुझे वश में कर लिया|” अपने पुरूष और महिला मित्रें के साथ गांधी के संबंध इतने खुले और सुपरिभाषित होते थे कि कहीं किसी प्रकार की मर्यादा-भंग का प्रश्न ही नहीं उठता था| तॉल्सतॉय फार्म और फीनिक्स आश्रम में गांधी जैसे खुद रहते थे, वैसे ही वे अपने अनुयायियों को भी रहने की छूट देते थे| उसका नतीज़ा क्या हुआ ? दोनों स्थानों पर अपि्रय यौन-घटनाएं घटीं| गांधी को विरोधस्वरूप उपवास करना पड़ा| कुछ लोगों को निकालना पड़ा| उनके अपने बेटे को दंडित करना पड़ा| गांधी-जैसे लौह-संयम और पुष्प-सुवास की-सी उन्मुक्त्ता क्या साधारण मनुष्यों में हो सकती है ? इन दो अतियों का समागम गांधी-जैसे अद्वितीय व्यक्ति में ही हो सकता था|
गांधीजी के दबाव में आकर आग्रमवासी ब्रह्यचर्य का व्रत तो ले लेते थे लेकिन वे लंबे समय तक उसका पालन नहीं कर पाते थे| स्वयं कालेनबाख इसके उदाहरण बने| गांधी के बड़े-बड़े अनुयायी वासनाग्रस्त होने से नहीं बचे लेकिन गांधी ने कभी घुटने नहीं टेके| गांधीजी के आश्रमों में रहनेवाले युवक-युवतियों को वे काफी छूट देते थे लेकिन उन पर कड़ी निगरानी भी रखते थे|
जहां तक कालेनबाख का सवाल है, वे उन्हें ‘लोअर चेंबर’ कहकर जरूर संबोधित करते थे लेकिन ऐसे अड़नाम उन्होंने अपने कई अन्य पुरूष और महिला मित्रें को दे रखे थे| रवीद्रनाथ ठाकुर की भतीजी सरलादेवी चौधरानी को वे अपनी ‘आध्यात्मिक पत्नी’ कहा करते थे| बि्रटिश एडमिरल की बेटी मिस स्लेड को उन्होंने ‘मीरा बेन’ नाम दे दिया था| अमेरिकी भक्तिन निल्ला क्रेम कुक को वे ‘भ्रष्ट बेटी’ कहा करते थे| बीबी अमतुस्सलाम को वे ‘पगली बिटिया’ बोला करते थे| दक्षिण अफ्रीका के अपने 21 वर्ष के प्रवास में गांधीजी ने ब्रह्यचर्य की जो शपथ ली, उसके पीछे उद्दीपक कारण उनका जेल का एक भयंकर अनुभव भी था| नवंबर 1907 में ट्रांसवाल की जेल में उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि एक चीनी और एक अफ्रीकी कैदी किस तरह पूरी रात वीभत्स यौन-क्रीड़ा करते रहे| उन्हें अपनी रक्षा के लिए पूरी रात जागना पड़ा| संतोनोत्पत्ति के अलावा किसी भी अन्य कारण के लिए किए गए सहवास को वे पाप मानने लगे| इस प्रतिज्ञा का पालन उन्होंने जीवन भर किया| अफ्रीकी कैदियों के दुराचरण को नजदीक से देखने के कारण ही गांधीजी ने जो टिप्पणी कर दी, उसके आधार पर उन्हें नस्लवादी कहना सर्वथा अनुचित है|
दक्षिण अफ्रीकी प्रवास के दौरान उन्होंने ब्रह्यचर्य पर काफी जोर दिया लेकिन भारत लौटकर 15-16 साल बाद गांधीजी ने ब्रह्यचर्य के कुछ ऐसे प्रयोग शुरू कर दिए, जो गांधी के पहले दुनिया में किसी ने नहीं किए| वे स्वयं पूर्ण नग्न होकर नग्न युवतियों और महिलाओं के साथ सोते थे, पूर्ण नग्नावस्था में महिलाओं से मालिश करवाते थे और रजस्वला युवतियों को मां की तरह व्यावहारिक मदद देते थे| गांधीजी के इन प्रयोगों पर राजाजी, विनोबा, कालेलकर, किशोरभाई मश्रूवाला, नरहरि पारेख और डॉ. राजेन्द्रप्रसाद जैसे गांधी-भक्तों ने भी प्रश्न चिन्ह लगाए| गांधीजी के साथी प्रो. निर्मलकुमार बोस ने गांधीजी के इस आचरण पर कड़ी आपत्ति भी की| नोआखली यात्र के दौरान गांधीजी के निजी सचिव आर.पी. परसुराम इतने व्यथित हुए कि उन्होंने पंद्रह  पृष्ठ का पत्र् लिखकर गांधीजी के प्रयोगों का विरोध किया और इस्तीफा दे दिया| फिर भी गांधीजी डटे रहे|
गांधीजी क्यों डटे रहे ? क्योंकि गांधीजी के मन में कोई कलुष नहीं था| वे कामशक्ति पर विजय पाने को अपनी आध्यात्मिकता का चरमोत्कर्ष समझते थे| वे चाहते थे कि वे स्वेच्छया पूर्णरूपेण नपुंसक बन जाएं, जैसा कि बाइबिल और कुरान में कहा गया है| वास्तव में वे उस हद तक पहुंच रहे थे| वे अपनी कुटिया में खिड़की-दरवाजें बंद करके कभी नहीं सोए| वे मालिश भी खुले मैदान में करवाते थे| वे अपनी परीक्षा तो रोज करते ही थे, आम लोगों को भी देखने देते थे कि वे इस परीक्षा में सफल हुए या नहीं| उनके बहुत निकट रहनेवाली लगभग दर्जन भर देसी और विदेशी महिलाओं में से किसी ने भी एक बार भी यह नहीं कहा कि गांधीजी ने कभी कोई कुचेष्टा की है| कुछ महिलाओं और युवतियों को गांधीजी ने अपने से दूर किया, क्योंकि उनमें से विकार के संकेत आने लगे थे| महिलाएं गांधीजी के संग क्यों आती थीं और उन पर क्या प्रतिकि्रया होती थी, यह एक अलग विषय है|
गांधीजी का ब्रह्यचर्य केथोलिक और हिंदू ब्रह्यचर्य से काफी अलग था| सहवास के अलावा उनके यहां दरस-परस-वचन-स्मरण आदि की छूट थी लेकिन पारंपरिक ब्रह्यचर्य के इन अपवादों में कहीं रत्ती भर भी वासना न हो, यह देखना गांधी का काम था| सरलादेवी चौधरानी के साथ चले ‘वासनामय’ प्रेम-प्रसंग को भंग करने के लिए गांधी ने जिस आध्यात्मिक साहस का परिचय दिया, वह बड़े-बड़े साधु-संतों के लिए भी ईर्ष्या का विषय हो सकता है| ऐसे गांधी पर कालेनबाख के हवाले से समलैंगिक होने का संदेह करना अपनी विकृत मानसिकता को गांधी पर आरोपित करना है|
जनसत्ता, 07अप्रैल 2011 : जोज़फ लेलीवेल्ड का भला हो कि उनकी वजह से गांधी पर एक बार फिर लंबी-चौड़ी बहस शुरू हो गई है| कृतज्ञ भारत गांधी को सिर्फ हर 2 अक्तूबर या 30 जनवरी को याद करने को मजबूर हो जाता है वरना गांधी अब अजायबघर की वस्तु हो गए हैं| लेलीवेल्ड की पुस्तक ”ग्रेट सोल : महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विथ इंडिया” कोई चालू किताब नहीं है| लेलीवेल्ड ने वर्षों के अनुसंधान के बाद यह पुस्तक लिखी है| वे ‘पुलिट्रजर’ जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के विजेता हैं| वे ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के कार्यकारी संपादक भी रह चुके हैं| उन्हें भारत और दक्षिण अफ्रीका में रहकर काम करने का भी अच्छा अनुभव है| उन्होंने अपनी पुस्तक पर लगे प्रतिबंध की कड़ी भर्त्सना की है और इस आरोप को बिल्कुल निराधार बताया है कि उन्होंने गांधी को समलैंगिक या नस्लवादी कहा है| उनका कहना है कि इस तरह के शब्द उनकी पुस्तक में कहीं आए ही नहीं हैं|  लेलीवेल्ड बिल्कुल ठीक हैं| उन्हें उनके शब्दों के आधार पर कोई भी नहीं पकड़ सकता लेकिन उनकी पुस्तक की एक समीक्षा ने उन्हें विवादास्पद बना दिया| एक बि्रटिश अखबार ने इस समीक्षा को आधार बनाकर महात्मा गांधी और उनके शिष्य हरमन कालेनवाख के संबंधों को उछाल दिया| उसने लेलीवेल्ड द्वारा वर्णित तथ्यों की ऐसी वक्र-व्याख्या की कि गांधी एक बार फिर चर्चा के घेरे में आ गए| लेलीवेल्ड ने गांधी और कालेनबाख के संबंधों के बारे में जो भी लिखा है, वह प्रामाणिक दस्तावेजों के आधार पर लिखा है| संपूर्ण गांधी वाड्रमय से उन्होंने कालेनबाख के नाम गांधी के पत्रें को उद्रधृत किया है| ये हरमन कालेनबाख कौन थे ? कालेनबाख गांधी से दो साल छोटे थे| वे जर्मन-यहूदी थे| वे 1904 में गांधी से मिले| गांधी और कालेनबाख इतने घनिष्ट मित्र् बन गए कि वे एक-दूसरे को दो शरीर और एक आत्मा मानते थे| कालेनबाख ने ही अपनी 1100 एकड़ भूमि गांधीजी को दी थी, जिस पर उन्होंने ”तॉल्सतॉय फार्म” नामक आश्रम खड़ा किया था| वे गांधी से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने ब्रह्यचर्य और शाकाहार का व्रत ले लिया| वे गांधीजी के सत्याग्रहों में जमकर भाग लेते, संगठनात्मक कार्य करते और आश्रम की व्यवस्था भी चलाते| ऐसे दो परम मित्रें के बीच समलैंगिक संबंधों की बात कैसे उठी ?  लेलीवेल्ड ने गांधीजी के पत्रें के कुछ शब्दों को इस तरह उद्रधृत किया कि उनके दोहरे अर्थ लगाए जा सकते हैं| जैसे गांधीजी खुद को ‘अपर चेंबर’ (उच्च सदन) और कालेनबाख को ‘लोअर चेम्बर’ (निम्न सदन) लिखा करते थे| लेलीवेल्ड ने इन दो शब्दों को तो उछाला लेकिन उन्होंने और उनके समीक्षकों ने यह नहीं बताया कि वे ऐसा क्यों लिखते थे ? कालेनबाख ‘लोअर हाउस’ की तरह बजट बनाते थे और गांधीजी ‘अपर हाउस’ की तरह उसमें  कतरब्योंत कर देते थे| इस आर्थिक पदावलि को यौन पदाविल में बदलनेवाले मस्तिष्क को आप क्या कहेंगे ? यह आधुनिक पश्चिमी जीवन-पद्घति का अभिशाप है| इसी तरह गांधी के पत्रें में जगह-जगह कालेनबाख के लिए लिखे गए ”स्नेह और अधिक स्नेह” जैसे शब्दों का भी गलत अर्थ लगाया गया| गांधी द्वारा अपने शयन-कक्ष में रखे गए कालेनबाख के चित्र् को भी उसी अनर्थ से जोड़ा गया| गांधी के  लगभग 200 पत्रें में उन्होंने कालेनबाख से अपने पूर्व-जन्म के संबंधों की बात भी कही है| ये सब बातें किसी भी भौतिकवादी सभ्यता के ढांचे में पले-बढ़े विद्वान या पत्र्कार के लिए अजूबा ही हो सकती हैं| वे यह मानकर चलते हैं कि दो पुरूषों या दो महिलाओं के बीच परम आत्मीयता का भाव रह ही नहीं सकता| यौन संबंधों के बिना आत्मीय संबंध संभव ही नहीं हंंै| वास्तव में गांधी इतने विलक्षण और इतने अद्वितीय थे कि उन्हें न तो परंपरागत पश्चिमी चश्मों से देखा जा सकता है और न ही परंपरागत भारतीय चश्मों से ! गांधी का सही रूप देखने के लिए मानवता को अपना एक नया चश्मा बनाना पड़ेगा| गांधी ने अपनी आत्म-कथा को ”मेरे सत्य के प्रयोग’ कहा है| यदि वे कुछ वर्ष और जीवित रहते और मेरी उनसे भेंट हो जाती तो मैं उनसे कहता कि आप एक आत्म-कथा और लिखिए और उसका शीर्षक दीजिए ‘मेरे ब्रह्यचर्य के प्रयोग’ ! उनकी यह दूसरी आत्म-कथा भी मानवता की बड़ी सेवा करती| मानव-समाज को तब यह मालूम पड़ता कि दुनिया में महापुरूष तो एक से एक बढ़कर हुए लेकिन गांधी-जैसा कोई नहीं हुआ| पिछले 55 वर्षों में गांधीजी के निजी जीवन पर चार-पांच ग्रंथ आ चुके हैं| जिनमें प्रो. गिरजाकुमार का शोध सर्वश्रेष्ठ है लेकिन अभी इस रहस्यमय मुद्दे पर काफी काम होना शेष है|  कामदेव से कौन पराजित नहीं हुआ ? क्या माओ, क्या लेनिन, क्या हिटलर, क्या आइंस्टीन, क्या कार्ल मार्क्स, क्या सिगमिंड फ्रायड, क्या तॉल्सतॉय, क्या लिंकन, क्या केनेडी और क्या क्लिंटन ? दुनिया के किसी भी बलशाली या धनशाली व्यक्ति का नाम लीजिए और उसके पीछे कोई न कोई रेला निकल आएगा| जिन्हें विभिन्न मज़हब और संप्रदाय अपना जनक कहते हैं और जिन्हें अवतारों और देवताओं की श्रेणी में रखा जाता है, ऐसे महापुरूष भी यौन-पिपासा के शिकार हुए बिना नहीं रहे लेकिन गांधी गजब के आदमी थे, वे 79 साल की उम्र में भी कामदेव से लड़ते रहे और उसे परास्त करते रहे| 37 साल की भरी जवानी में उन्होंने जो ब्रह्यचर्य का व्रत लिया, उसे उन्होंने अंतिम सांस तक निभाया| उन्होंने अपनी यौन-शक्ति का उदात्तीकरण किया| वे ऊर्ध्वरेता बने| जब कभी कुछ लड़खड़ाहट का अंदेशा हुआ, उन्होंने उसे छिपाया नहीं| अपने अति अंतरंग अनुभवों को भी उन्होंने अपने संपादकीय में लिख छोड़ा| वे सत्य के सिपाही थे| यदि मन में सोते या जागते हुए भी कोई कुविचार आया तो उन्होंने उसे अपने साथियों को बताया और उसके कारण और निवारण में वे निरत हुए| ज़रा याद करें कि अपनी आत्म-कथा में उन्होंने अपनी कामुकता का चित्र्ण कितनी निर्ममता से किया है| उन्होंने अंतिम सांसें गिनते हुए पिता की उपेक्षा किसलिए की ? सिर्फ काम-वासना के वशीभूत होने के कारण ! इस काम-शक्ति ने अंतिम दम तक गांधी का पीछा नहीं छोड़ा| दक्षिण अफ्रीका में सिर्फ कालेनबाख ही नहीं, हेनरी पोलक और उनकी पत्नी मिली ग्राहम तथा उनकी 16 वर्षीय सचिव सोन्या श्लेसिन के साथ गांधी के संबंध इतने घनिष्ट और आत्मीय रहे कि कोई चाहे तो उनकी कितनी ही दुराशयपूर्ण व्याख्या कर सकता है| मिस श्लेसिन को केलनबाख ही गांधीजी के पास लाए थे| गांधीजी ने लिखा है कि श्लेसिन बड़ी नटखट निकली ”लेकिन एक महिने के भीतर ही उसने मुझे वश में कर लिया|” अपने पुरूष और महिला मित्रें के साथ गांधी के संबंध इतने खुले और सुपरिभाषित होते थे कि कहीं किसी प्रकार की मर्यादा-भंग का प्रश्न ही नहीं उठता था| तॉल्सतॉय फार्म और फीनिक्स आश्रम में गांधी जैसे खुद रहते थे, वैसे ही वे अपने अनुयायियों को भी रहने की छूट देते थे| उसका नतीज़ा क्या हुआ ? दोनों स्थानों पर अपि्रय यौन-घटनाएं घटीं| गांधी को विरोधस्वरूप उपवास करना पड़ा| कुछ लोगों को निकालना पड़ा| उनके अपने बेटे को दंडित करना पड़ा| गांधी-जैसे लौह-संयम और पुष्प-सुवास की-सी उन्मुक्त्ता क्या साधारण मनुष्यों में हो सकती है ? इन दो अतियों का समागम गांधी-जैसे अद्वितीय व्यक्ति में ही हो सकता था| गांधीजी के दबाव में आकर आग्रमवासी ब्रह्यचर्य का व्रत तो ले लेते थे लेकिन वे लंबे समय तक उसका पालन नहीं कर पाते थे| स्वयं कालेनबाख इसके उदाहरण बने| गांधी के बड़े-बड़े अनुयायी वासनाग्रस्त होने से नहीं बचे लेकिन गांधी ने कभी घुटने नहीं टेके| गांधीजी के आश्रमों में रहनेवाले युवक-युवतियों को वे काफी छूट देते थे लेकिन उन पर कड़ी निगरानी भी रखते थे| जहां तक कालेनबाख का सवाल है, वे उन्हें ‘लोअर चेंबर’ कहकर जरूर संबोधित करते थे लेकिन ऐसे अड़नाम उन्होंने अपने कई अन्य पुरूष और महिला मित्रें को दे रखे थे| रवीद्रनाथ ठाकुर की भतीजी सरलादेवी चौधरानी को वे अपनी ‘आध्यात्मिक पत्नी’ कहा करते थे| बि्रटिश एडमिरल की बेटी मिस स्लेड को उन्होंने ‘मीरा बेन’ नाम दे दिया था| अमेरिकी भक्तिन निल्ला क्रेम कुक को वे ‘भ्रष्ट बेटी’ कहा करते थे| बीबी अमतुस्सलाम को वे ‘पगली बिटिया’ बोला करते थे| दक्षिण अफ्रीका के अपने 21 वर्ष के प्रवास में गांधीजी ने ब्रह्यचर्य की जो शपथ ली, उसके पीछे उद्दीपक कारण उनका जेल का एक भयंकर अनुभव भी था| नवंबर 1907 में ट्रांसवाल की जेल में उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि एक चीनी और एक अफ्रीकी कैदी किस तरह पूरी रात वीभत्स यौन-क्रीड़ा करते रहे| उन्हें अपनी रक्षा के लिए पूरी रात जागना पड़ा| संतोनोत्पत्ति के अलावा किसी भी अन्य कारण के लिए किए गए सहवास को वे पाप मानने लगे| इस प्रतिज्ञा का पालन उन्होंने जीवन भर किया| अफ्रीकी कैदियों के दुराचरण को नजदीक से देखने के कारण ही गांधीजी ने जो टिप्पणी कर दी, उसके आधार पर उन्हें नस्लवादी कहना सर्वथा अनुचित है| दक्षिण अफ्रीकी प्रवास के दौरान उन्होंने ब्रह्यचर्य पर काफी जोर दिया लेकिन भारत लौटकर 15-16 साल बाद गांधीजी ने ब्रह्यचर्य के कुछ ऐसे प्रयोग शुरू कर दिए, जो गांधी के पहले दुनिया में किसी ने नहीं किए| वे स्वयं पूर्ण नग्न होकर नग्न युवतियों और महिलाओं के साथ सोते थे, पूर्ण नग्नावस्था में महिलाओं से मालिश करवाते थे और रजस्वला युवतियों को मां की तरह व्यावहारिक मदद देते थे| गांधीजी के इन प्रयोगों पर राजाजी, विनोबा, कालेलकर, किशोरभाई मश्रूवाला, नरहरि पारेख और डॉ. राजेन्द्रप्रसाद जैसे गांधी-भक्तों ने भी प्रश्न चिन्ह लगाए| गांधीजी के साथी प्रो. निर्मलकुमार बोस ने गांधीजी के इस आचरण पर कड़ी आपत्ति भी की| नोआखली यात्र के दौरान गांधीजी के निजी सचिव आर.पी. परसुराम इतने व्यथित हुए कि उन्होंने पंद्रह  पृष्ठ का पत्र् लिखकर गांधीजी के प्रयोगों का विरोध किया और इस्तीफा दे दिया| फिर भी गांधीजी डटे रहे| गांधीजी क्यों डटे रहे ? क्योंकि गांधीजी के मन में कोई कलुष नहीं था| वे कामशक्ति पर विजय पाने को अपनी आध्यात्मिकता का चरमोत्कर्ष समझते थे| वे चाहते थे कि वे स्वेच्छया पूर्णरूपेण नपुंसक बन जाएं, जैसा कि बाइबिल और कुरान में कहा गया है| वास्तव में वे उस हद तक पहुंच रहे थे| वे अपनी कुटिया में खिड़की-दरवाजें बंद करके कभी नहीं सोए| वे मालिश भी खुले मैदान में करवाते थे| वे अपनी परीक्षा तो रोज करते ही थे, आम लोगों को भी देखने देते थे कि वे इस परीक्षा में सफल हुए या नहीं| उनके बहुत निकट रहनेवाली लगभग दर्जन भर देसी और विदेशी महिलाओं में से किसी ने भी एक बार भी यह नहीं कहा कि गांधीजी ने कभी कोई कुचेष्टा की है| कुछ महिलाओं और युवतियों को गांधीजी ने अपने से दूर किया, क्योंकि उनमें से विकार के संकेत आने लगे थे| महिलाएं गांधीजी के संग क्यों आती थीं और उन पर क्या प्रतिकि्रया होती थी, यह एक अलग विषय है| गांधीजी का ब्रह्यचर्य केथोलिक और हिंदू ब्रह्यचर्य से काफी अलग था| सहवास के अलावा उनके यहां दरस-परस-वचन-स्मरण आदि की छूट थी लेकिन पारंपरिक ब्रह्यचर्य के इन अपवादों में कहीं रत्ती भर भी वासना न हो, यह देखना गांधी का काम था| सरलादेवी चौधरानी के साथ चले ‘वासनामय’ प्रेम-प्रसंग को भंग करने के लिए गांधी ने जिस आध्यात्मिक साहस का परिचय दिया, वह बड़े-बड़े साधु-संतों के लिए भी ईर्ष्या का विषय हो सकता है| ऐसे गांधी पर कालेनबाख के हवाले से समलैंगिक होने का संदेह करना अपनी विकृत मानसिकता को गांधी पर आरोपित करना है|

लेखक/रचनाकार: डॉ० वेद प्रताप वैदिक

[ लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं। ] अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ की हैसियत से अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्षों. प्रधानमंत्रियों और विदेशमंत्रियों से व्यक्तिगत परिचय. अफगानिस्तान के लगभग सभी शीर्षस्थ नेताओं तथा पेशावर स्थित मुजाहिदीन नेताओं से सुदीर्घ परिचय और संवाद. अफगानिस्तान में शांति-स्थापना का विशेष प्रयास. फीजी, मोरिशस, त्र्िनिदाद, सूरिनाम और खाड़ी-देशों के भारतवंशियों के लिए सक्रिय सांस्कृतिक-सामाजिक कार्य. संसार भर की हिन्दी संस्थाओं और हिन्दी विद्वानों से सतत संपर्क| हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्प ! 

Friday, April 22, 2011

हिंदुओं की भावना भड़की है इसलिए उन्‍हें अपना गुस्‍सा निकालने दो।’ -Modi


हिन्दुस्तान अगर आज बाक़ी है तो ऐसे इंसाफ पसंद वीरों के दम से ही बाक़ी है .
ऐसे वीरों पर हज़ार अन्ना कुर्बान , जो अन्याय होते देख कर ठाकरे के खिलाफ बोले तक नहीं .
और संजीव भट्ट  उससे बड़े से डरे नहीं.
------------------------------------------------------------
Please go to 

नरेंद्र मोदी की मुश्किलें बढ़ गई हैं। 2002 में हुए दंगों के दौरान गुजरात में तैनात एक आईपीएस अफसर ने आरोप लगाया है कि उस वक्‍त सीएम हाउस में हुई बैठक में मोदी ने दंगाइयों को और उत्‍पात मचाने के लिए छूट देने का फैसला किया था। गुजरात दंगों की जांच में जुटी एसआईटी की नीयत पर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं। आरोप है कि एसआईटी ने खुफिया विभाग के अधिकारियों को सीएम द्वारा मीटिंग में दिए गए बयान को दर्ज नहीं करने के लिए अधिकारियों पर दबाव बनाया था।

आईबी में तैनात आईपीएस अफसर संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में 18 पन्‍ने का एक हलफनामा दायर किया है जिसमें उन्‍होंने मोदी और एसआईटी के बारे में सनसनीखेज खुलासे किए हैं। भट्ट ने एसआईटी पर नरेंद्र मोदी को बचाने का आरोप लगाया है।भट्ट ने हलफनामे में कहा है, ‘27 फरवरी 2002 को सीएम हाउस मे बैठक में मोदी ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि हिंदुओं की भावना भड़की है इसलिए उन्‍हें अपना गुस्‍सा निकालने दो।’
भट्ट का आरोप है कि एसआईटी के अधिकारियों ने खुफिया विभाग के अधिकारियों को हकीकत लिखने से मना करने के लिए दबाव डाला। आरोप है कि अधिकारियों का बयान दर्ज करते समय एसआईटी ने असिस्‍टेंट इंटेलिजेंस अफसर केडी पंत को धमकी कि वो मोदी के उस बयान को मत लिखवाएं, नहीं तो गिरफ्तार कर लिए जाएंगे।