Monday, January 28, 2013

इसलाम कहता है कि जो लड़का गर्भाधान में प्राकृतिक रूप से सक्षम है, वह बालिग़ है।


दिल्ली के जघन्य रेप कांड के सबसे बड़े शैतान को कल अदालत ने नाबालिग़ क़रार दे दिया है।
मनुष्य की बुद्धि अपूर्ण है और ईश्वर की पूर्ण। ईश्वर ने मनुष्य बनाया है तो उसके लिए विधि-विधान भी बनाय है। मनुष्य ने उसके विधि-विधान को नकार दिया और अपने लिए अपनी बुद्धि से कुछ जुगाड़ किया। इसीलिए उसने प्राकृतिक रूप से गर्भाधान में सक्षम बालिग़ व्यक्ति को भी बालक ही बताया। यह ग़लत है। इस बात को ग़लत केवल इसलाम कहता है और कुछ लोगों को इसलाम के नाम से ही चिढ़ है। इसलाम कहता है कि जो लड़का गर्भाधान में प्राकृतिक रूप से सक्षम है, वह बालिग़ है।
आज दुनिया भी यही मानना चाहती है। इसलाम जन मन की स्वाभाविक इच्छा है। इसे दबाया जाएगा तो दुनिया में कभी न्याय नहीं हो पाएगा। 


इसलाम का नाम लेकर किसी बादशाह ने आपको इतिहास में कभी कुचल डाला है तो उस बादशाह का विरोध कीजिए। न कि नफ़रत और प्रतिशोध में अंधे होकर आजीवन उसके धर्म का भी विरोध करते रहें ,चाहे वह आपकी समस्याओं का वास्तविक हल ही क्यों न हो !

कृप्या विचार कीजिए, इसी में आपके लोक परलोक की भलाई है।

यह कमेंट निम्न पोस्ट पर दिया गया है, जिसका लिंक व शीर्षक यह है-
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Monday, January 14, 2013

"इंद्र -अहिल्या प्रसंग, कितना सही ?" के लेखक केशव जी से बातचीत

Dr. Anwer Jamal का कहना है:
January 11,2013 at 11:49 AM IST
मोहित जी ! असल बात यह है कि न तो आप इंद्र के पद को जानते हैं और न ही स्वर्ग की प्राप्ति के तरीक़े को।
स्वर्ग केवल सत्कर्मियों को ही प्राप्त होता है और उनमें जो सबसे श्रेष्ठ होता है, वह इंद्र कहलाता है। ऐसा पुराणों में वर्णित है।
सभी स्वर्गवासियों में सबसे ज़्यादा अच्छे इंद्र को आप अहंकारी और घमंडी कह रहे हैं ?
ये बुराईयाँ इन्द्र में नहीं थीं बल्कि उनमें थीं जिन्होंने इन्द्र का चरित्र चित्रण किया है। इसलिए अपना ज्ञान सुधारो,
‘‘इन्द्र को इल्ज़ाम न दो।‘‘
जब आपको अपने ही धर्म-नियम का पता नहीं है तो इसलाम के बारे में आप जो भी ग़लत बात कह दें, बिल्कुल नेचुरल है।
आपने कमेंट किया,
आपका शुक्रिया !
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(Dr. Anwer Jamal को जवाब )- केशव का कहना है:
January 11,2013 at 12:36 PM IST
प्रणाम अनवर साहब ,
सर जी, मुझे दुख हुआ की आप आये भी तो उखड़े मन से ...कॉपी पेस्ट का सहारा लेके :)
आप सीधा प्रशन मुझ से पूछते तो मुझे बड़ी खुशी होती ....
खैर , आप ने टिप्पणी की है तो उसका जबाब देना ही पड़ेगा बेशक उसमें प्रश्न जैसा कुछ नही है |
स्वर्ग/ जन्नत या नर्क/ दोज़ख जैसी कोई चीज नही होती ....अगर है , स्वर्ग ईरान के पास था और आपकी जन्नत सीरिया के पास थी ...जन्नत के बारे में आप मेरा लेख " क्या है जन्नत की हक़ीक़त" पढ सकते हैं |
और स्वर्ग के बारे में इस लेख में बताया ही गया है |
वसतीवक् रूप में ना कोई स्वर्ग है और ना कोई नर्क ....हाँ इस बात से सहमत हूँ की इंसान को कल्पनिक स्वर्ग की चिंता ना कर के केवल सद्कर्म करने चाहिये , यही उसकी ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति होगी .....बेकार के पूजा पाठ , नवाज़ पढ के, लौडस्पीकर में दिन रात शोर मचा के, हज़ - तीर्थ करके , टीका या आधी टोपी पहन के पाखंड परने या दिखावा करने की कोई जरूरत नही |
मैने कहा ना इन्द्र केवल पोस्ट थी, और अच्छे इन्द्र भी, इसलिये वो घमंडी और अहनाकारी भी हो सकते हैं|
आपकी इस बात से सहमत की अधिक दोष उनका है जिन्होने इन्द्र ही क्या कई और महापुर्षो के चरित्र का गलत चित्रण् किया |
और आप जो कह रहे हैं की मुझे अपने ही धर्म नियम का पता नही ....तो हो सकता है की आप सही कह रहे हैं ....कोई भी ए दवा नही कर सकता की वो अपने धर्म के पूर्ण नियम को जनता हो या उसे सभी ग्रंथो का ज्ञान हो |
पर यही बात आप पर भी लागू होती है क्या आप क़ुरान और अल्लाह या मुहहमद साहब को पूरा जानते हैं ?
यदि हाँ तो क्या में आप से कुछ प्रश्न पूच सकता हूँ ?
जवाब दें
(केशव को जवाब )- केशव का कहना है:
January 11,2013 at 01:43 PM IST
आपने अपने ब्लॉग में सत्यकाम का उधारण दिया है , बेशक , वैदिक काल में स्त्री पुरुष के सम्बंध खुले हुये थे | पुरुष की तरह स्त्री को भी ए अधिकार था की वो अपनी पसंद के पुरुष के साथ सम्बंध बना सके|
ए एक तरह से स्त्री को पुरुष के समकक्ष बराबर का अधिकार देने की बात थी |
महाभारत के आदि पर्व , अध्याय 122 में पाण्डु कुन्ती से कहते हैं की " है सुन्दरी, पूर्व काल में स्त्रियों को कुछ रोकटोक ना थी, वे भी पुरुषो की तरह स्वक्षन्द थी किसी को भी अपना साथी चुनने और भोग विलास करने में "
बेशक आज ए गलत लगे पर उस समय ए स्त्रीपुरुष को समन अधिकार देने जैसा था |
पर इस्लाम में क्या है .....पुरुष तो 31 पत्नियाँ रख सकता है पर स्त्री घर के बाहर भी निकले तो सर से पांव तक कपड़ा लपेट कर |
यंहा तक की जिस मुहम्मद साहब की आप लोग ए गुण गाते हो की उन्होने स्त्रियों को समन रूप से अधिकार दिया उन्ही की अपनी पत्नियों को ए अधिकार नही था की वो किसी बाहर के मर्द से बात भी कर सके
देखें- क़ुरान , सुरे अहज़ब की 55 वी आयत
फिर आप किस मुंह से सत्यकाम का उधारण दे रहे हैं ?
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(केशव को जवाब )- Dr. Anwer Jamal का कहना है:
January 11,2013 at 05:30 PM IST
सत्यकाम की बात शुरु करके आपने संदर्भ दिया महाभारत का.
यह नहीं चलेगा.
सत्यकाम की बात करें तो आप सत्यकाम की कथा संस्कृत में श्लोक दिखा कर उसका अनुवाद दें या केवल अनुवाद दें लेकिन दें ग्रंथ से ही.
तब उसे प्रमाण माना जायेगा.
टालू किस्म की बातचीत से न आपका भला है और न ही हमारा.
आप ऐसा कर पाएँ तो फिर चाहे जो पूछिये हम जवाब देंगे.
(केशव को जवाब )- Dr. Anwer Jamal का कहना है:
January 11,2013 at 05:22 PM IST
प्यारे भाई ! जो वचन हमने कहीं एक बार लिखा है उसी को दोबारा लिखने से उसका वज़न कम नहीं होता.
हमने कब कहा है कि इन्द्र एक पद नहीं है ?
हरेक कल्प का इन्द्र अलग होता है .
क्या आप बताएंगे कि एक कल्प में कितने वर्ष होते हैं ?
खरबोब खराब वर्ष ,
है न ?
अगर इन्द्र होता है तो वह खरबों वर्ष शासन करता है.
अब आप बताइये कि अगर इन्द्र धरती का कोई राजा था तो क्या कल्प तक उसके द्वारा राज्य करना संभव है ?
इसी बात से स्वर्ग धरती से अलग प्रमाणित हो जाता है.
आपको अपने धर्म के बुनियादी नियम क़ायदों का पता नहीं है.
हमारे बारे में आपने पूछा है तो हम बता दें कि हमें अपने धर्म के बुनियादी नियमों का पता है और हम उनका पालन करते हैं.
न पता होता तो हम उनका पालन कैसे कर पाते ?
इतनी जानकारी रखना अनिवार्य और फ़र्ज़ होती है हरेक मुस्लिम पर .
आपके यहाँ भी इसी तरह की व्यवस्था थी लेकिन उसे अब भुला दिया गया.
हरेक अपनी मौज का मालिक है, चाहे पता करे या न करे.
जवाब दें
(Dr. Anwer Jamal को जवाब )- केशव का कहना है:
January 11,2013 at 07:34 PM IST
प्यारे बढे भाई साहब ,
लगता है की आप बात को समझे नही , हमने कहा है की इन्द्र एक पदवी थी...जैसे कभी सम्राट की पदवी होती थी |
और इन्द्र मनव था या यूं काहे की आदि मनव था इस लिये ए मानना की कोई मनुष्य कल्प तक शाशन कर सकता है ए संभव नही है |
आप मेरे लेख को अगर ध्यान से पढेंगे तो उसमें ए कहा गया है की इन्द्र आदि मानव था, देव , दानव, दैत्या ए मनुष्य थे ...जिनके नाम से आगे वंश चला |
इन्द्र को कल्प वर्ष तक शाशन करने की कल्पना कर लि गयी जैसे की हनुमान को बंदर, जामवन्त को भालू , वरहा को वरहा देव बना के उसकी अजीब सी तस्वीर बना दी ...आदि |
इसी प्रकार स्वर्ग और नर्क भी कल्पना की उडन है ....अगर ए थे भी तो वैसे ही थे जैसा मैने लेख में बताया है ...ईरान के आसपास का इलाका स्वर्ग लोग कहतलता था |
आप कल्पनिक बातो पर शायद इसलिये विश्वास कर रहे हैं क्यों की क़ुरान में भी ऐसी ही कल्पनिक बाते ( स्वर्ग नर्क, जिन्‍न) आदि का वर्णन है |
आप जानबूझ कर मानने से इंकार कर रहे हैं क्यों की इससे आपके क़ुरान को भी धक्का लगेगा |
हमे क्या पता है ए हम अच्छी तरह से जानते हैं ....
आप बताइये की आप कितने इस्लाम की बुनियादी बातो का पालन कर रहे हैं ?
अगर आप मानते हैं की आप इस्लाम की बुनियादी बातो का पालन कर रहे हैं ...तो फिर क़ुरान की बातो का भी पालन कर रहे होंगे क्यों की बिना क़ुरान के इस्लाम का कोई अस्तित्व नही |
क़ुरान ने खुद यह बात स्पस्थ कर दी है की इस्लाम केवल अरब के लिये आया था , और किसी मुल्क के लोगो के लिये नही
क़ुरान की 42 वी सुरा( सुरे शूरा) में कहा गया है की अरबी क़ुरान ने तुम्हारी तरफ से नाज़िल किया है ताकि तुम मक्के के रहने वालो को और जो लोग मक्के के आस पास बस्ते हैं उन को पाप से डराओ '
यानी केवल माका और उसके आस पास के लोगो के लिये थी क़ुरान
सुरे यासिन की पंचवी आयत में भी कहा गया है की "तुम ऐसे लोगो को डराओ जिन के बाप दादे नही डराए गये , इस से वे गाफिल हैं "
इस तरह से और भी आयते हैं जो ए कहती हैं की क़ुरान का संदेश केवल अरब के लिये था .. . जब क़ुरान का सदेश केवल अरब के लोगो के लिये था तो आप हिन्दुस्तान में पैदा होके कैसे उसके नियम को फॉलो कर रहे हैं? भारत के लिये तो क़ुरान थी ही नही |
और आप भी क़ुरान को भुला दीजिये क्यों की ए अब ए आउट डेटिड हो गयी है .....1400 पहले की प्रस्थितियाँ और थी.
(Dr. Anwer Jamal को जवाब )- केशव का कहना है:
January 11,2013 at 09:15 PM IST
अनवर साहब, आप जहां से ब्लॉग को कॉपी पेस्ट कर के लाये हैं क्या उन्होने ऐसा कोई श्लोक या अनुवाद दिया जिससे ए सिद्धा होता हो की जाबली का ब्लातकार हुआ था ?
आप ने केवल कॉपी पेस्ट किया अपनी अक्ल नही लगाई ....आप संस्कृत के अनुवादया श्लोक से ए सिद्धा कर दीजिये की जाबली का" ब्लातकार" हुआ था तो में भी ए सिद्धा कर दूंगा की उसका ब्लातकार नही हुआ था | ध्यान रहे" ब्लातकार" का मतलब होता है जबरन .....आप चाहे तो जिसका ब्लॉग कॉपी पेस्ट करके लाये हैं उससे भी सहयता ले सकते हैं ....
और इतना बता दूं ...आपकी सुविधा के लिये ...की सत्यकाम का प्रसंग चांद्योग उपनिषद ने आया है |...बाकी आप सिद्धा कीजिये की जाबली का ब्लातकार हुआ था ..बाकी मैं सिद्धा कर दूंगा :)



























(केशव को जवाब )- Dr. Anwer Jamal का कहना है:
January 14,2013 at 05:15 PM IST
आर्यों के राजा को इन्द्र कहा जाता था. वह ईरान में रहता था. आज ईरान का शासक और वहां की प्रजा मुस्लिम है तो क्या यह मान लेना चाहिये कि आर्यों का राजा इन्द्र और आर्य मुस्लिम हो चुके है ?
क़ुर्'आन 42: 7 को ध्यान से पढिये-
और (जैसे हम स्पष्ट आयतें उतारते है) उसी प्रकार हमने तुम्हारी ओर एक अरबी क़ुरआन की प्रकाशना की है, ताकि तुम बस्तियों के केन्द्र (मक्का) को और जो लोग उसके चतुर्दिक है उनको सचेत कर दो और सचेत करो ...
इस आयत में मक्का के चारों और की बस्तियों के लोगों को सचेत करने के लिये कहा जा रहा है भाई . अगर आपने दुनिया के नक़्शे में मक्का को देखा होता तो आप जानते कि 'चारों ओर' मे सारी दुनिया आ जाती है. लिहाज़ा क़ुर्'आन पर ऐतराज़ सिर्फ न जानने की वजह से किया जाता है.
जवाब दें
(Dr. Anwer Jamal को जवाब )- केशव का कहना है:
January 14,2013 at 08:12 PM IST
प्रणाम अनवर साहब,
इन्द्र तो आदिपुरुष था , उसकी संताने या वंसज कब के मर खप गये होंगे, वैदिक धर्म तो कभी का खत्म हो गया था | ए तो प्रलय से पहले की बात है उसके बाद ना जाने कितने ही धर्मो में बदला होगा ईरान ...इस्लाम से पहले जोरोस्ट्रियान थे उसे पाले कोई और ..उससे पहले कोई और ....अब क्या पता आने वाले कुछ सदियों में इस्लाम भी ना रहे वहा पर ....इसमें इतना गर्व करने की कोई बात नही जैसा आप इस्लाम को लेके कर रहे हैं |
हा हा हा ...और सही सही बताइये की क्या आप वाकई डाक्टर हैं या फिर कोई मदरसे के मौलवी ?
प्रथ्वी अण्डाकार हैं ना की कागज पर खिचे किसी गोला जिसका केन्द मक्का हो |
चलिये ए बताइये की मुहम्मद साहब को कैसे पता की मक्का ही प्रथ्वी का केन्द्र है ...ओहो क्षमा कीजिये गा मैं तो भूल गया ...स्वयं क़ुरान यानी मुहम्मद जी के अनुसार अल्लाह ने प्रथ्वी 6 दिन में बना दी और पर्वत इस लिये गाड़ दिये ताकि पृथ्वी हिले ना ....फिर तो आपकी बात माननी पड़ेगी की मक्का वाकई प्रथ्वी का केन्द्र है क्यों जब प्रथ्वी को अल्ला ने बनाया तो इस तरह बनाया की मक्का उसके केन्द्र में आये :
फिर तो आपकी बात मानाने पड़ेगी :)
पर फिर इधर भी गडबड है क्यों की मक्का पहले ( लगभग 5 शताब्दी ) में पगानो का मंदिर था जिसकी 360 मूर्तियाँ आज भी उधर हैं ..मुहम्मद जी ने मूर्तियों तोड दिया था... .उससे पहले मक्का ग्रीक के कब्जे में थी
इसका मतलब ए हुया की जिसे आप मुहमम्द साहब के अनुसार प्रतवी का केन्द्र कह रहे हैं वो वास्तव में शिव मंदिर का केन्द्र है ( देखे प्रोफेसर पी के ओंक )
और जरा उस बात पर भी गौर कीजिये जिसमें आप ए कह रहे हैं की चारो दियहाओं का मतलब पूरी दुनिया है |












































प्यारे भाई केशव ! ठहाके मार कर हंसना गंभीर लोगों का लक्षण नहीं होता .
आप इन्द्र को मानते हैं लेकिन कल्प को नहीं मानते क्योंकि इस से आपको धरती से अलग एक लोक मानना पड़ेगा.
आप इन्द्र को उपाधि और ईरान के लोगों को आर्य जाति का सदस्य मानते हैं लेकिन हमने कहा कि वे आज मुस्लिम हैं तो आप कह रहे हैं कि इन्द्र और आर्य सब मर खप गये होंगे .
आप इतनी बड़ी बात कह रहे हैं और बिना किसी प्रमाण के ?

दूसरी बात -
जो चीज़ गोल न हो तो क्या उसका कोई केन्द्र नहीं होता ?
क्या भारत गोल है जो दिल्ली को इसका केन्द्र माना जाता है ?

पूरी पृथ्वी का केन्द्र मक्का है, इसे वैज्ञानिक बता रहे हैं और कह रहे हैं कि
काबा के मुताबिक चले दुनिया भर की घडियां
हैरत मत कीजिए,सच्चाई यही है कि दुनिया में वक्त का निर्धारण काबा को केन्द्रित करके किया जाना चाहिए क्योंकि काबा दुनिया के बीचों बीच है। इजिप्टियन रिसर्च सेन्टर यह साबित कर चुका है। सेन्टर का दावा है कि ग्रीनविचमीन टाइम में खामियां हैं।
दुनिया में वक्त का निर्धारण ग्रीनविच रेखा के बजाय काबा को केन्दित रखकर किया जाना चाहिए क्योंकि काबा शरीफ दुनिया के एकदम बीच में है। विभिन्न शोध इस बात को साबित कर चुके हैं। वैज्ञानिक रूप से यह साबित हो चुका है कि ग्रीनविच मीन टाइम में खामी है जबकि काबा के मुताबिक वक्त का निर्धारण एकदम सटीक बैठता है। ग्रीनवीच मानक समय को लेकर दुनिया में एक नई बहस शुरू हो गई है और और कोशिश की जा रही है कि ग्रीनविचमीन टाइम पर फिर से विचार किया जाए।ग्रीनविचमीन टाइम को चुनौति देकर काबा समय-निर्धारण का सही केन्द्र होने का दावा किया है इजिप्टियन रिसर्च सेन्टर ने। रिसर्च सेन्टर ने वैज्ञानिक तरीके से इसे सिध्द कर दिया है और यह सच्चाई दुनिया के सामने लाने की मुहिम में जुटा है। वे कॉन्फे्रस के जरिए दुनिया को यह हकीकत बताने जा रहे हैं। इजिप्टियन रिसर्च सेन्टर के डॉ। अब्द अल बासेत सैयद इस संबंध में कहते हैं कि जब अंग्रेजों के शासन में सूर्यास्त नहीं हुआ करता था, तब ग्रीनविच टाइम को मानक समय बनाकर पूरी दुनिया पर थोप दिया गया। डॉ। अब्द अल बासेत सैयद के मुताबिक ग्रीनविच टाइम में समस्या यह है कि ग्रीनविच रेखा पर धरती की चुम्बकीय क्षमता ८.५डिग्री है जबकि मक्का में चुम्बकीय क्षमता शून्य है।
पूरा आलेख पढऩे  के लिए यहां क्लिक करें 

इंद्र -अहिल्या प्रसंग - कितना सही ?-केशव  


Wednesday, January 9, 2013

लीजिए, यह रहा आपका अमृत, इसे चखकर देखिए और बताईये कि यह सनातन ही है न ? Amrit


देवताओं ने अमृत का घड़ा छिपा दिया था। कुंभ का आयोजन उसी अमृत कुंभ की तलाश है। उसी घड़े की तलाश में ज्ञानी जन बहुत समय से लगे हुए हैं। कुंभ में भी लोग कुछ पाने के लिए जुड़ते हैं और हज में भी। कुंभ का संबंध भी ब्रहमा जी से है और हज का संबंध भी अब्राहम से है। जैसे जैसे भाषाओं की जानकारी बढ़ेगी तो सबको पता चल जाएगा कि ब्रहमा और अब्राहम एक ही हैं जैसे कि मनु और आदम एक हैं। मनु और ब्रहमा के ज्ञान कलश को ढूंढना आज कुछ भी भारी नहीं है। कई बार चीज़ सामने रखी रहती है लेकिन आदमी उसे देख नहीं पाता। अमृत के बारे में यही ग़लती की जा रही है।
यह धरती तो मर्त्यलोक है ही। यहां से तो जाना ही है हरेक को लेकिन आदमी जाए तो अमर लोक जाए न कि नर्क लोक।
ऋग्वेद के पहले मंडल का पहला मंत्र ‘अग्निमीले‘ से शुरू होता है अर्थात हम अग्नि का ईलन करते हैं।
ईलन का अर्थ पूजन से है।
यह ईल शब्द ही इसराईल में मिलता है। इसराईल एक देश का नाम है जो कि नबी इसराईल के नाम पर रखा गया है। उनका वास्तविक नाम याक़ूब है। याक़ूब अब्राहम के वंशज हैं।
यह ‘ईल‘ शब्द ही सब फ़रिश्तों के नामों में मिलता है जैसे कि जिबराईल, मीकाईल और इज़राईल आदि।
ईल शब्द से ही इला और इलाह बना है।
अरबी में ‘इलाह‘ का अर्थ पूजनीय होता है।
‘इलाह‘ अजर और अमर है।
इलाह शब्द अरबी में गया तो इसमें ‘अल‘ लगाने से ‘अल्लाह‘ शब्द बना-
अल + इलाह = अल्लाह
इलाह का अर्थ अरबी में भी पूजनीय ही माना जाता है और अल्लाह को परमेश्वर का निजी नाम की हैसियत से जाना जाता है।
विकीपीडिया की यह जानकारी भी देखी जा सकती है।
The term Allāh is derived from a contraction of the Arabic definite article al- "the" andʾilāh "deity, god" to al-lāh meaning "the [sole] deity, God".
‘इलाह‘ केवल पूजनीय ही नहीं है बल्कि विधान का दाता भी है। वैध-अवैध निश्चित करने का अधिकार केवल उसी को है।

अब ‘अग्नि‘ को समझें।
स्थौलाष्ठीवि ऋषि के अनुसार ‘अग्नि‘ का अर्थ अग्रणी है अर्थात जो सबसे अग्र हो, सब रचनाओं से भी पहले होने से उस परमेश्वर को अग्नि कहा गया है।
अग्रणी परमेश्वर का पूजन ही अमर लोक जाने का एकमात्र उपाय है।
यही अमृत ज्ञान है।
इसे कुंभ वाले सारे ही भूल गए हों, ऐसी बात नहीं है। परंतु उन्होंने इस ज्ञान कलश को छिपा दिया है।
हज वाले दुनिया भर में यह ज्ञान लुटा रहे हैं। इस ज्ञान को आप अपने ग्रंथों से मिला कर देख लीजिए कि वही सनातन-पुरातन ज्ञान है कि नहीं ?
‘अग्नि‘ को आग समझ लेने से आग की पूजा शुरू हो गई। वेद का छंद ही ईरान में ‘ज़न्द‘ कहलाया। आर्य भारत में भी आग पूजते रहे और ईरान में भी। एक अग्रणी परमेश्वर को पूजने वाली आर्य जाति आग की पुजारी बनकर रह गई। शब्दों को ठीक से न समझा जाए तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

रविकर जी की निम्न पोस्ट अच्छी लगी। इसी से प्रेरित होकर यह एक पोस्ट बन गई है।



दान समझ कर डाल दे, हो जा हिन्दु रिलैक्स -





डालो पैसे कुम्भ में, है नहिं मेला टैक्स ।
दान समझ कर डाल दे,  हो जा हिन्दु रिलैक्स ।
 हो जा हिन्दु रिलैक्स, फैक्स आया है भारी ।
हज पर अगली बार, सब्सिडी की तैयारी ।
अमरनाथ जय जयतु, नहीं इच्छा तुम पालो ।
नेकी कर ले भगत, दान दरिया में डालो ।।

Sunday, December 30, 2012

ब्लॉगिंग से मोह भंग की मूल वजह बताने में हिचकिचाहट कैसी ?

ब्लॉगिंग से मोह भंग की मूल वजह जो है उसे कहना समझदारी के खिलाफ़ समझ लेने से भी हिन्दी ब्लॉगिंग पर बुरा असर पड़ा है.
See:
डा. टी. एस. दराल साहब अपनी लम्बी पोस्ट में यह मूल वजह कितनी स्पष्ट कर पाए हैं ?
यह देखना आपका काम है .
अंतर्मंथन: 2012 -- ब्लॉगिंग की राह में मज़बूर हो गए --- हिंदी ब्लॉगिंग का कच्चा (चर्चा) चिट्ठा !

अब आप एक छोटी सी पोस्ट भी देखिये,  ब्लॉगिंग छोड़ने से पहले उन्होंने क्या कहा है ?


कमेन्ट माफिया 


आज कल हमारे ब्लॉग जगत पर एक अलग सा माफिया ग्रुप का कब्ज़ा हो गया। इस माफिया ग्रुप का नाम मैंने रखा हैं कमेन्ट माफिया या सी कंपनी भी कह सकते हैं।

कुछ लोगो का आपसी ग्रुप इतना मजबूत हो चूका हैं कि अगर किसी ब्लोगेर ने दादी कि सुनी हुई कहानी भी लिख दी तो ७०- ८० कमेन्ट तो मिल ही जाता हैं। और कुछ ब्लोगेर बंधू तो ऐसे हैं कि सिर्फ महिलावो के ब्लॉग पर ही टिप्पड़ी करेंगे। और कुछ कि तो बात ही अलग हैं।

कुछ बंधू तो nice लिख कर के चलते बनते हैं।

भाई लोग ऐसा क्यों करते हैं। मैंने बहुत से ऐसे ब्लॉग देखे हैं जिनमे बहुत सी अच्छी -अच्छी जानकारी दी गई, होती हैं, धर्म के उपर बहुत से ब्लॉग अच्छी जानकारी देते हैं। समाज के उपर हो या विज्ञानं के उपर लेकिन ऐसे लेख बिना पढ़े ही रह जाते हैं। आज कि राजनितिक हलचल हो या महंगाई , कोई नहीं जाता , बेचारा लिखने वाला भी सोचता हैं कि में क्या लिखू।

में अपनी बात ही कह दू, कि अगर मैं किसी कि बुराई करता नज़र आ जाऊ तो लोग दबा के टिप्पड़ी करेंगे लेकिन अगर कोई अच्छी बात लिखने लगु तो ऐसे लगता हैं कि साली टिप्पड़ी भी नासिक के प्याज के खेते से आ रही हैं।

खैर अब देखता हूँ।

Tuesday, December 18, 2012

बुरे लोगों की बुराई से बचने के लिए अच्छे लोगों को संगठित होकर अच्छे नियमों का पालन करना ही होगा


जब भी कोई ऊपर वाले पर कोई इल्ज़ाम लगाता है तो यह उनके दिल पर क़ियामत की तरह टूटता है जो सत्य जानते हैं। सत्य यह है कि उस पालनहार प्रभु ने किसी पर कोई ज़ुल्म नहीं किया है। उसने मुनष्य को पेड़-पौधों और पशुओं से उच्चतर चेतना दी है। पेड़-पौधे और पशु सभी अपने स्वाभाविक कर्तव्य अंजाम देते हैं लेकिन यह इंसान ही है जो कि अपने अधिकार का ग़लत इस्तेमाल करता है। परस्पर सहयोग के बजाय शोषण कौन करता है ?
यह काम इंसान करता है। 
जो शोषण की शिकायत करता है, वही दूसरे स्तर पर ख़ुद शोषण करता हुआ नज़र आएगा। अपनी बहुओं से दहेज का लालच न रखने वाली और दूसरों का उदाहरण देकर उसके दिल को न जलाने वाली सास ननदें कितनी हैं ?
दहेज हत्या से लेकर कन्या भ्रूण हत्या तक, दर्जनों घिनौने अपराध बिना औरत के सहयोग के संभव ही नहीं हैं।
तांत्रिकों और बाबाओं को अपना रूपया और अपनी अस्मत देने के लिए औरत ख़ुद चलकर उनके डेरे पर जाती है। जो पढ़ी लिखी होने का दंभ रखती हैं और बाबाओं के पास नहीं जातीं, वे हीरोईनें और मॉडल्स बनकर दुनिया के सामने ख़ुद को परोसती हैं। पर्दे के पीछे उनके साथ क्या होता है ?, इसकी कहानियां भी समय समय पर सामने आती रहती हैं। वे तो आग भड़काकर पीछे हट जाती हैं लेकिन क्लिंटन अपने ऑफ़िस की किसी न किसी लेविंस्की को थाम ही लेता है। लेविंस्की न मिले तो अपने ब्वायफ़्रेंड के साथ देर रात अकेले घूमती हुई कोई आधुनिका ही सही। जागरूक शिक्षित कन्याएं आजकल गर्भनिरोधक गोलियां खा रही हैं और लिव इन रिलेशनशिप में रहकर अपनी मर्ज़ी से अपना शोषण करवा रही हैं।
ईश्वर की एक निर्धारित व्यवस्था है,  जिसका नाम सब जानते हैं। जब आदमी या औरत उससे बचकर किसी और मार्ग पर निकल जाए तो फिर वह जिस भी दलदल में धंस जाए तो उसके लिए वह ईश्वर को दोष न दे बल्कि ख़ुद को दे और कहे कि मैं ही पालनहार प्रभु के मार्गदर्शन को छोड़कर दूसरों के दर्शन और अपनी कामनाओं के पीछे चलता रहा।
अल्लाह तो लोगों पर तनिक भी अत्याचार नहीं करता, किन्तु लोग स्वयं ही अपने ऊपर अत्याचार करते है (44) जिस दिन वह उनको इकट्ठा करेगा तो ऐसा जान पड़ेगा जैसे वे दिन की एक घड़ी भर ठहरे थे। वे परस्पर एक-दूसरे को पहचानेंगे। वे लोग घाटे में पड़ गए, जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झुठलाया और वे मार्ग न पा सके (45)
सूरा ए यूनुस आयत 44 व 45
See: 

आदमी आज भी वही है जोकि वह आदिम युग में था। समय के साथ साधन बदलते हैं लेकिन प्रकृति नहीं बदलती। बुरे लोगों की बुराई से बचने के लिए अच्छे लोगों को संगठित होकर अच्छे नियमों का पालन करना ही होगा। इसके सिवाय न पहले कोई उपाय था और न आज है।

दीन के नाम पर दुकानदारी करने वाले मुल्लाओं की एक कारस्तानी The Sin

इसलाम एक चेतना है, क़ुरआन व सीरत पढ़कर इसे अपने अंदर ख़ुद जगाना पड़ता है। यह चेतना न जागे तो इसलाम महज़ कुछ निर्जीव परम्पराओं का समूह बन कर रह जाता है और जाहिल लोग इसलाम का नाम लेकर अपनी चौधराहट क़ायम कर लेते हैं। लोग इन्हें अपना नेता, पीर और क़ाज़ी समझते हैं। ये लोग उन ग़रीबों से भी धन ऐंठ लेते हैं, जिन्हें कि ज़कात व सदक़ा दिया जाना चाहिए। आम मुसलमान को क़ुरआन, मदरसे और मस्जिद से अक़ीदत (श्रद्धा) होती है। ये मुफ़्तख़ोर चौधरी मुसलमानों की अक़ीदत का फ़ायदा उठाते हैं। इसलाम और मुसलमानों को दुनिया में बदनाम करने वाले यही हैं। मुईनुददीन और मरियम का वाक़या ऐसे ही ज़रपरस्तों को बेनक़ाब करता है.
Source : http://sohrabali1979.blogspot.in/2012/11/blog-post_12.html

इस्लाम को कलंकित करने वाला फरमान

ऐसा लगता है कि आजकल इस्लाम को बदनाम करने का ठेका स़िर्फ मुसलमानों ने ले रखा है. न स़िर्फ दुनिया के तमाम देशोंबल्कि भारत से भी अक्सर ऐसे समाचार मिलते रहते हैंजिनसे इस्लाम बदनाम होता है और मुसलमानों का सिर नीचा होता है. कभी बेतुके फतवे इस्लामी तौहीन का कारण बनते हैं तो कभी तालिबानी पंचायती फरमान. पिछले दिनों ऐसी ही एक शर्मनाक ख़बर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर ज़िले से मिलीजिसके अनुसारवहां के सलेमपुर की एक मुस्लिम पंचायत ने गांव के एक बुज़ुर्ग दंपत्ति का सामाजिक बहिष्कार करने की घोषणा की है. बताया जाता है कि लगभग 1000 की मुस्लिम आबादी वाले इस गांव में मोइनुद्दीन एवं मरियम नामक एक ग़रीब बुज़र्ग दंपत्ति अपने झोपड़ीनुमा कच्चे मकान में रहते हैं और टॉफीनमक एवं बिस्कुट जैसी सस्ती चीज़ें बेचकर जीवनयापन करते हैं. इनकी ग़रीबी का आलम यह है कि ये अपने चंद मवेशियों के लिए घास-चारा और ईंधन के लिए लकड़ी आदि दूरदराज़ के खेतों से इकट्ठा करते हैं. इनके रहन-सहन से ही इनकी आर्थिक हैसियत का आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
इसी गांव के मुसलमानों ने अपनी एक मुस्लिम पंचायत अर्थात अंजुमन बना रखी है. गांव में एक मदरसा निर्माणाधीन हैजिसके लिए स्थानीय एवं बाहरी लोगों से चंदा इकट्ठा किया जा रहा है. अंजुमन द्वारा मोइनुद्दीन एवं मरियम से भी मदरसे के चंदे के रूप में पांच सौ रुपये की मांग की गई. इस ग़रीब दंपत्ति ने अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के मद्देनज़र चंदा देने में असमर्थता व्यक्त कर दी. बस फिर क्या थामोइनुद्दीन तो इस पंचायत की नज़र में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया. अंजुमन ने मोइनुद्दीन के सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार की घोषणा कर दी. उसकी ख़स्ताहाल झोपड़ी के बाहर एक बोर्ड लगा दिया गया कि गांव का कोई भी व्यक्ति मोइनुद्दीन की दुकान से कोई सामान नहीं ख़रीदेगाकोई उससे किसी प्रकार का बर्तावव्यवहार एवं वास्ता नहीं रखेगा. यदि किसी ने अंजुमन के आदेश का उल्लंघन किया तो उसे 500 रुपये बतौर ज़ुर्माना अदा करने होंगे. तालिबानी फरमान का अंत यहीं नहीं हुआबल्कि इन तथाकथित इस्लामी ठेकेदारों ने इस दंपत्ति को अपने खेतों में शौच के लिए जाने पर भी पाबंदी लगा दी. यह आदेश भी जारी कर दिया गया कि मरणोपरांत इस परिवार के किसी व्यक्ति को स्थानीय क़ब्रिस्तान में दफन भी नहीं किया जाएगा. पंचायत के फरमान के बाद इस परिवार को अपनी दो व़क्त की रोटी जुटा पाने में भी दिक्कत पेश आ रही है. गांव की मुस्लिम पंचायत इसकी बदहाली और भुखमरी पर स्वयं को गौरवांवित महसूस कर रही हैवहीं दूसरी तऱफ पड़ोस के एक गांव का सिख परिवार मानवता का प्रदर्शन करते हुए इसे दो व़क्त की रोटी मुहैया करा रहा है.
यह तो था इन तथाकथित इस्लामपरस्तों का तालिबानी फरमानजो इन्होंने यह सोचकर जारी किया कि शायद ये तुगलकी सोच वाले मुसलमान इस्लाम पर बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैंपरंतु आइए देखें कि इस्लाम दरअसल इन हालात में क्या सीख देता है. मैं अपने बचपन से कुछ इस्लामी शिक्षाएं वास्तविक इस्लामी दानिश्वरों से सुनता आया हूं. ऐसी ही एक इस्लामी तालीम थी कि पहले घर में चिराग़ जलाओफिर मस्जिद में. इस कहावत का अर्थ क्या हैयही न कि अपनी पारिवारिक ज़रूरतों से अगर पैसे बचें तो फिर अपने ख़ुदा की राह में ख़र्च करें. यह तो क़तई नहीं कि आप ख़ुद या आपके पड़ोसी भूखे रहें और आप मस्जिद या मदरसे के निर्माण कार्य के लिए चंदा देते फिरें. जो लोग इस्लाम में वाजिब कहे जाने वाले हज के नियम से वाक़ि़फ हैंवह यह भलीभांति जानते हैं कि अगर आप क़र्ज़दार हैं और हज कर रहे हैंतो वह भी जायज़ नहीं है. यहां तक कि अगर आप पर अपने बेटों एवं बेटियों की शादी का ज़िम्मा बाक़ी है तो पहले इन पारिवारिक ज़रूरतों को पूरा करने के बाद ही हज किया जा सकता है. अगर आप आर्थिक रूप से सुदृढ़ हैं तो फिर कभी भी हज कर सकते हैं. इसी तरह लगभग सभी इस्लामी कार्यकलापों के लिए यह बताया गया है कि हमेशा चादर के भीतर ही पैर फैलाना है. यहां तक कि फिज़ूलख़र्ची को भी इस्लाम में गुनाह क़रार दिया गया है. अपने को आर्थिक परेशानी में डालकर धर्म पर पैसे ख़र्च करना इस्लाम हरगिज़ नहीं सिखाता. मगर तालिबानी सोच रखने वाले कुछ मुसलमानों ने अपने गढ़े हुए इस्लाम के अंतर्गत फरमान जारी करके दो ग़रीब मुसलमानों को रोजी-रोटी से वंचित कर दिया. वहीं एक सिख परिवार वास्तविक मानवीय इस्लामी एवं सिख धर्म की शिक्षाओं का पालन करते हुए इन्हें दो व़क्त की रोटी मुहैया कराता रहा. क्या यही है इन तालिबानों का इस्लाम?क्या ऐसे फरमान इस्लाम धर्म की वास्तविक शिक्षाओं के अंतर्गत जारी किए जाने वाले फरमान कहे जा सकते हैं?
यह ग़ैर इस्लामी फरमान जारी करने के बाद पंचायत के प्रमुख का कहना था कि यह परिवार नमाज़ नहीं पढ़ताहमारे चंदे मेंख़ुशी और गम मेंहमारे धार्मिक कामों में शरीक नहीं होतालिहाज़ा गांव के लोग इससे अपना वास्ता क्यों रखेंसवाल यह है कि मान लिया जाए कि वह परिवार यदि किसी धार्मिक आयोजन या नमाज़-रोज़े में उनके साथ शरीक नहीं होता तो भी किसी को इस बात का कोई अधिकार नहीं है कि वह ज़ोर-ज़बरदस्ती करके उसके विरुद्ध कोई ऐसा फरमान जारी करे. किसी प्रकार की धार्मिक गतिविधियों में शिरकत करना या न करना किसी भी व्यक्ति का अति व्यक्तिगत मामला है. यदि कोई व्यक्ति धार्मिक कार्यकलापों में हिस्सा लेता है तो वह उसके पुण्य का भागीदार होगा. इसी प्रकार शरीक न होने अथवा नमाज़ आदि अदा न करने पर पाप का भागीदार भी स़िर्फ वही होगा. धर्म प्रचारक या मुल्ला-मौलवी उसे अपनी बात प्यार-मोहब्बत से समझा सकते हैंलेकिन उसका सामाजिक बहिष्कार करनाउसे आर्थिक संकट में डालना या उसके विरुद्ध कोई तालिबानी फरमान जारी करना पूरी तरह ग़ैर इस्लामीग़ैर इंसानी और अधार्मिक है.
दरअसल आज ऐसे तालिबानी सोच रखने वाले मुसलमानों एवं कठमुल्लाओं ने इस्लाम धर्म को बदनाम कर दिया है. चाहे वह अ़फग़ानिस्तान के बामियान प्रांत में महात्मा बुद्ध जैसे विश्व शांति के दूत समझे जाने वाले महापुरुष की मूर्ति को तोप के गोलों से ध्वस्त करने जैसी कायरतापूर्ण कार्रवाई हो या पाकिस्तान में मस्जिदोंदरगाहों एवं धार्मिक जुलूसों में शिरकत करने वाले शांतिप्रिय लोगों की बड़ी संख्या में जान लेना या भारत में कभी बेतुके फतवे जारी करनासलेमपुर गांव जैसा फरमान सुनाया जाना आदि कृत्य शर्मनाकइस्लाम विरोधी और मानवता विरोधी ही नहींबल्कि इस्लाम धर्म की प्रतिष्ठा पर धब्बा लगाने वाले भी हैं. यह कैसी विडंबना है कि उस गांव के तथाकथित मुसलमान एक मुस्लिम परिवार को भूखा-परेशान देखकर ख़ुश हो रहे हैंजबकि एक सिख परिवार उस परेशानहाल मुस्लिम परिवार की भूख और परेशानियां सहन नहीं कर पा रहा और यथासंभव मदद कर रहा है. क्या संदेश देती हैं हमें ऐसी घटनाएंक्या ऐसे फरमानों से इस्लाम का नाम रोशन हो रहा हैयहां एक सवाल यह भी उठता है कि जिस मदरसे की बुनियाद में ऐसे तालिबानी फरमान शामिल होंउन मदरसों से भविष्य में निकलने वाले बच्चों की मज़हबी तालीम क्या हो सकती है और आगे चलकर वही तालीम क्या गुल खिलाएगीइस बात का बड़ी सहजता से अंदाज़ा लगाया जा सकता है. इन कट्टरपंथी तालिबानी सोच के मुसलमानों को उस सिख परिवार से प्रेरणा लेनी चाहिए,जो उनके द्वारा भुखमरी की कगार पर पहुंचाए गए मुस्लिम परिवार को रोटी मुहैया करा रहा है. आज भी देश में हज़ारों ऐसी मिसालें मिलेंगीजिनमें हिंदूमुस्लिम एवं सिख समुदाय के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं. कहीं हिंदू नमाज़ पढ़ते हैंकहीं रोज़ा रखते हैंकहीं मोहर्रम में ताज़ियादारी करते हैं तो कहीं पीरों-फकीरों की दरगाहों की मुहा़फिज़त करते हैं. इन ग़ैर मुस्लिमों का इस्लामी गतिविधियों की ओर झुकाव की वजह स़िर्फ उदारवादी इस्लामी शिक्षाएं हैंन कि कट्टरपंथी तालिबानी फरमान.
सलेमपुर की घटना से एक बात और ज़ाहिर होती है कि जब इन मुसलमानों का रवैया अपने ही समुदाय के एक परिवार के साथ ऐसा है तो फिर दूसरे समुदाय के प्रति इनसे प्रेम-सद्भाव से पेश आने की उम्मीद कैसी की जा सकती है. प्रभावित परिवार आज इस स्थिति में पहुंच गया है कि बुज़ुर्ग महिला मरियम ने यहां तक कह दिया कि अब हम इनके आगे न झुक सकते हैंन कुछ मांग सकते हैंबल्कि हमें ग़ैर मुस्लिमों के आगे झुकने और उनसे मांगने में कोई हर्ज नहीं है. कितना बेहतर होतायदि यही पंचायत अथवा अंजुमन ग़रीबों को आत्मनिर्भर बनानेउनकी रोज़ी-रोटी और शिक्षा आदि सुनिश्चित करने को तवज्जो देती. बजाय इसके वह लोगों से ज़ोर-ज़बरदस्ती करके चंदा वसूलने और न देने पर उनका सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार करने जैसा अधार्मिक कृत्य अंजाम दे रही है. ज़रूरत इस बात की है कि ऐसे अज्ञानी कठमुल्लाओं से इस्लाम धर्म को कलंकित होने से बचाया जाए. क्या ऐसे तुगलकी और तालिबानी फरमान ग़ैर मुस्लिमों को अपनी ओर आकर्षित कर सकेंगेजिनसे मुस्लिम समुदाय का ही कोई परिवार रुसवा और बेज़ार हो जाए. जो इस्लाम सभी धर्मों एवं समुदायोंयहां तक कि पेड़-पौधों के साथ भी मानवता और सद्भाव से पेश आने की बात करता होवह किसी को भूखे रहने के लिए मजबूर करने की तालीम कैसे दे सकता है. इस्लाम में सूदखोरी हराम क्यों क़रार दी गई हैइसीलिए कि किसी व्यक्ति पर नाजायज़ आर्थिक बोझ न पड़े. इस्लाम में दिनोंदिन बढ़ती जा रही ऐसे लोगों की घुसपैठ रोकनी होगी. ऐसे फरमान जारी करने वालों के ख़िला़फ भी सख्त कार्रवाई किए जाने की ज़रूरत हैजैसा सलेमपुर के उस ग़रीब दंपत्ति के साथ वहां की अंजुमन ने किया. यह ग़ैर इस्लामी और अमानवीय हैइसकी जितनी भी घोर निंदा की जाएकम है.
तनवीर जाफरी

Sunday, November 25, 2012

मानव जाति की वास्तविक विडम्बना manav jati

यह बात बिल्कुल सही है कि बहुत सी बातें मौलवी साहिबान और पंडित जी अपने विवेक से बताते हैं और कई  बार ऐसा भी होता है कि धर्म की गददी पर ऐसे स्वार्थी तत्व बैठ जाते हैं जिनका मक़सद परोकपकार और ज्ञान का प्रचार नहीं होता बल्कि शोषण होता है। आज ऐसे तत्व ज़्यादा हैं लेकिन धार्मिक जन भी हैं।
धर्म जीवन की गुणवत्ता बढ़ाता है, जीने की राह दिखाता है। सबको बराबरी और प्रेम की शिक्षा देता है। ईश्वर सबको आनंदित देखना चाहता है। इसीलिए वह मनुष्य का मार्गदर्शन करता है। 
उसके मार्गदर्शन का नाम ही ‘धर्म‘ है, 
अपनी तरफ़ से मनुष्य जो कुछ चलाता है, वह दर्शन है।
दुनिया में दर्शन बहुत से हैं जबकि धर्म केवल एक है और सदा से बस एक ही है।
यही एक धर्म कल्याणकारी है।
लोग अपने स्वार्थ में पड़कर एक धर्म के अनुसार व्यवहार न करके अपने बनाए हुए दर्शनों में चकराते रहते हैं।
मानव जाति की वास्तविक विडम्बना यही है।
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यह कमेंट पल्लवी सक्सेना जी की पोस्ट पर किया गया है-
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