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Sunday, June 5, 2011

BJP and Congress have same character. 'जैसा भूतनाथ वैसा प्रेतनाथ'

हमारी नज़र में तो जैसा भूतनाथ वैसा प्रेतनाथ ।
शासन तो BJP का भी आया था ।

1. क्या उसने लोकपाल बिल मंज़ूर कराया ?

2. क्या वह विदेशों से काला धन वापस लाई ?

आज अपने वोट बैंक खो देने के डर से ये बाबा का साथ दे रहे हैं । जो इनके ख़िलाफ़ नहीं बोलता , उसे क्या उपाधि दी जाएगी ?

अनवर जमाल बोलता है सच और ग़द्दार सच कभी सुनता नहीं ।

टिप्पणी सुरक्षित कर ली गई है । यहाँ से हटेगी तो वाटिका में लगेगी ।

वंदे ईश्वरम्
........

और फिर सचमुच ऐसा हुआ कि आदरणीय प्रोफ़ेसर पी. के. मिश्रा जी सच को सहन नहीं कर पाए और अपने विरूद्ध समझकर उन्होंन इस टिप्पणी को अपने ब्लॉग हरी धरती से मिटा डाला।
लेकिन सच कभी मिटता नहीं है। कमेंट गार्डन यही सिद्ध करता है।

Monday, May 9, 2011

9 मई का दिन हमारी मंगनी का दिन है, एक हर्ष संदेश


My wife
9 मई का दिन हमारी मंगनी का दिन है। (सन 1999)
जज़्बात अच्छे हैं जो गाने के माध्यम से पेश किए गए।
... और हां,

ब्लॉग जगत की तमाम परेशान आत्माओं के नाम एक हर्ष संदेश
अब आप मुझे जैसे ढालना चाहें, ढाल लें,
सलाह और सुझाव आमंत्रित हैं,
अवधि मात्र 3 दिवस है।
ऐसा क्यों कह रहा हूं, यह भी एक पूरी पोस्ट का विषय है जो कि मैं बनाऊंगा नहीं। बस, सलाह दीजिए और पालन कराइये।
जय हिंद !   
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Thursday, April 28, 2011

खुशामद के रूप


@ शन्नो जी ! गोपालकृष्ण गांधी जी एक प्रशासनिक अधिकारी रह चुके हैं और भारत सरकार के लिए वह ऊंचे पदों पर काम कर चुके हैं। उन्हें अक्सर खुशामदी लोगों से वास्ता पड़ता रहा है और इसीलिए उन्हें खुशामद करने वाले मतलबी लोगों से नफ़रत हो गई है। इस लेख उन्होंने अपने अनुभव को ही बयान किया है। लेकिन खुशामद के कुछ रूप और भी हैं जो कि उनकी नज़र से या तो चूक गए हैं या फिर इस लेख में नहीं आ पाए होंगे।
कोई बच्चा जब दूध पीने से इंकार कर देता है तो मां-बाप उसकी खुशामद करते हैं कि वह दूध पी ले। ज़ाहिर है कि यह ख़ालिस खुशामद होती है लेकिन इसमें अपने बच्चे से नफ़रत करना नहीं पाया जाता। कोई लड़की जब किसी के झूठे प्यार में गिरफ़्तार हो जाती है तो भी उसके मां-बाप उसकी खुशामद करते हैं कि वह उसे अपने दिल से निकाल दे। रूठकर मायके गई बीवी को वापस लाने के लिए उसकी कितनी खुशामद करनी पड़ती है, इसका मुझे तो पता नहीं है और हो सकता है कि डा. श्याम गुप्ता जी को भी इसका पता न हो। बैंक में अनपढ़ लोगों को अपने फ़ॉर्म भरवाने के लिए पढ़े-लिखे लोगों की खुशामद करते हरेक देख सकता है। शादी-विवाह में लंबे-लंबे मंत्र पढ़ने वाले पंडित जी को जल्दी से निपटाने के लिए खुशामद करते हुए भी देखा जा सकता है। ग़र्ज़ यह कि ऐसे बहुत से मौक़े होते हैं जहां खुशामद ज़रूरी होती है और वह कभी एक जायज़ अमल होती है और कभी पसंदीदा भी। खुशामद का मात्र वही रूप घृणित है जहां उसके पीछे सिर्फ़ और सिर्फ़ नाजायज़ लालच पोशीदा हो और खुशामद करने वाले का दिल ख़ैरख्वाही से ख़ाली हो।
आपकी टिप्पणी के लिए आपका शुक्रिया। 
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/04/praise.html

Monday, April 25, 2011

रावण को निंदनीय ही मानना चाहिए Ramayana


गगन शर्मा जी ! आपने मेरे कथन पर मनन किया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। आप जानते हैं कि आरूषि हत्याकांड हमारे समय की ही घटना है और हज़ारों लोगों ने इसे लिखा भी है। इसके बावजूद हम नहीं जानते कि वास्तव में उस बच्ची के साथ क्या मामला पेश आया था ?
श्री रामचन्द्र जी का काल लगभग 8-9 करोड़ साल पुराना है। कथाकार बाल्मीकि भी उनके समकालीन ही थे। अलग अलग लोगों ने उनके काल की अलग अलग गणना की है। पं. सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ जी ने आज से 12 लाख 96 हज़ार साल पहले उनका काल माना है। बहरहाल जो भी काल माना जाए लेकिन न तो संस्कृत भाषा इतनी पुरानी है और न ही यह रामायण।
इस संबंध में भाषा वैज्ञानिकों की आधुनिक खोज पर भी आप एक नज़र डाल लीजिए।

आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि इसी बाल्मीकि रामायण में बौद्धों की निंदा भी भरी हुई है, जिससे पता चलता है कि यह गौतम बुद्ध के बाद की रचना है। देखिए :
यथा हि चोरः स तथा हि बुद्धः तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि,
तस्माद् हि सः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात्
                  -अयोध्या कांड, 109, 34
अर्थात जैसे चोर दंडनीय होता है, इसी प्रकार (वेदविरोधी) बुद्ध (बौद्ध मतावलंबी) भी दंडनीय है। तथागत (नास्तिक विशेष) और नास्तिक (चार्वाक) को भी इसी कोटि में समझना चाहिए। इसीलिए प्रजा पर अनुग्रह करने के लिए राजा द्वारा जिस नास्तिक को दंड दिलाया जा सके, उसे चोर के समान दंड दिलाया ही जाए, परंतु जो वश के बाहर हो, उस नास्तिक के प्रति विद्वान ब्राह्ममण कभी उन्मुख न हों, उस से वार्तालाप तक न करें। (देखें श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण, हिंदी अनुवाद, पृ. 303, गीता प्रेस गोरखपुर, सं 2033)
इस संबंध में आप सुरेन्द्र कुमार शर्मा जी का एक शोधपरक लेख ‘रामायण की ऐतिहासिकता‘ भी अवश्य देखें, जो कि उनकी पुस्तक ‘क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिंदू धर्म ?‘ में संकलित है। उपरोक्त अंश उनकी इसी पुस्तक के पृ. सं. 424 से लिया गया है। यह पुस्तक आप ‘विश्वबुक्स दिल्ली‘ से हासिल कर सकते हैं।
मेरा मानना है कि रावण निंदनीय था तभी तो उसे श्री रामचनद्र जी ने मारा। उसके निंदनीय होने में जो बात भी शक पैदा करे उसे ग़लत समझा जाए। श्री रामचन्द्र जी समता, न्याय और वीरता के गुणों से युक्त थे। जो बात भी उनके इन गुणों के विपरीत जाए, उसे तुरंत ही त्याज्य मान लेना चाहिए। इस प्रकार हम चाहे श्री रामचन्द्र जी की वास्तविक कथा से भले ही परिचित न हो पाएं लेकिन इस प्रकार हम उनका आदर तो ढंग से कर पाएंगे और रामायण के केन्द्रीय पात्रों पर उठने वाली आपत्तियों का निराकरण भी हो जाएगा।
ऐसा मेरा मत है। इससे बेहतर कोई और बात संभव हो तो उसे आप बताएं ताकि मैं उसे मान लूं।
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Sunday, April 24, 2011

जिन्होंने औरत को पूरा नंगा कर दिया, उसे अपमानित ही कर डाला वे नेकनाम कैसे बने घूम रहे हैं ‘सम्मान बांटने का पाखंड‘ रचाते हुए ? Shamefull act

Anwer Jamal , Srinagar , Kashmir
@ आदरणीय भाई खुशदीप सहगल जी ! मैंने आपकी नसीहत को ग़ौर से दो बार पढ़ा, आधे घंटे के अंतराल से। आपने मुझे नसीहत की है जिससे मेरे प्रति आपकी फ़िक्रमंदी का पता चलता है लेकिन आपकी नसीहत पर अमल करने से पहले मुझे अपनी पूरी स्ट्रैटेजी पर ग़ौर करना होगा और आपको भी यह जानना ज़रूरी है कि यह सब आखि़र हो क्यों रहा है ?
हालांकि इसे बयान करने के लिए एक पूरी पोस्ट दरकार है लेकिन संक्षेप में अर्ज़ करता हूं कि ‘मैं न कोई संत हूं और न ही कोई जोकर।‘
संत का काम क्षमा करना होता है और जोकर का हंसाना। मैं जज़्बात से भरा हुआ एक आम आदमी हूं, एक पठान आदमी। पठान का मिज़ाज क़बायली होता है, वह आत्मघाती होता है। वह हर चीज़ भूल सकता है लेकिन वह इंतक़ाम लेना नहीं भूलता। मैं आर्यन ब्लड हूं। इस्लाम को पसंद करने के बावजूद मैं अभी भी इस्लाम के सांचे में पूरी तरह ढल नहीं पाया हूं। अभी मैं अंडर प्रॉसैस हूं। इसी हाल में मैं हिंदी ब्लॉगर बन गया। मेरे दीन का और खुद मेरा तिरस्कार किया गया। एक लंबे अर्से तक सुनामी ब्लॉगर्स मेरी छवि को दाग़दार करते रहे और बाक़ी ब्लॉगर्स मुझे दाग़दार करने वालों की चिलम भरते रहे। ये वही लोग हैं जिन्हें नेकी और नैतिकता का ख़ाक पता नहीं है। जो कुछ मुझे दिया गया है, मैं उसके अलावा उन्हें और क्या लौटा सकता हूं ?
इसीलिए आपको मेरे लेख में आक्रोश मिलेगा, प्रतिशोध मिलेगा, अपमान और तिरस्कार भी मिलेगा, कर्कश स्वर और दुर्वचन भी मिलेगा, टकराव और संघर्ष मिलेगा। आपको मेरे लेख में बहुत कुछ मिलेगा लेकिन असत्य नहीं मिलेगा। ‘छिनाल छिपकली प्रकरण‘ भी ऐसी ही एक घटना है जो कि एक वास्तविक घटना है। औरत को सरेआम नंगा किया गया लेकिन कोई मर्द नहीं आया इसकी निंदा करने। द्रौपदी की साड़ी ज़रा सी खींचने पर तो दुःशासन आज तक बदनाम है और जिन्होंने औरत को पूरा नंगा कर दिया, उसे अपमानित ही कर डाला वे नेकनाम कैसे बने घूम रहे हैं ‘सम्मान बांटने का पाखंड‘ रचाते हुए ?
इस प्रकरण को लेख से निकालने का मतलब है अपने लेख के मुख्य संदेश को निकाल देना, फिर इसमें बचेगा ही क्या ?
इसी संदेश को रूचिकर बनाने के लिए अन्य मसाले भरे गए हैं। जिसे आप एक कंकर की तरह अप्रिय समझ रहे हैं, वास्तव में वही मुद्दे की बात है। हां, अगर वह झूठ हो तो मैं उसे निकाल दूंगा , झूठ से मेरा कोई संबंध नहीं है। अपने विरोधी के खि़लाफ़ भी मैं झूठ नहीं बोलूंगा।
मेरा बहिष्कार करके मेरे विरोधियों ने और उनके सपोर्टर्स ने मेरा क्या बिगाड़ा ?
किसी से कोई रिश्ता बनने ही नहीं दिया कि किसी से कोई मोह होता, किसी के दिल दुखने की परवाह होती। जब किसी को हमारी परवाह नहीं है तो फिर भुगतो अपने कर्मों को। मत आओ हमारे ब्लॉग पर, मत दो हमें टिप्पणियां और फिर भुगतो फिर उसका अंजाम। ऐसा मैं सोचता हूं और जो मैं सोचता हूं वही अपने ब्लॉग पर लिखता हूं।
क्या ब्लॉग पर सच्चाई लिखना मना है ?
इसके बावजूद मेरे दिल में कुछ लोगों के प्यार भी है और सम्मान भी। प्रिय प्रवीण जी के साथ आप और डा. अमर कुमार जी ऐसे ही लोग हैं। डा. अमर कुमार जी के ज्ञान में वृद्धि की कोशिश करना सूरज को दिया दिखाना है और आपको मैं अपना मानता हूं।
आपकी सलाह प्रैक्टिकल दुनिया में जीने का बेहतरीन उपदेश है। मैं इस सलाह की क़द्र करता हूं। महानगरीय जीवन में यह उसूल लोगों की ज़िंदगी में आम है लेकिन मैं एक क़स्बाई सोच वाला आदमी हूं, मेरा माहौल भी आपसे थोड़ा अलग है। इसलिए हो सकता है कि आपकी सलाह पर अमल करने में मुझे कुछ समय लग जाए।
एक नेक सलाह के लिए मैं आपका दिल से आभारी हूं।
शुक्रिया !
http://tobeabigblogger.blogspot.com/2011/04/family-life.html 
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कृपया देखें

कैसा होता है एक बड़े ब्लॉगर का वैवाहिक जीवन ? Family Life

Tuesday, April 12, 2011

दूरियों को पाटना ही हमारा काम होना चाहिए The Reformation

@ आशुतोष जी ! धर्म ईश्वर की ओर से होता है और सत्य हमेशा मंगलकारी होता है। यह परम सत्य है। इसी परम सत्य को हिंदू ऋषियों ने जाना पहचाना और इसी का ज्ञान लोगों को दिया। उनके धर्म का नाम ही हिंदू धर्म है और हरीश सिंह जी को अपने हिंदू होने पर गर्व है लिहाज़ा उन्हें हिंदू धर्म में कमी नज़र नहीं आती है और उन्होंने कहा भी है कि गीता में संपूर्ण सत्य विद्यमान है। उन्होंने कमी बताई है हिंदू समाज में और यह इतिहास से सिद्ध है, आपने भी माना है कि कालांतर में कई तरह के विकार समाज में फैले और तमाम सुधारों के बावजूद ये विकार आज भी समाज में देखे जा सकते हैं। इन्हीं में से कुछ का ज़िक्र उन्होंने किया है। उन्होंने इन्हीं कुरीतियों का विरोध किया है जो कि एक आदमी को दूसरे आदमी से दूर करती हैं। कुरीतियों के विरोध को हिंदू विरोध की संज्ञा नहीं दी जा सकती और न ही देनी चाहिए वर्ना समाज सुधार का कार्य असंभव हो जाएगा।
राजा राम मोहन राय ने जब सती प्रथा का विरोध किया और हिंदू कन्याओं को शिक्षा देनी की शुरूआत की तो धर्माचार्यों द्वारा उनके कामों को हिंदू धर्म को मिटाने वाला कहा गया, जो कि सही नहीं था। आज यह बात सब जानते हैं। अगर हरीश जी की बातों को आप उन्हीं के कथन से समझने की कोशिश करते तो आसानी से उनकी मंशा आप समझ लेते और अगर आप उनकी पोस्ट पर मेरी टिप्पणी भी पढ़ लेते तो आपको यह भी पता चल जाता कि एक आदमी एक साथ ही हिंदू और मुस्लिम हो सकता है।
मुस्लिम वह है जो कि अपनी इच्छाओं पर न चलकर ईश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पित होकर उसके आदेशों को पालन करता है। ईश्वरीय ज्ञान के आलोक में चलने वाला आदमी कभी अज्ञान के अंधेरों में नहीं भटक सकता। इसलाम एक ही है, उसका स्रोत है ईश्वरीय ज्ञान कुरआन और उसे अपने आचरण से जीवंत से करने वाले पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब स. का जीवन चरित्र और उनके कथन। अगर आप मुस्लिम अर्थात ईश्वर के प्रति समर्पित होकर जीवन गुज़ारने के इच्छुक हैं तो आप कुरआन और हदीस, दोनों का अध्ययन खुद कर लीजिए । सत्य सरल और स्पष्ट है, निष्पक्ष होते ही आप पर तुरंत खुल जाएगा। जिन कामों से उनमें आपको रूकने के लिए कहा जाए, उनसे आप रूक जाएं और जिन कामों को करने के लिए कहा गया है, उन्हें आप करने लगें। बस, हो गए आप मुस्लिम।
लेकिन अगर ये सवाल आप सत्य और ज्ञान पाने के उद्देश्य से नहीं कर रहे हैं तो फिर आपको कोई नहीं बता पाएगा कि ईश्वर के आदेश के अनुसार जीवन कैसे व्यतीत किया जाए ?
मुस्लिम समाज में भी जब ईश्वरीय ज्ञान के बजाय बादशाहत और व्यक्तिवाद हावी हो गया और जनता भी ज्ञान के बजाय अपनी इच्छाओं के पीछे चलने लगी तो मुसलमानों में भी बहुत से मत बन गए और बहुत सी ख़राबियां पैदा हो गईं। ख़राबियों को दूर करना और दूरियों को पाटना ही हमारा काम होना चाहिए, न कि इन्हें बाक़ी रखना या इन्हें और ज़्यादा बढ़ा देना।
मत-मतांतर में बंटी हुई मानवता को एक करने के लिए प्रयास किये जाएं, आज यह समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
इस विषय में आप मेरा एक और लेख देख सकते हैं-

शांति के लिए वेद कुरआन The absolute peace

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इस कमेन्ट की पृष्ठ भूमि जानने के लिए देखें

हिन्दू कट्टर कैसे........... ?  मेरी नजर में कट्टरता....

Monday, April 11, 2011

धर्म कभी कष्ट नहीं देता, कभी अनिष्ट नहीं करता Simple Teachings

मेरे योग गुरु पंडित अयोध्या प्रसाद मिश्र जी ( 84 वर्षीय )
आपने विषय को गहराई से समझने का प्रयास किया है और उसे सच्चाई से कहने का साहस भी किया है। यही सच हमें मार्ग दिखाता है। आपने सच कहा है कि हमें रचने वाला परमेश्वर एक ही है। इसीलिए हरेक देश में रहने वाले इंसानों की बनावट एक ही है। जब हम ग़ौर से देखते हैं तो पता चलता है कि हमारे माता-पिता भी एक ही हैं। अंतर मात्र इतना है कि अलग-अलग भाषाओं में उनके नाम अलग-अलग हैं। जैसे कि सूर्य को अरबी में शम्स कहा जाता है लेकिन इन दोनों ही नामों से अभिप्रेत एक ही चीज़ होती है।
कालांतर में वासनाओं में जीने वालों ने खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढालने के नाम पर बहुत सी चीज़ें और बहुत सी नई परंपराएं धर्म में मिला दीं। हिंदू धर्म के साथ भी यही किया गया और इसलाम के साथ भी और यह काम हमेशा हुआ। इन्हीं कुरीतियों ने समाज को बहुत कष्ट दिया है। ये कुरीतियां कभी धर्म नहीं थीं। धर्म कभी कष्ट नहीं देता, कभी अनिष्ट नहीं करता। कल्याण धर्म में ही निहित है। हमारा कल्याण ईश्वर के प्रति अपनी इच्छाओं को समर्पित करके उसके मार्गदर्शन में जीवन गुज़ारने में ही है। इसीलिए
हमारे पूर्वज हमें ईश्वर से जोड़ते हैं जो कि कल्याणकारी है The Lord Shiva and First Man Shiv ji

अल्लाह के रसूल (स.) ने फ़रमाया-
‘ज़ुल्म से बचते रहो, क्योंकि ज़ुल्म क़ियामत के दिन अंधेरे के रूप में ज़ाहिर होगा और लालच से भी बचते रहो, क्योंकि तुम से पहले के लोगों की बर्बादी लालच से हुई है। लालच की वजह ही से उन्होंने इन्सानों का खून बहाया और उनकी जिन चीज़ों को अल्लाह ने हराम किया था, उन्हें हलाल कर लिया।‘ 
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इस कमेन्ट की पृष्ठभूमि जानने के लिए देखें 

हिन्दू कट्टर कैसे........... ?  मेरी नजर में कट्टरता....

Saturday, April 9, 2011

अन्ना हज़ारे का काम प्रशंसनीय है लेकिन हमें और भी ज़्यादा गहरी नज़र से देखना होगा Anna Hajare


@ आकांक्षा जी ! हमारी वाणी पर लेख का शीर्षक देखकर आपके ब्लॉग पर आया और आपका पहला लेख पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यहां आकर निराश नहीं होना पड़ा। आपने सच बात कही, मेरे मन की कही और जो मैं लिखने का इरादा कर रहा था, वह आपकी क़लम से ही सामने आ गया। लोग वास्तव में सुधार के इच्छुक होते तो सुधार की शुरूआत खुद से, अपने घर और अपने गांव से करते। बड़े नेता और अफ़सर बेईमान और भ्रष्ट हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि इस देश के ग़रीब नेक हैं। बड़े लोग अपने दायरे में भ्रष्ट हैं और ग़रीब लोग अपने दायरे में। लोग अपने दायरे में बेईमान  और अनुशासनहीन रहते हुए दूसरों पर दबाव बना रहे हैं कि वे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ बन जाएं। दबाव में सरकार कोई क़ानून बना भी देगी तो भी क्या फ़र्क़ पड़ने वाला है ?
क्या कन्या भ्रूण हत्या और दहेज निषेध के लिए, धोखाधड़ी, हत्या और दीगर तमाम जुर्मों को रोकने के लिए पहले ही क़ानून बने हुए नहीं हैं। इसके बावजूद हर साल क्राइम का ग्राफ़ बढ़ता ही जा रहा है। अन्ना हज़ारे का काम प्रशंसनीय है लेकिन हमें और भी ज़्यादा गहरी नज़र से देखना होगा और खुद को तो बहरहाल बदलना ही होगा।
एक अच्छे लेख के लिए आप यक़ीनन तारीफ़ की हक़दार हैं।

http://charchashalimanch.blogspot.com/2011/04/anwer-jamal.html
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Please see   

कौन सी क्रांति ला रहे हैं अन्ना ??

सत्य को असत्य कल्पनाओं के साथ गडमड मत कीजिए The Great mistake

भगवान वह है जो कि जन्म नहीं लेता। सर्वव्यापी वह है जो सर्वज्ञ है। आपकी यह बात सही है कि बहुत सी चीज़ें आंख से दिखाई नहीं देतीं लेकिन अक्ल को मानना पड़ता है कि वे हैं। ईश्वर है, इस बात को आदमी जान सकता है लेकिन ईश्वर की सत्ता को साबित करने के लिए आपका मिथकीय उदाहरण मुझे सही नहीं लगता। आपने बताया कि कृष्ण ईश्वर थे। कृष्ण जी ईश्वर नहीं थे बल्कि एक अच्छे राजा थे। वेदों के अनुसार इंद्र ने उनकी गर्भवती औरतों की हत्या की थी। श्रीमद्भागवतपुराण उनके बारे में ऐसी अश्लील बातें बताता है जो कि न पढ़ने लायक़ हैं और न ही सुनने लायक़। इसीलिए वे झूठ हैं। महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण जी ने अपने लाखों सैकिन बदमाश दुर्योधन (?) को दे दिए थे और फिर उन्हें पांडवों से मरवा डाला। सत्य रक्षक कभी बदमाशों को सपोर्ट नहीं करता। क्या भारत पाक युद्ध में कोई कृष्णभक्त प्रधानमंत्री अपनी सेना पाकिस्तान को दे सकता है कि उसकी तरफ़ से मिलकर भारत पर हमला कर देना ?
यही कहानियां बताती हैं कि श्री कृष्ण जी के बच्चे ऋषियों से मसख़री करने लगे थे तो उन्होंने श्राप देकर सबको आपस में लड़ा मारा और सब नष्ट हो गए।
ईश्वर के बच्चे भी हो गए ?
और वे अनाचारी भी हो गए ?
और उन्हें ठिकाने उन्होंने लगा दिया जो कि न ईश्वर थे और न ही ईश्वर के बच्चे ?
लोगों को उलझाईये मत। ईश्वर अजन्मा और अविनाशी है। उसके न कोई पत्नी है और न मां-बाप।
ईश्वर है, यह सत्य है। सत्य को असत्य कल्पनाओं के साथ गडमड मत कीजिए वर्ना लोग असत्य के साथ सत्य का भी इंकार करने पर मजबूर हो जाएंगे। 

Saturday, April 2, 2011

मार्गदर्शक मंडल हमारी वाणी के साथ ऐसी दुश्मनी दोस्ती की आड़ में क्यों कर रहा है ? Conspiracy

मंगलायतन: हमारीवाणी की दादा गिरी
मनोज पांडेय जी ! आप तो फिर भी खुशनसीब हैं कि आपकी टिप्पणी को छपना तो नसीब हो गया। द्विवेदी जी से हमने कहा था कि यह शिकायत हमने की है और हमने अपना नाम नहीं छिपाया है चाहे तो ब्लॉग की ख़बरें की ताज़ा दो पोस्ट देख लीजिए। उन्होंने अभी तक तो हमारी टिप्पणी पब्लिश ही नहीं की है।
आपकी तो दो दो पब्लिश कर दी हैं।
भाई साहब, आपकी शिकायत जायज़ है।
अगर कोई एक लेखक कई जगह लिख रहा है तो इनके पेट में दर्द क्यों उठता है ?
अगर लेखक का नाम टैग में चमक रहा है, शीर्षक के साथ भी दिख रहा है तो इन्हें क्या परेशानी है कि फ़ोटो ब्लॉग के संयोजक का क्यों दिख रहा है ?
अरे भाई तुम हो कौन ?
तुम एक एग्रीगेटर हो। कोई अश्लील सामग्री आए तो ज़रूर उसे हटाइये लेकिन बेजा पैर फसांएगे तो ब्लॉगर्स के लिए दूसरे एग्रीगेटर्स और बहुत हैं लेकिन हमारी वाणी विवादित और अलोकप्रिय हो ही जाएगी। मार्गदर्शक मंडल ऐसी ही परिस्थितियां बना रहा है। लेकिन मार्गदर्शक मंडल हमारी वाणी के साथ ऐसी दुश्मनी दोस्ती की आड़ में क्यों कर रहा है ?
मैंने भी इस संबंध में कुछ लिखा है।
भाई साझा ब्लॉग वाले ब्लॉगर्स भी हर दम कंप्यूटर पर सवार नहीं रहते कि पोस्ट आते ही तुरंत जान लें कि किसने कौन सी पोस्ट कितने ब्लॉग्स पर डाली है ?
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