Thursday, February 2, 2012

यज्ञ हो तो हिंसा कैसे ।। वेद विशेष ।। पर एक संवाद भाई अनुराग शर्मा जी से

यज्ञ हो तो हिंसा कैसे ।। वेद विशेष ।। पर एक संवाद भाई अनुराग शर्मा जी से

  1. @ डॉ. जमाल,


    आप वृषभ के अर्थ देखिये तो सही, ऋषभकन्द की बात भी अपने आप ही क्लीयर हो जायेगी। ऑक्स्फ़ोर्ड के संस्कृत प्राध्यापक सर मॉनियेर मॉनियेर-विलियम्स के ऋग्वैदिक शब्दकोष के अनुसार भी वृषभ का एक अर्थ बैल के सींग जैसी शक्ल की कन्द होता है। इसके अलावा वृषभ शब्द का अर्थ शक्ति और शक्तिमान है। आप तो पोषण के बारे में काफ़ी टिप्पणियाँ देते रहे हैं, आपको यह तो पता होगा कि शर्करा तुरंत शक्ति देती है। आप तो संस्कृत के विद्वान हैं, यह भी समझते होंगे कि वृषभ ऋषभ का ही एक रूप है, ठीक वैसे ही जैसे विशुद्ध, शुद्ध का। पहले जैन तीर्थंकर ऋषभदेव अयोध्या के प्रसिद्ध इक्ष्वाकु वंश में जन्मे थे और इक्ष्वाकु वंश को संसार में पहली बार ईख की खेती करने का श्रेय जाता है। वही गन्ने जिसके लिये सिकन्दर के साथ आये मेगस्थनीज़ ने आश्चर्य से लिखा था कि भारतीय लोग बिना मधुमक्खी के शहद बनाते हैं। ऋषभकन्द के बारे में इतनी जानकारी पाकर अब आपको अन्दाज़ लग जाना चाहिये कि बात किस चीज़ की हो रही है।

    वेद और यज्ञ में हिंसा के आपके अब तक के आक्षेप का अच्छी तरह निराकरण हुआ है। अब और नया उधार लेने से पहले, पहले का पूरा नहीं तो कुछ तो चुकता करते जाओ। बात शाकाहार की हुई हो या वेदमंत्रों की, आपने पोषण और विटामिन के बारे में जो बात की, गलत साबित हुई, मंत्रों की बात की गलत साबित हुई, शब्दार्थ की बात की, गलत साबित हुई। लेकिन आप अभी भी नये सवाल लाये जा रहे हैं। इत्मीनान रखिये, आपके ताज़ातरीन सवालों के सटीक जवाब देने में हमें कोई समस्या नहीं है। सच तो यह है कि वे जवाब हज़ारो साल पहले दिये जा चुके हैं, और वो भी उन्हीं किताबों में जिनमें आप अभी तक बस सवाल ढूंढ रहे हैं। फिर भी अगर आप अपनी नई शंकाओं का निराकरण भी हमीं से सुनना चाहते हैं तो आपकी वह इच्छा भी अवश्य पूरी होगी मगर समय आने पर। तब तक के लिये स्पूनफ़ीडिंग करने के बजाय मैं उसका होमवर्क आज आप को ही देता हूँ:

    होमवर्क: आपने जिस मंत्र को उद्धृत किया, उसके सूक्त में वर्णित संसार के उद्गम का विश्व का प्राचीनतम और सुन्दरतम विमर्श आगे वेदांत तक चला है, ज़रा ढूंढकर लाइये और पाठकों को बस इतना बता दीजिये कि यह विमर्श आगे कैसा चला और इसका निष्पादन किस उपनिषद में हुआ है?
    [वैसे तो आपका सवाल विषय से इतर ही था, इसलिये "निरामिष" प्रवक्ता की अनुमति से यहाँ रखें अन्यथा मुझे ईमेल पर भेज दें, धन्यवाद]
    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. @ भाई अनुराग शर्मा जी ! आपकी ख्वाहिश का सम्मान करते हुए हमने नासदीय सूक्त पर हुए विमर्श को तलाश किया तो हमें यह मिला है, आप एक नज़र देख लेंगे तो हम आपके शुक्रगुज़ार होंगे।
      वेद में सरवरे कायनात स. का ज़िक्र है Mohammad in Ved Upanishad & Quran Hadees
      यह जानने के लिए आज हम वेद भाष्यकार पंडित दुर्गाशंकर सत्यार्थी जी का एक लेख यहां पेश कर रहे हैं।
      आज तक लोगों ने यही जाना है कि ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो ज्ञानी होय‘ लेकिन अगर ‘ज्ञान‘ के दो आखर का बोध ढंग से हो जाए तो दिलों से प्रेम के शीतल झरने ख़ुद ब ख़ुद बहने लगते हैं। यह एक साइक्लिक प्रॉसेस है।
      पंडित जी का लेख पढ़कर यही अहसास होता है।
      मालिक उन्हें इसका अच्छा पुरस्कार दे, आमीन !
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      ‘इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न। यो अस्याध्यक्षः परमेव्योमन्तसो अंग वेद यदि वा न वेद।‘
      वेद 1,10,129,7
      यह विविध प्रकार की सृष्टि जहां से हुई, इसे वह धारण करता है अथवा नहीं धारण करता जो इसका अध्यक्ष है परमव्योम में, वह हे अंग ! जानता है अथवा नहीं जानता।
      सामान्यतः वेद भाष्यकारों ने इस मंत्र में ‘सृष्टि के अध्यक्ष‘ से ईशान परब्रह्म परमेश्वर अर्थ ग्रहण किया है, किन्तु इस मंत्र में एक बात ऐसी है जिससे यहां ‘सृष्टि के अध्यक्ष‘ से ईशान अर्थ ग्रहण नहीं किया जा सकता। वह बात यह है कि इस मंत्र में सृष्टि के अध्यक्ष के विषय में कहा गया है - ‘सो अंग ! वेद यदि वा न वेद‘ ‘वह, हे अंग ! जानता है अथवा नहीं जानता‘। ईशान के विषय में यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वह कोई बात नहीं जानता। फलतः यह सर्वथा स्पष्ट है कि ईशान ने यहां सृष्टि के जिस अध्यक्ष की बात की है, वह सर्वज्ञ नहीं है। मेरे अध्ययन के अनुसार यही वेद में हुज़ूर स. का उल्लेख है। शब्द ‘नराशंस‘ का प्रयोग भी कई स्थानों पर उनके लिए हुआ है किन्तु सर्वत्र नहीं। इसी सृष्टि के अध्यक्ष का अनुवाद उर्दू में सरवरे कायनात स. किया जाता है।
      फलतः श्वेताश्वतरोपनिषद के अनुसार वेद का सर्वप्रथम प्रकाश जिस पर हुआ। वह यही सृष्टि का अध्यक्ष है। जिसे इस्लाम में हुज़ूर स. का सृष्टि-पूर्व स्वरूप माना जाता है।
      मैं जिन प्रमाणों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं, आइये अब उसका सर्वेक्षण किया जाए।
      Go to -
      http://www.vedquran.blogspot.in/2012/01/mohammad-in-ved-upanishad-quran-hadees.html

Wednesday, February 1, 2012

सत्य के अनुसरण से ही सतयुग आएगा Towards Satyug

भाई रतन सिंह शेख़ावत जी ! मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। दुख की बात यह है कि मुसलमानों की नफ़रत में इंसान इस हद तक गिर गया है कि वह ईश्वर की कृतियों की पैदाइश पर ही पाबंदी की बातें सोचने लगा है। ये वे लोग हैं जो कि अपने ख़र्चे पर अपने ही पेटों में ईश्वर की कृति को सिर्फ़ इसलिए क़त्ल कर देते हैं कि वह लड़की है। समस्या वास्तव में यही लालची सोच है। जिस दिन आदमी अपने लालच पर क़ाबू पा लेगा, उस दिन उसके दिल से बढ़ती आबादी का डर भी निकल जाएगा। उसके दिल से यह डर तब निकलेगा जब उसके दिल में ईमान आएगा कि मूलतः योजना बनाने और अपना हुक्म चलाने का अधिकार मनुष्य को नहीं है। जगत का सच्चा योजनाकार वास्तव में एक ईश्वर है। पैदा करने वाला वही है। जिसे वह पैदा कर रहा है, उसका अन्न पानी भी वही देगा। इस देश से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाए और पूंजीवादियों के हितों को पूरा करने से बचा जाए तो आज भी धरती इतना अन्न फल उपजाती है कि वह हम सबके लिए काफ़ी है।
इस ज़मीन से ज़रूरतें तो सबकी पूरी हो सकती हैं लेकिन हवस तो किसी एक की भी पूरी नहीं हो सकती।
हवस की दलदल से निकलने की आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
ईश्वर की योजना क्या है और उसका आदेश क्या है ?
इसका पता आज केवल क़ुरआन से ही चल सकता है जो कि ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह सुरक्षित है। मुसलमानों से नफ़रत हवस के मारों को क़ुरआन से दूर ले जा रही है और फिर वे जान ही नहीं पाते कि उनकी पैदाइश से उस मालिक का उददेश्य क्या था ?
वे बस खा पीकर और जल कुढ़कर ही मर जाते हैं।
जलना ही उनकी तक़दीर है दुनिया में भी और दुनिया से जाने के बाद भी।
उनके लिए आग है यहां भी और वहां भी।
शांति केवल ईश्वर की शरण में है और उसके आदेश के अनुसरण में है। सत्य के अनुसरण से ही सतयुग आएगा।
इसी में मनुष्य की सफलता है।
आइए अपने जीवन को हम सफल बनाएं।
प्रेम करें और प्रेम पाएं।
जिससे हम प्रेम करते हैं, उसे बढ़ते देखना हम पसंद करते हैं।
रहने के लिए केवल धरती ही तो नहीं है, अब तो ईश्वर ने आकाश मार्ग भी हमारे लिए खोल दिया है, जहां अरबों खरबों ग्रह मौजूद हैं।
ऊंचा सोचिए और ऊंचा पहुंचिए।
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यह कमेन्ट निम्न पोस्ट पर दिया गया है :

आगे बढ़कर सत्य को मानें और दूसरों के लिए एक मिसाल बनें जैसे कि पं. श्री दुर्गाशंकर सत्यार्थी जी महाराज

ZEAL: बढती मुस्लिम आबादी एक विश्व-संकट (Muslim demographics (Europe, USA, Scandinavia) पर ग़ौरो फ़िक्र किया जाए तो कुछ बातें सामने आती हैं और जो बातें सामने आती हैं, उन्हें जानने के बाद दिल को बहुत सुकून मिलता है।
मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है या नहीं और बढ़ रही है तो कितनी बढ़ रही है ?
इस पर आज ध्यान देने की ज़रूरत है और उससे भी ज़्यादा ज़रूरत इस बात पर देने की है कि हिंदुस्तान के पंडित और शास्त्री पहले से ही बता रहे हैं कि अब जल्दी ही सतयुग आने वाला है।
वह सतयुग इसी रूप में आएगा कि सत्य को मानने वाले ही विश्व पर छा जाएंगे।
तब क्यों न आप पहले से ही आगे बढ़कर सत्य को मानें और दूसरों के लिए एक मिसाल बनें जैसे कि पं. श्री दुर्गाशंकर सत्यार्थी जी महाराज ने भी कहा है कि
वेद और क़ुरआन हक़ीक़त में एक ही धर्म के दो ग्रंथ हैं।
इसी बात को छिपाए रखने के लिए और हिंदू और मुसलमानों को आपस में लड़ाए रखने के लिए अंग्रेज़ बहादुर ने बहुत चालाकी से काम लिया और आज तक ले रहे हैं और कम समझ नादान लोग उनके सुर में सुर मिलाए जा रहे हैं। विदेशों में बैठे हुए कुछ लोग आज भी हिंदुओं के मन में मुसलमानों के लिए नफ़रत के बीज बोते रहते हैं और उसका फ़ायदा उनके आक़ाओं को ही मिलता है।
पंडित सत्यार्थी साहब का मज़्मून ऐसी हरेक साज़िश को नाकाम कर देता है, उसे पढ़िए और उसे शेयर भी कीजिए।

वेद में सरवरे कायनात स. का ज़िक्र है Mohammad in Ved Upanishad & Quran Hadees

वस्तुतः वेद और क़ुरआन, दोनों का एक साथ अस्तित्व नास्तिकों के लिए घोर परेशानी का कारण बना हुआ है और अंग्रेज़ इस संभावना से आतंकित थे कि यदि यह रहस्य हिंदुओं और मुसलमानों पर खुल गया कि वेद और क़ुरआन, दोनों की सैद्धांतिक शिक्षाएं सर्वथा एक समान हैं और दोनों एक ही धर्म के आदि और अंतिम ग्रंथ हैं, तो हिंदुओं और मुसलमानों में वह मतैक्य संस्थापित होगा कि उन्हें हिंदुस्तान से पलायताम की स्थिति में आने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं रहेगा। यही कारण है कि अंग्रेज़ों ने वेद के बहुदेवोपास्यवादी अनुवाद कराना अपना सर्वप्रथम कार्य निश्चित किया।

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!

Ratan Singh Shekhawat said...

अब जल्दी ही सतयुग आने वाला है।
वह सतयुग इसी रूप में आएगा कि सत्य को मानने वाले ही विश्व पर छा जाएंगे।
@ सतयुग तो पता नहीं आएगा या नहीं पर उसके आने से पहले यह (बढती आबादी) समस्या कलियुग के चरम का अहसास जरुर करवा देगी|


Sunday, January 22, 2012

ब्लॉगर भी कम कहां हैं ? Salman Rushdie

♠ ब्लॉगर भी कम कहां हैं ?
1- यहां भी आए दिन नित नए इल्ज़ाम लगाने वाले और नित नए फ़ित्ने फैलाने वाले ब्लॉगर मौजूद हैं। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. के बारे में शायद ऐसी असभ्य बातें तो जयपुर आने और न आने वाले किसी साहित्यकार ने भी न कही होंगी जैसी कि ब्लॉगर आए दिन यहां कहते रहते हैं.
ब्लॉगर मीट में गन्ना चूसने ये भी आते हैं और सम्मान पाते हैं और जिसे देस का ‘गन्ना‘ चूसे हुए अर्सा लंबा गुज़र गया. उसका भी यही मशग़ला रोज़ का है.
ख़ैर ग़लतफ़हमियां दूर करने वाले ब्लॉगर भी यहां है.
यह एक प्लस प्वाइंट है।
देखें -

http://ahsaskiparten.blogspot.com/2012/01/love-jihad.html

2- सलमान रूश्दी के भारत आगमन की चिंता में वे लोग घुल रहे हैं जिन्होंने मक़बूल फ़िदा को वतन से जुदा कर दिया। वाक़ई यह दोहरेपन की बात हुई। यही लोग लव जेहाद का फ़र्ज़ी हौआ खड़ा करते हैं।

♥ ♥ एक अच्छी चर्चा के लिए आपका आभार !
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हमने यह कमेट इस पोस्ट पर दिया है -

साहित्यकार ऐसे होते हैं तो हम ब्लॉगर ही भले...खुशदीप


बॉलीवुड का एक बात के लिए मैं बहुत सम्मान करता हूं कि यहां एक दूसरे को कभी मज़हब के चश्मे से नहीं देखा जाता...सब एक दूसरे से घी-शक्कर की तरह ऐसे घुले-मिले हैं कि कोई एक दूसरे को अलग कर देखने की सोच भी नहीं सकता...बल्कि जब भी देश की एकता या सामाजिक सौहार्द के लिए कोई संदेश देने की ज़रूरत पड़ी तो बॉलीवुड पीछे नहीं हटा....लेकिन समाज को दिशा देने का दावा करने वाले साहित्यकारों का एक वर्ग किस तरह की मिसाल पेश करना चाहता है....जयपुर साहित्य सम्मेलन में विवादित लेखक सलमान रूश्दी के नाम पर जो कुछ हुआ वो किसी भी लिहाज़ से देश के माहौल के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता....
मुझे इस पूरे प्रकरण में आयोजको की मंशा समझ नहीं आई आखिर वो करना क्या चाहते थे...एक तरफ वो कानून के पालन की बात करते हैं, दूसरी तरफ रुश्दी जैसे विवादित लेखक को न्योता देकर पूरे आयोजन को ही हाशिये पर डाल देते हैं...रुश्दी के भारत आने या ना आने का सवाल ही सुर्ख़ियों में छाया रहता है...विवादित किताब के अंशों को पहले मंच से पढने का मौका दिया जाता है, फिर कानून की दुहाई दी जाती है...बहस इस पर हो सकती है कि किसी किताब पर प्रतिबन्ध लगाना सही है या नहीं...बहस इस पर हो सकती है कि किसी लेखक का विचारों कि आज़ादी के नाम पर कहाँ तक लिबर्टी लेना सही है...बहस इस बात पर हो सकती है कि कोई पेंटर देवी-देवताओं की नग्न पेंटिंग बना कर कला का कौन सा उद्देश्य पूरा करता है...लेकिन सब से पहले देश है....यहाँ के कानून को मानना हर नागरिक का फ़र्ज़ है...अगर कोई सोच-समझ कर कानून को तोड़ता है तो फिर उसे नतीजे भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए...

अगर साहित्यकारों का ऐसा चेहरा हैं तो फिर हम ब्लॉगर ही भले हैं जो सांपला जैसी जगह पर मिलते हैं तो बिना किसी भेदभाव सिर्फ प्यार और शांति का सन्देश फ़ैलाने के लिए...
पूरा लेख पढने के लिए लिंक पर जाएँ .

Thursday, January 12, 2012

धार्मिक सद्भाव भी बढ़ाती है सुबह की सैर Morning walk in Deoband

सुबह की सैर का कोई विकल्प नहीं है।
हम इस टिप्पणी के शीर्षक में दी गई एक लाइन लिखकर ही जाने वाले थे कि हमें मौलाना वहीदुदीन ख़ान साहब याद आ गए। उनकी उम्र तक़रीबन 100 साल है और वे आज भी फ़िट हैं। पूरी दुनिया में आ जा रहे हैं। सेंटर फ़ॉर पीस एंड स्प्रिच्युएलिटि चला रहे हैं। ख़ुद भी सकारात्मक हैं और दूसरों को भी सकारात्मक बना रहे हैं। सुबह की सैर उनकी नियमित दिनचर्या का हिस्सा है। उनके चेहरे की आभा देखते ही बनती है।
 www.cpsglobal.org पर आप उनसे आमने सामने रू ब रू भी हो सकते हैं।
इसके बाद हमें याद आ गया देवबंद और देवबंद के याद आते ही हमें यह भी याद आ गया कि सुबह की सैर धार्मिक सद्भाव भी बढ़ाती है।
देवबंद में इस समय 4 हज़ार से ज़्यादा तालिब इल्म इस्लामी मदरसों में शिक्षा पा रहे हैं और उन्हें शिक्षा देने वाले उस्तादों की तादाद भी 300 से ज़्यादा होगी। सहायक स्टाफ़ की गिनती इससे अलग है। छोटे छोटे मदरसों को भी जोड़ा जाए तो गिनती मुश्किल हो जाती है।
शहर के बाहर जंगल में त्रिपुर बाला सुंदरी देवी का मंदिर है और उससे मिला हुआ संस्कृत महाविद्यालय है। वहीं एक बहुत बड़ा कुंड भी है जिसे देवीकुंड भी कहते हैं और उसमें बड़ी बड़ी मछलियां भी बहुत हैं। कुंड के पास एक फूलों से भरा हुआ बग़ीचा भी है।
शहर के एक किनारे पर लालक़िला और ताजमहल की याद दिलाने वाले मदरसों की इमारतें हैं तो दूसरी तरफ़ मंदिर और गुरूकुल और शहर भर में मंदिर मस्जिद पास पास तो हैं ही और कहीं कहीं तो बहुत ही पास पास हैं। मिले हुए भी हैं। मदरसों के उस्ताद अपने शिष्यों के साथ घूमते हुए देखे जाएं तो एक अच्छा अनुभव होता है। उस्ताद तो देवीकुंड की तरफ़ नहीं जाते लेकिन मदरसों के छात्र रोज़ाना ही उधर जाते हैं। कितने भी कम जाएं फिर भी तादाद बहुत हो जाती है। हिंदू आचार्य और आम शहरी हिंदू भाई भी घूमने के लिए और अपने मेहमानों को दिखाने के लिए दारूल उलूम की तरफ़ चले आते हैं।
इस तरह एक संस्कृति का दूसरी संस्कृति से परस्पर मिलन होता है और सारी आशंकाएं स्वतः ही निर्मूल हो जाती हैं। देवबंद एक धार्मिक नगरी मानी जाती है। हिंदू और मुस्लिम, दोनों के ही मंदिर, मस्जिद और दरगाहें यहां हैं। इसके बावजूद यहां धार्मिक सदभाव बना हुआ है।
आज आपका लेख पढ़कर ध्यान आया कि इसके पीछे सुबह की सैर का भी बड़ा योगदान है।
सुबह की सैर से ज्ञान भी मिलता है और दिल की दुनिया में प्रेम के अंकुर भी फूटते हैं। सुबह की सैर मन को निर्मल भी करती है।
‘उपचार की सहज वृत्ति‘ एक अंग्रेज़ी किताब का अनुवाद है। इसमें बहुत पहले हमने एक मनोचिकित्सक के बारे में पढ़ा था कि उसके पास अवसाद का एक मनोरोगी आया। उसके लिए कोई भी दवा कारगर नहीं हो पा रही थी। तब उसे एक विशेष मनोचिकित्सक के पास भेजा गया। उसने उसे कहा कि आप सुबह उस वक्त उठ जाएं जबकि अंधेरा हो और आप पौ फटने के क़ुदरती सीन को देखा करें। उसने ऐसा ही किया और कुछ दिनों बाद उसका अवसाद बिना किसी दवा के ही ठीक हो गया।
इंसान अगर अपनी बायो क्लॉक (जैव घड़ी) का पालन करे जैसे कि दूसरे पशु-परिंदे करते हैं तो वह बहुत सी बीमारियों से बचा रहेगा। जो लोग बीमार हो चुके हैं। उनके लिए बहुत ज़रूरी है कि वे अपनी दवा गोली के साथ अपना सोना जागना ठीक कर लें और नियमित रूप से सैर किया करें।
वाक़ई सुबह की सैर का कोई विकल्प नहीं है।
एक अच्छा लेख पढ़वाने के लिए आपका शुक्रिया !

A Visit to Darul Uloom Deoband - Masjid e Qadeem,Masjid e ...

www.youtube.com/watch?v=vpimOU_sMjY19 Mar 2011 - 19 min - Uploaded by bismillahnews
A Visit to Darul Uloom Deoband - Masjid e Qadeem,Masjid e Rasheed,Qasmi Qabristan ...

कुमार राधा रमण जी के ब्लॉग पर  डॉ. आभा पंडित का लेख भी देखिए जिस पर हमने यह टिप्पणी दी है-

मॉर्निंग वाक का कोई विकल्प नहीं

आप चाहें तो सारा दिन कसरत करें, लेकिन सुबह की सैर का कोई विकल्प नहीं है। रात को सो चुकने के बाद आप तरोताजा रहते हैं। थकान नहीं रहती और मन से भी प्रफुल्लित रहते हैं। ऊषाकाल में पैदल चलने पर आपके फेफड़ों में ताजी और ऑक्सीजन से भरपूर हवा भरती है। दिन भर के लिए ऊर्जा भी इसी दौरान हासिल की जाती है। 
दो-तीन महीनों तक नियमित सुबह की सैर और जीवनशैली में परिवर्तन करने के बाद कराए गए परीक्षणों में वह नॉर्मल पाया गया। सुबह जल्दी उठने की हिदायत होने के कारण मरीज की रात की पार्टीज बंद हो गई। वह समय पर सोने लगा। भरपूर नींद से थकान दूर होकर सुबह शरीर तरोताजा रहने लगा। ४० मिनट तक तेज गति से पैदल चलने के कारण शरीर में रक्तसंचार तेज हो गया और खराब कोलेस्ट्रॉल की मात्रा घट गई। सुबह पैदल चलने के दौरान हुए आत्म-मंथन ने उसके सोचने की दिशा बदल दी। उसका तनाव घटने लगा और वह ज्यादा खुश रहने लगा। फेफड़ों में भरपूर ऑक्सीजन भरने के कारण रक्त शुद्धि हो गई और शरीर से विषैले पदार्थों का निष्कासन होने लगा। त्वचा अधिक चमकदार हो गई। आज चिकित्सक उनके पास आने वाले दस में से सात मरीजों को प्रातःकाल कम से कम ४० मिनट तक तेज चाल में चलने की सलाह देते हैं। पैदल चलने से श्वास गति, हृदय गति तथा रक्तचाप पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। जठराग्नि तेज होती है, पाचन प्रणाली अधिक सक्रिय हो जाती है। भूख भी बढ़ती है। 
मयंक (२८) एक आईटी कंपनी में एक्जीक्यूटिव है। वह लगभग १२ घंटे काम करने के बाद भी थकता नहीं है। अक्सर देर रात तक दोस्तों के साथ आउटिंग भी करता है। दूसरों को हमेशा एकदम फिट नजर आता है। कंपनी द्वारा कराए गए वार्षिक एक्जीक्युटिव चैकअप में मयंक के बारे में डॉक्टरों की राय एकदम विपरीत निकली। परीक्षण के नतीजों से जाहिर हुआ कि उसका रक्तचाप बढ़ा हुआ है और कोलेस्ट्रॉल भी खतरे के निशान से ऊपर है। डॉक्टरों ने उसे अनेक दवाइयाँ लिखने के साथ ढेर सारी हिदायतें भी दे डालीं, जिनमें खान-पान में अनेक परहेज के साथ-साथ सुबह की सैर भी शामिल थी। मयंक के साथ उसके सभी साथी आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे कि "एकदम फिट" दिखने वाला इंसान एकाएक दिल की बीमारी के जोखिम के इतने करीब कैसे पहुँच गया? 


कैसे चलें... 
मार्निंग वॉक का पूरा फायदा उठाने के लिए शरीर बिलकुल सीधा तथा तना हुआ होना चाहिए। टहलते समय मुँह बिलकुल बंद हो तथा साँस पूरी तरह नाक से ही लें। मार्निंग वॉक एक प्राकृतिक प्रशांतक है। इससे मस्तिष्क से उठने वाली विभिन्ना लहरें तनावरहित होकर शिथिल हो जाती हैं। इससे मन-मस्तिष्क को सुकून प्राप्त होता है। स्वभाव भी प्रसन्नाचित्त रहने लगता है। मार्निंग वॉक से मस्तिष्क में एन्डोर्फिन हार्मोन स्रावित होता है, जिससे हमारे स्वभाव में परिवर्तन आता है तथा सकारात्मक भावनाएं पैदा होती हैं। यदि पति-पत्नी साथ-साथ टहलते हैं,तो उनमें अंतरंगता बढ़ती है तथा उनमें "मैं" के स्थान पर "हम" के भाव पैदा होते हैं। साथ ही,उनमें परस्पर सहारा देने की भावना और परस्पर विश्वास के भावों में भी स्थायित्व आने लगता है। हम जैसे ही मॉर्निंग वाक के लिए बाहर निकलते हैं, घर के वातावरण,जिम्मेदारियों तथा तनाव को पैदा करने वाले कारकों से चाहे अस्थायी रूप से ही सही,परन्तु कुछ देर के लिए मुक्ति जरूर पा जाते हैं।


अवसाद पर विजय पाने का यह भी एक सरल तरीक़ा है। दूसरी ओर,यदि हम समूह में टहलते हैं तो आपस में हंसी मज़ाक होता है,जिससे हमारा मनोदैहिक स्वास्थ्य सुधरता है। अनुसंधानों से मालूम हुआ है कि हंसने से रक्तसंचार तेज़ होता है,जिससे दिमागी समस्याओं से पीड़ित रोगियों को लाभ होता है क्योंकि रक्तसंचार में वृद्धि होने से मस्तिष्क को अधिक ऑक्सीजन तथा ग्लूकोज प्राप्त होता है। सकारात्मक भावनाओं का संचार होता है। भावनाओं का हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता से गहरा संबंध होता है। विशेषज्ञों की राय में,आशावादी व्यक्ति तनाव का अनुभव कम करते हैं। इससे रोग प्रतिरोधी क्षमता उत्तम बनी रहती है। ब्लड प्रेशर कोलेस्ट्रॉल,मोटापा आदि बढ़ा हुआ हो,तो चिकित्सक की सलाह लेने के बाद ही वॉक पर जाएं(डॉ. आभा पंडित,सेहत,नई दुनिया,जनवरी 2013 प्रथमांक)

Wednesday, January 11, 2012

कब वह समय था जब आपकी नज़र में यहां बराबरी और इंसाफ़ के गुणों से भरे पूरे लोग बसते थे ?

पल्लवी जी ! आपका लेख बहुत अच्छा है और हम सभी को यह ज़रूर सोाचना चाहिए कि हम अपने देश और अपने समाज के लिए क्या कर रहे हैं ?
हमारे अंदर इंसानियत कितनी है ?

लेकिन इसी के साथ आपने कहा है कि हमारे देश की संस्कृति के मूल आधार अब हमारे पास नहीं रहे।

आपको इन्हें स्पष्ट करना चाहिए था।
इस देश की संस्कृति के मूलाधार आपकी नज़र में क्या हैं ?
और वे इस देश में कब थे ?
कब वह समय था जब आपकी नज़र में यहां बराबरी और इंसाफ़ के गुणों से भरे पूरे लोग बसते थे ?
वह कौन सा समय था जब यहां औरत और कमज़ोर वर्ग आनंद मना रहे थे ?
उस समय की संस्कृति को चिन्हित करने के बाद ही उस काल की संस्कृति की पनर्स्थापना का प्रयास किया जा सकता है।
देखिये  पल्लवी  जी  का  लेख 
आज आज़ादी के इतने सालों बाद भी मुझे तो ऐसा लगता है कि आगे बढ़ने के बाजये और पिछड़ गए हैं हम, क्यूंकि हमारी संस्कृति के मूल आधार ही अब हमारे नहीं रहे। जिसमें झलकती थी हमारे देश कि संस्कृति और सभ्यता की खुशबू अब उसकी जगह ले ली है आपसी मतभेद और नकल ने फिर उसका क्षेत्र चाहे जो हो वो मायने नहीं रखता। जिस देश के नेता भ्रष्ट हों ,जिस देश कि आने वाली नस्लें खुद अपना ही देश छोड़ के जाने पर आमादा हों, जिस देश के लोगों में अपनी मात्र भाषा को लेकर द्वंद मचा रहता हो। क्या ऐसे देशवासियों को अधिकार है राष्ट्रीय त्योहार मनाने का आज़ादी के गीत गाने का ???? खुद को सच्चा हिन्दुस्तानी कहने का ...??? यदि मेरे इन सवालों का कोई जवाब आपके पास हो तो कृपया ज़रूर अवगत करायें ....

Thursday, January 5, 2012

नास्तिक विचार इंसान को भ्रष्टाचार की प्रेरणा देता है। Atheist

@ भाई सुज्ञ जी ! वाक़ई आपने हक़ीक़त बयान की है। डर इंसान की प्रवृत्ति का अंग है। उसका सही इस्तेमाल किया जाए तो एक अच्छे चरित्र का निर्माण किया जा सकता है। हरेक इंसान को अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल भोगना ही है। इसीलिए कुछ भी करने से पहले उसे उसके फल के बारे में ज़रूर सोच लेना चाहिए।
क़ुरआन में कहा गया है-
ऐ ईमान वालो! परमेश्वर का डर (तक़वा) इख्तियार करो और हर आदमी को देखना चाहिये कि उसने आने वाले कल के लिए आगे क्या भेजा है ? और डरो परमेश्वर से निस्संदेह परमेश्वर को उन तमाम कामों की ख़बर है जो तुम करते हो । -पवित्र कुरआन, 59, 18
 
आदमी का स्वभाव है कि वह काम का अंजाम चाहता है। परमेश्वर ने उसे उसके स्वभाव के अनुसार ही शिक्षा दी है कि हरेक आदमी को चाहिए कि वह पहले फल की चिन्ता करे ताकि उसका काम फलप्रद हो। जो भी उपदेशक आदमी को फल से बेफ़िक्र करता है दरअस्ल वह उसका दिल काम से ही उचाट कर देता है।

आपने बिल्कुल सही कहा है कि ‘नास्तिक सदाचार के पांव ही नहीं हैं।‘
झूठ के पांव होते भी नहीं हैं।
नास्तिकता के पांव तो क्या, शायद सिर भी नहीं होता वर्ना इंसान की प्रवृत्ति को तो नास्तिक जान ही लेते। जब ये लोग इंसान के दिल से डर ही निकाल देते हैं कि कर्मों का फल देने वाली कोई अलौकिक व्यवस्था नहीं है तो फिर लोग ऐसी जगह जुर्म करने से क्यों डरेंगे, जहां क़ानून के हाथ पहुंचते ही नहीं या वे उसे भी ख़रीदने की ताक़त रखते हैं। इस तरह ताक़तवर के लिए डरने की कोई वजह नहीं रह जाती।
आपके इस लेख की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है।
Fruit n work हरेक आदमी को चाहिए कि वह पहले फल की चिन्ता करे ताकि उसका काम फलप्रद हो।
http://vedquran.blogspot.com/2010/05/fruit-n-work.html

अब आप सुज्ञ जी की पोस्ट भी देखें :

कल मैने चर्चा के दौरान कहा था कि “नास्तिक-सदाचार अपने पैरों पर क्या खड़ा होगा? उस सदाचार के तो पैर ही नहीं होते”।

हमारे में सभी सद्गुण भय से ही स्थायित्व पाते है। भय प्रत्येक जीव की प्राकृतिक संज्ञा है। ईश्वर-आस्तिक को ईश्वर के नाराज़ होनें का भय रहता है। कर्म-फल-आस्तिक को बुरे प्रतिफल मिलने का भय रहता है। तो नास्तिक को बुरा व्यक्तित्व कहलाने का भय रहता है। इसी भय से सभी सदाचारी रहना उचित मानते है। आस्तिको को ईश्वर और कर्म-फल का आधार रहता है। उन्हें सदाचार की प्रसंसा और प्रतिफल अगर त्वरित नहीं मिलते तो आस्तिक सब्र कर लेता है। और निर्णायक दिन या अगले जन्म का इन्तजार कर लेता है। 

किन्तु भौतिकवादी नास्तिक, सदाचार के प्रतिफल में अनुकूल परिणाम न मिलने पर निराश होकर सदाचार से पल्ला झाड़ लेता है। इसप्रकार सदाचार पर टिके रहने को उसके पास पर्याप्त आधार नहीं होता। उसी आशय से मैने कहा था, “नास्तिकी सदाचार के पैर ही नहीं होते”

चुकिं सदाचार घोर परिश्रम, सहनशीलता और धैर्य मांगता है। कईं बार उपकार का बदला अपकार से मिलता है। कईं बार सदाचारी कायरों में गिन लिया जाता है। तो कभी भयभीत भी मान लिया जाता है। सदाचारी के शत्रुओं की संख्या भी बढ जाती है। कभी अपकीर्ती भी आरोपित हो जाती है। इस मार्ग पर डटे रहना तलवार की धार पर चलनें के समान है।

कर्म-फल पर विश्वास करता हुआ आस्तिक इस विश्वास के साथ अटल रहता है कि देर-सबेर मुझे अच्छे कर्मों का प्रतिफल अच्छा ही मिलना है। आज नहीं तो कल, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में। मै अपने सब्र की डोर न छोडूं। वह दृढता से निभाता चला जाता है। इसी आत्मबल के कारण सदाचार निभ भी जाते है।

वहीं प्रतिकूल परिस्थिति में नास्तिक के सब्र का बांध टूट जाता है। भलाई का बदला बुराई से मिलते ही उसके भौतिक नियमों में खलबली मच जाती है। वह सोचता है तब तो सदैव सदाचार का बदला बुरा ही मिलता है। फिर क्यों वह अनावश्यक सदाचार निभाकर दुख पीड़ा और प्रतीक्षा मोल ले? धर्मग्रंथों से मिलने वाली उर्ज़ा के अभाव में, नास्तिक-सदाचार वह लम्बी दौड नहीं दौड सकता। स्टैण्ड़ विहिन इस नास्तिक-सदाचार को मैनें पैर रहित पाया। बिना आधार के वे सदाचार किसके पैरों पर खड़े होंगे? http://shrut-sugya.blogspot.com/2011/06/blog-post.html

Monday, December 5, 2011

औरत का मक़ाम


जो दे न सके
वह कंगाल है
पुरूष वह है
जो देता है
न देने वाले भी
अमृत बरसाते हैं
फूटते हैं नए अंकुर
मिलता है संतान सुख
जो कि सबसे बड़ा है
अपने वुजूद की मंज़िल
पाना बड़ा है
औरत को मर्द
यहीं तक पहुंचाता है।
वह न चाहे,
तब भी।
औरत का घर
उसका मक़ाम
यही तो है
कोई छत या दीवार नहीं
कोई धरा या आकाश नहीं।
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आज हमने रश्मि प्रभा जी की रचना पढ़ी तो हमारे मन में यह आया।
क्या आप सहमत हैं ?
पढ़िए आप रश्मि प्रभा जी की रचना का एक अंश

पुरुष और स्त्री


एक स्त्री बचपन से घर का सपना देखती है
दहलीज से आँगन तक
अपनी पायल के मोहक रुनझुन में
वह खुद को तलाशती है
जिम्मेदारियां उसे तीर्थ लगती हैं
सुबह से रात की परिक्रमा में
वह कुछ शब्द चाहती है -
प्यार के
एहसास के
सम्मान के ....
जिससे वह सर्वथा वंचित होती है !
सबकुछ खोकर
एक घर के लिए
साँसों की माला पे अपने घर को ही जपती है
तब तक - जब तक उसकी आँखें शुष्क न हो जाएँ
सोच शमशान न बन जाए .....