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Saturday, April 9, 2011

एक और एग्रीगेटर ने भी साझा ब्लाग के रास्ते में दिक्कतें खड़ी कर दी हैं No Problem

भाई हरीश जी ! बड़ी धांसू पोस्ट लिखी है आपने। ब्लॉग की ख़बरें पर आपने जो फ़ोटो लगाया है उससे उसका लुक फ़िल्मी सा हो गया है जो कि आकर्षित करता है।
हमारी वाणी के मार्गदर्शक मंडल की नीतियां साझा ब्लॉग के खि़लाफ़ हैं। हरेक साझा ब्लॉग के अपने मक़सद हैं। कोई लेखक कहां पोस्ट डाल रहा है और कितनी जगह डाल रहा है ?
यह मैटर ब्लॉग के संयोजक-संपादक और लेखक के बीच का है न कि एग्रीगेटर का। अगर वह एक पोस्ट को एक से ज़्यादा बार अपने मेनपेज पर नहीं दिखाना चाहता है तो वह एक पोस्ट को ही दिखाए और अन्य को हटा दे। यह अधिकार उसे है। लेकिन यह क़तई दुरूस्त नहीं है कि इसके लिए वह साझा ब्लॉग को निलंबित कर दे और उनके संयोजकों से माफ़ियां मंगवाए। हमने न तो माफ़ी मांगी है और न ही इसे अपना कोई जुर्म मानते हैं कि इसके लिए हम माफ़ी मांगें।
हां, हमारी वाणी को नैतिक रूप से अपनी ग़लती स्वीकारते हुए अकारण निलंबित किए गए साझा ब्लाग्स के संयोजकों से ज़रूर माफ़ी मांगनी चाहिए और अगर वह हठवश माफ़ी नहीं भी मांगती है, तब भी हम उसे माफ़ कर देंगे क्योंकि हमारा दिल बड़ा है।
मैंने हमारी वाणी को बताया है कि साझा ब्लॉग के संयोंजक को बहुत से काम रहते हैं और बिजली सप्लाई भी अनियमित है, ऐसे में उसके लिए हर समय इंटरनेट पर मौजूद रहना संभव ही नहीं है। उदीयमान हिंदी ब्लॉगर में एक जज़्बा होता है कि मेरे लेख को ज़्यादा से ज़्यादा ब्लॉग पर देखा जाए। उनके जज़्बे पर नियम के हथौड़े चलाए जाएंगे तो हिंदी ब्लॉगिंग को हानि ही पहुंचेगी। फ़ेसबुक पर एक ही पोस्ट, एक ही आदमी का फ़ोटो हज़ारों और लाखों जगह पड़ा रहता है और उसे उसकी लोकप्रियता माना जाता है। तब हिंदी एग्रीगेटर उसके विपरीत जा रहे हैं जो कि हमारी वाणी और हिंदी ब्लॉगिंग दोनों के ही विपरीत है।
हमारी वाणी की देखा-देखी एक और एग्रीगेटर ने भी साझा ब्लाग के रास्ते में दिक्कतें खड़ी कर दी हैं। हरेक एग्रीगेटर निजी और सामूहिक ब्लॉग की मनमाफ़िक परिभाषाएं गढ़कर नियम पे नियम पेले जा रहा है।
जानना चाहिए कि साझा ब्लॉग एक मंच मुहैया कराता है हिंदी ब्लॉगर्स को आपस में जुड़ने के लिए। बातें फ़ासलों की दीवारें गिराती हैं और प्यार की फ़सल उगाती हैं बशर्ते कि अपने नज़रिये को बयान करने साथ साथ दूसरों के नज़रियों को, उनके हालात को भी सहानुभूतिपूर्वक समझने की कोशिश की जाए। आम तौर पर साझा ब्लॉग पर लेखक संयत भाषा का प्रयोग करते हैं और उन्हें दूसरों के नज़रियों से भी अवगत होने का मौक़ा मिलता है जो कि एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है। साझा हित के लिए काम करने वाले साझा ब्लॉग को ब्लॉग माफ़ियाओं के चंगुल से आज़ाद रखने की हरसंभव कोशिश की जानी चाहिए। जब तक हमारी वाणी आपके ब्लॉग बिना किसी माफ़ीनामे के स्वीकार नहीं करेगी, तब तक हम भी अपने दो साझा ब्लॉग को हमारी वाणी पर नहीं भेजेंगे। एकता में बल है और हम आपके साथ हैं बिना आपसे किसी बदले की अपेक्षा के। आप पर कोई दबाव नहीं है, आप जो चाहें वह निर्णय करने के लिए स्वतंत्र हैं। हम आपके साथ हैं हर हाल में।
आपके भतीजे उपेन्द्र की तबीयत अब कैसी है ?
चिकित्सा के लिए आप उसे जहां ले गए थे, वहां उसे क्या उपचार दिया गया और क्या कहा गया उसके बारे में ?
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माफियाओं के चंगुल में ब्लागिंग - 2

क्या इसी सभ्यता पर करेंगे हिंदी का सम्मान [ दूसरा  भाग]

Wednesday, April 6, 2011

क्या दिनेशराय द्विवेदी जी भारत के पी. एम. से भी ऊँचे किसी रूतबे पर बिठा दिए गए हैं ?

सुनिये मेरी भी....: सलीम खान से डरते हो आप, आपके दिल में भी कोई जगह तक नहीं उसके लिये... इतने छोटे दिल के साथ कैसे ' हमारी वाणी ' कहला सकते हो आप ?






Comment No. 1
द्विवेदी जी के विरोध पर हमारे दो ब्लॉग्स का निलंबन क्यों ?
दिनेशराय द्विवेदी जी अपनी उम्र और अपने इल्म की वजह से हमारे लिए आदरणीय हैं लेकिन वे धर्म का विरोध करते हैं और दूसरे लोगों को भी धर्म के विरोध के लिए उकसाते हैं और नहीं समझते कि एक मर्द के लिए मां, और बेटी का रिश्ता पवित्र होता है। यह बात दुनिया में केवल धर्म बताता है। ऐसे में धर्म का विरोध मेरी नज़र में ग़लत और अनर्थकारी है और मैं उनकी इस बात का विरोध अनिवार्य समझता हूं। पिछले दिनों जनाब वकील साहब ने औरतों से कहा कि वे धर्म के खि़लाफ़ बग़ावत कर दें ताकि वे समानता का अधिकार पा सकें। ऐसा कहते हुए उन्होंने यह भी न देखा कि जिन देशों में औरतों ने धर्म से बग़ावत कर रखी है, वहां उन्हें समानता कितनी मिल पाई है ?
इसी के साथ उन्होंने भविष्यवाणी कर दी कि कुछ लोगों के ज्ञानदीप को भी बुझाया जाने वाला है।
समाज की सभी औरतों पर उनकी बात का नकारात्मक विरोध न पड़े मैंने उनकी बात का विरोध किया लेकिन मेरी टिप्पणी को वे बार-बार मिटाते रहे। ऐसा उन्होंने 5 बार किया। वे अपने ब्लॉग के मालिक हैं, मिटाना चाहें तो मिटा सकते हैं लेकिन यह एक सैद्धांतिक विरोध था। मैं अपने ब्लॉग का मालिक हूं। मैंने उस कमेंट को अपने ‘कमेंट गार्डन‘ ब्लॉग पर लगाया और इस मिटा-मिटाई की ख़बर ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ पर भी दी जो कि वर्चुअल दुनिया को ताज़ातरीन घटनाओं की जानकारी देने के लिए ही बनाया गया है। मेरे दोनों ही ब्लॉग्स को तुरंत ही निलंबित कर दिया गया।
हमारी वाणी बताए कि इसमें ग़लती मेरी है या हमारी वाणी की ?
ग़लती मुझे माननी चाहिए या कि हमारी वाणी को ?
दूसरे बहुत से व्यक्तियों के विचारों का विरोध करने वाली पोस्ट्स आए दिन हमारी वाणी पर प्रदर्शित होती रहती हैं लेकिन उन ब्लॉग्स को तो निलंबित नहीं किया जाता, फिर द्विवेदी जी के विरोध पर हमारे दो ब्लॉग्स का निलंबन क्यों ?
इसी के साथ हमारे साझा ब्लॉग ‘प्यारी माँ‘ को भी निलंबित कर दिया गया। भाई साहब, उसमें तो हमने वकील साहब का विरोध भी नहीं किया था और न ही उसमें वे लेखक हैं जो कि एक दिन में एक ही लेख कई जगह लिखते हों। ऐसा करके हमारी वाणी ने हमारे उस अभियान को नुक्सान पहुंचाया जो कि मातृत्व को आदर देने और उसे सुरक्षित रखने के लिए बहुत से सम्मानित बुद्धिजीवी मिलकर चला रहे हैं।
जहाँ ग़लती होगी तो उसे हम ज़रूर मानेंगे लेकिन हम केवल इसलिए अपनी ग़लती नहीं मान लेंगे कि दूसरे बहुत से लोगों ने मान ली है। दूसरों ने मानी है तो या तो उन्होंने ग़लती की होगी या फिर उनमें आत्मबल की कमी है। यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है।
आत्मबल के धनी भीष्म को मारने के लिए धोखेबाज़ों को एक शिखंडी की ज़रूरत हमेशा पड़ती है। भीष्म की मजबूरी है कि वह हाथ नहीं उठा सकते। धोखा खाने और हार जाने के बावजूद वे सम्मान पाते हैं।
साझा ब्लॉग ने षडयंत्रकारी संगठन को यह दिखा दिया है कि ब्लॉगर उनके बंधुआ नहीं हैं। वे जिसके साथ उचित समझेंगे, जुड़ने के लिए स्वतंत्र हैं। अनवर हो या सलीम या फिर जनाब मासूम साहब, उनके साथ ब्लॉगर्स का जुड़ना इन तंगदिलों को पसंद नहीं है। इसी वजह से साझा ब्लॉग के खि़लाफ़ मुहिम छेड़ी गई है। तिल जितनी ग़लती को ताड़ बनाकर पेश किया जा रहा है।
पसंद तो इन्हें हमारे एकल ब्लॉग भी नहीं हैं, तो क्या हम ब्लॉग लिखना ही छोड़ दें या फिर आप यह चाहते हैं कि हम अपने विचार मुख्य धारा के किसी एग्रीगेटर में सामने ही न लाएं।
जो भी ब्लॉगर एक लेख को कई जगह पेस्ट करे, उसके निजी ब्लॉग को निलंबित कर दीजिए, वह खुद कॉपी पेस्ट करना बंद कर देगा। सही कार्रवाई न करके रंजिशें निकालना एग्रीगेटर को नुक्सान ही देता है। ब्लॉगवाणी बंद हुई तो उसके पीछे भी ऐसी ही बेतुकी कार्रवाई की मांग का शोर मचाया जाना था।
अनवरत: औरत और मर्द बराबर हैं लेकिन "एक जैसे' हरगिज़ नहीं हैं हर महीने औरतें कुछ ऐसी चीज़ें भी खरीदती हैं जो मर्द कभी नहीं खरीदते Women are different


Comment No. 2
शाहनवाज़ भाई ! आप कहते हैं कि
‘एक ही पोस्ट को अलग-अलग ब्लॉग पर पोस्ट करने और ऐसा बार-बार करने तथा किसी धर्म / जाति  / लिंग अथवा व्यक्ति विशेष को अपमानित करने के उद्देश्य से अगर लेख लिखा जाएगा तो ब्लॉग का निलंबन हो सकता है.‘
आप कहते हैं कि
‘आपके अगर किसी ब्लॉग का निलंबन किया गया है तो उसके लिए आपको बताया भी गया होगा कि क्यों किया गया है ?‘

इस संबंध में आपको जानना चाहिए कि कोटा वाले वकील द्विवेदी जी ने औरतों को सार्वजनिक रूप से धर्म के खि़लाफ़ बग़ावत करने के लिए उकसाया जिस पर आपने भी आपत्ति की है और जब जनाब मासूम साहब ने उनके कथन पर आपत्ति जताई तो उन्होंने मासूम की नीयत पर ही संदेह जता दिया।
1- क्या यह धर्म के खि़लाफ़ विष वमन करना नहीं कहा जाएगा ?
2- क्या किसी सम्मानित ब्लॉगर की नीयत पर बिना किसी सुबूत के संदेह करना उसे अपमानित करना नहीं कहा जाएगा ?
इसके बावजूद भी आपने उनके ब्लॉग को हमारी वाणी से निलंबित क्यों न किया ?
जबकि हमने विरोध किया तो उन्होंने 5 बार हमारी टिप्पणी मिटाकर सच का गला घोंटने की नाकाम कोशिश की और जब हमने वह कमेंट अपने निजी ब्लॉग पर पब्लिश कर दिया तो उसे निलंबित कर दिया जो कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का खुले तौर पर हनन है। वकील साहब के ब्लॉग को भी निलंबित कर दिया जाता तो हमें हमारी वाणी से पक्षपात की शिकायत न होती।
‘ब्लॉग की ख़बरें‘ हिंदी ब्लॉग जगत का एकमात्र समाचार पत्र है। जब इस घटना की रिपोर्टिंग इस अनुपम समाचार पत्र ने प्रकाशित की तो इसे भी तुरंत निलंबित कर दिया गया। इस तरह तो भारत सरकार भी नहीं करती। आए दिन प्रधानमंत्री के खि़लाफ़ अख़बारों में लेख लिखे जाते हैं और उनके कार्टून बनाए जाते हैं और उनकी आलोचना की जाती है। इसके बावजूद सरकार अख़बारों को सस्ते दामों काग़ज़ उपलब्ध कराती रहती है और अपने हरेक आयोजन में उन्हें सम्मान सहित आमंत्रित करती है।
क्या दिनेशराय द्विवेदी जी भारत के पी. एम. से भी ऊँचे किसी रूतबे पर बिठा दिए गए हैं कि उनके किसी विचार का विरोध करते ही हमारी वाणी बिना किसी सूचना के तुरंत हमारे ब्लॉग निलंबित कर देगी। आज तक भी हमारी वाणी की ओर से हमें अधिकारिक रूप से यह तक नहीं बताया गया कि हमारे कुल कितने ब्लॉग निलंबित किए गए हैं और किस ब्लॉग को किस जुर्म में निलंबित किया गया ?
तंग आकर हमने आपसे फ़ोन पर संपर्क किया तो आपने भी मोटे तौर पर यही बताया कि साझा ब्लॉग को निलंबित कर दिया गया है। हमने हमारी वाणी से निराश होकर दूसरे एग्रीगेटर्स पर अकाउंट बनाने में अपना समय लगाया और हमारी वाणी को देखना कम कर दिया। इस बीच जब कभी हमारी वाणी पर ‘प्यारी मां‘ की किसी पोस्ट पर नज़र पड़ी तो उसमें हमें यही नज़र आया ‘पिछली पोस्ट 3‘। आप खुद भी देख सकते हैं। एक ताज़ा पोस्ट इस समय हमारी वाणी के बोर्ड पर नज़र आ रही है। यह देखकर हम यही समझे कि शायद इसे निलंबित करने के बाद पुनः जोड़ लिया गया है तभी यह पिछली पोस्ट 3 दिखा रहा है। हमें क्या मालूम कि यह हमारी वाणी का कोई दोष है ?
हम इसका ज़िक्र करना भी नहीं चाहते थे लेकिन जब कहा जा रहा है कि या तो आप भ्रमित हैं या फिर जानबूझकर भ्रम फैला रहे हैं तो हमें बताना पड़ा कि भ्रम हमारी वाणी के गणना दोष की वजह से फैल रहा है। इसी को सिद्ध करने के लिए हमें आज इस ब्लॉग पर एक पोस्ट भी पब्लिश करनी पड़ी।
हमारी वाणी के कई मार्गदर्शकों में से हमें अभी तक किसी से भी कोई शिकायत नहीं है, सिवाय प्रमुख के। द्विवेदी जी नास्तिक हैं और वे अपने विचार रखने और कहने के लिए वे स्वतंत्र हैं लेकिन क्या उनके विरूद्ध उठने वाले हरेक स्वर को हमारी वाणी दबा देगी ?
अगर हमारी वाणी यही नीति जारी रखती है तो अभिव्यक्ति की आज़ादी में विश्वास रखने वालों का इस पर बने रहना कठिन है। आप चाहें तो हमारे सारे ब्लॉग ख़त्म कर दीजिए ताकि आपके लिए भविष्य में किसी प्रकार की कोई असुविधा उत्पन्न न होने पाए।
हमारी वाणी फले फूले, मालिक से हम यह दुआ हमेशा से करते आए हैं और आगे भी करते रहेंगे।

http://blogkikhabren.blogspot.com/

Sunday, April 3, 2011

साझा ब्लॉग एक टी. वी. चैनल की तरह होता है T V Channel

@ हरीश जी ! आपने यह नियम बनाया है कि एक लेखक एक सप्ताह में केवल एक लेख ही पोस्ट कर सकता है और कोई दूसरा लेखक तब तक अपना धारावाहि शुरू नहीं कर सकता जब तक कि पहले का ख़त्म न हो जाए।
यह नियम बेवजह है।
आपका ब्लॉग एक चैनल की तरह है। जब एक टी. वी. चैनल एक लेखक के धारावाहिक के साथ अन्य दसियों लेखकों के धारावाहिक भी दिखा सकता है तो फिर आपको क्या आपत्ति है ?
अगर एक लेखक का धारावाहिक 6 माह में ख़त्म हुआ तो क्या तब तक दूसरे बैठे ही रहेंगे ?
यही हाल सप्ताह में एक लेख की पाबंदी लगाने की है।
हमारे आदरणीय डा. श्याम गुप्ता जी प्रतिभा के भी धनी हैं और समय भी निकाल लेते हैं तो वे जल्दी जल्दी रचनाएं तैयार कर लेते हैं। अगर किसी में प्रतिभा है और वह अपने शौक़ के लिए दूसरे कामों को पीछे धकेल कर वक्त भी निकाल लेता है तो इसमें उसका क्या कुसूर है ?
अगर वह रोज़ लिख सकता है तो वह क्यों न रोज़ लिखे ?
इस तरह के नियम रचनाकारों की रचनाधर्मिता को प्रभावित करते हैं।
अलबत्ता यह सही है कि एक लेख को एक ही दिन में बहुत सी जगहों पर पेश न किया जाए।
दूसरे नियम भी ठीक हैं। उनसे गुणवत्ता बेहतर होगी।
लेकिन यह कोई बात नहीं है कि एक दिन में मात्र 3 लेख ही दिखाए जाएंगे।
भाई कभी 6 भी आ सकते हैं और कभी ऐसा भी होगा कि पूरे दिन में आपको 1 ही लेख मिलेगा।
यह सब लेखकों के हालात पर निर्भर है। इसे उन पर ही छोड़ दिया जाए तो बेहतर है।
मैं ऐसा समझता हूं इस ब्लॉग के हित में। बाक़ी आप बेहतर जानते हैं। 
http://www.upkhabar.in/2011/02/blog-post.html?showComment=1301167778245#c3052069981488287354

Wednesday, March 30, 2011

'जियो क्योंकि हमारा मालिक चाहता है कि अभी हम जियें.' How to stop suicidial tendency

@ पूजा जी ! आपकी टिप्पणी को मैं गागर में सागर की संज्ञा देता हूँ . आपकी यह टिप्पणी भी ऐसी ही है.
आपने सच कहा जो भी कहा है . ख़ुदकुशी करने वाला सोचता है कि मरकर दुःख से पीछा छूट जायेगा लेकिन उसे सोचना चाहिए कि पाप से तो दुःख बढ़ता है कम नहीं होता . आदमी का अंतिम कर्म तो प्रभु से क्षमा याचना का और पुण्य का कर्म होना चाहिए ताकि आदमी के कर्मों का खाता उसके अच्छे कर्म पर बंद हो . इसीलिए मरते समय कालिमा पढ़ा जाता या ऊपरवाले का नाम लिया जाता है. ख़ुदकुशी करने वाला इसके खिलाफ अंतिम कर्म पाप का करके मरता है और खुद को  परलोक  की यातना का पात्र बनाता है . दुनिया की तकलीफ से घबराया तो मर गया और मरकर जो तकलीफ वह पायेगा , उससे बचने के लिए वह कहाँ जायेगा ?
मुसलमान यही सोचता है और ख़ुदकुशी से रुक जाता है. हरेक की ज़िन्दगी में ऐसे अवसर ज़रूर आते हैं जब उसके सपने और अरमान टूटते हैं या हालात अपने काबू से बाहर जाते हुए लगते हैं . ऐसी बेबसी और गम के आलम में आदमी को लगता है कि अब उसकी ज़िन्दगी उसके लिए एक बोझ है, अब जीना बेकार है , क्या फायदा ऐसी अधूरी और अपमानजनक ज़िन्दगी जीने से और दुःख उठाने से ?
इस जीने से तो अच्छा है कि मर जाएँ .
ऐसे अवसर मेरी जिंदगी  में भी  बहुत बार आये और जब भी मरने का विचार आया तो परलोक की सज़ा के डर  ने हमेशा अपने जीवन को ख़तम करने मुझे रोक दिया .
पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब स. ने मालिक के फज्लो करम से  हमेशा मुझे सही रास्ता दिखाकर पाप करके मरने से बचा लिया . ऐसे अवसर पर दीन की समझ रखने वाले एक मुसलमान  को उनकी वे हदीसें  याद आती हैं जिनमें बताया गया है कि
जो कोई ख़ुदकुशी करके मरता है . मरने के बाद वह क़ियामत के रोज़ तक बार बार उसी तरीके से खुदकुशी करके मरता रहेगा. उसके पाप का यह दंड उसे मिलेगा.
हमने सोचा कि इतने बड़े दुःख को कैसे उठाएंगे ?
लिहाजा दुनिया का हरेक दुःख परलोक की उस यातना के सामने छोटा लगने लगा और जीना आसन हो गया और जीने का मक़सद भी सामने आ गया कि 'जियो क्योंकि हमारा मालिक चाहता है कि अभी हम जियें .'
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/03/family-life.html