Thursday, October 6, 2011

अवज्ञा का अंजाम दंड के सिवाय क्या है ?

नास्तिकों ने बता दिया है कि ईश्वर होता नहीं है
और सत्ता पर काबिज लोगों का कानून कुछ बिगाड नहीं पाता।
सो न तो ये लोग ईश्वर-अल्लाह के प्रकोप से डरते हैं और न ही ये कानून से डरते हैं।
ये किसी से नहीं डरते और जो भी इन्हें सुधरने के लिए कहता है उसे ये जेल के भीतर कर देते हैं, चाहे अन्ना हो या संजीव भट्‌ट।
गरीबों की उपेक्षा असंतोष को जन्म देगी और अंसतोष से बगावत पैदा होगी, उसमें भी जनता ही मरेगी।
उसके बाद फिर जो सरकार बनेगी, उसमें फिर खुदगर्ज और बेईमान लोग कुर्सियों पर कब्जा जमा लेंगे।
हालात अब ऐसे हैं कि अब इंसान की अक्ल फेल है और फिर भी वह खुदा पर ईमान लाने के लिए और उसकी आज्ञा मानने के लिए तैयार नहीं है।
अवज्ञा का अंजाम दंड के सिवाय क्या है ?
वही मिल रहा है।
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देखिये 

गरीबी ----- एक आकलन



देश के गरीबों में भी एच आई जी, एम आई जी और एल आई जी निर्धारण करने की बहस आजकल जोर शोर से चल रही है ! गरीबों में गरीब यानी की महा गरीब की प्रतिदिन आय ३२ रुपये तय हो या अधिक इस पर सरकार ने खूब समय और धन व्यय किया है ! जब एक बार यह तय हो जायेगा तब इस पर विचार किया जायेगा कि इन दुखी लोगों की किस तरह और क्या मदद की जाये ! आखिर इसमें भी लंबा समय लगेगा ही ! अंत में यह सहायता भी तो उसी पाइप लाइन से गरीबों को उपलब्ध कराई जायेगी जिसमें भ्रष्टाचार के अनेकों छेद हैं और जिनसे लीक होकर सारा धन असली हकदारों तक पहुँचने से पहले ही काफी मात्रा में बाहर निकल जाता है ! यह सब ड्रामा उसी प्रकार है जिस तरह हमें पता होता है कि बाढ़ हर साल आनी ही है इसलिए बाढ़ पीड़ितों के लिये नाव, कम्बल और आटे दाल का प्रबंध तो किया ही जाना है परन्तु बाढ़ रोकने के लिये क्षतिग्रस्त बाँधों की मरम्मत और नये बाँध बनाने का कोई उपाय नहीं किया जाता !
गरीबों और महा गरीबों को पहचान कर फौरी मदद पहुँचाने की कोशिश अपनी जगह है पर सरकार का प्रमुख लक्ष्य गरीबी हटाना होना चाहिये ! गरीब को गरीब ही रख कर उसको सस्ता अनाज खिलाना ही सरकार का एकमात्र कर्तव्य नहीं होना चाहिये ! यह काम तो तत्काल हो ही जाना चाहिये क्योंकि हमारे पास अनाज सरकारी गोदामों में भरा पड़ा है और सड़ रहा है जिसको रखने तक के लिये जगह नहीं है ! लेकिन प्रमुख समस्या है लोगों की गरीबी दूर करना !
इस समस्या का हल ऐसे लोगों के लिये रोज़गार पैदा करना है जो शिक्षा से तो वंचित हैं ही उनके पास ज़मीन व धन भी नहीं हैं जिसकी सहायता से वे कोई रोज़गार कर सकें ! ऐसे गरीबों की आमदनी का सिर्फ एक ही ज़रिया है और वह है किसी कारखाने अथवा निर्माण स्थल पर मजदूरी करना या खेत खलिहानों में नौकरी करना क्योंकि इन सभी स्थानों में अकुशल या अप्रशिक्षित व्यक्ति भी खप जाते हैं ! अब करना यह है कि ऐसे प्रोजेक्ट्स को चिन्हित किया जाये और उन्हें बढ़ावा दिया जाये जिसमें गरीब तबके के लोगों को बड़ी मात्रा में काम मिल सके !
व्यापार के क्षेत्र में वैश्वीकरण की नीतियों ने हमारे देश में बड़ा विप्लव ढाया है ! भारत का सारा बाज़ार चीनी सामानों से भरा पड़ा है ! यही सामान अगर हमारे देश में बने तो यहाँ के लोगों के लिये रोज़गार के अवसर बढ़ें और हमारे देश में औद्योगीकरण को सहारा मिले लेकिन सरकार की दोषपूर्ण नीतियों के कारण यह संभव नहीं हो पाता ! चीन से आयातित सामान जिस कीमत पर बाज़ारों में उपलब्ध है वही सामान अपने देश में जब हम बनाते हैं तो उसकी कीमत कहीं अधिक बैठती है ! चीन अपने देश के बने हुए सामान को भारत और विश्व में सस्ता बेचने के लिये अपने उद्योगों को सस्ती बिजली, सस्ता कच्चा माल व सस्ती सुविधाएँ उपलब्ध कराता है ! इसी की वजह से वहाँ के उत्पादों की बिक्री बढ़ती है और अधिक से अधिक चीनी जनता को रोज़गार के अवसर मिलते हैं ! इसके विपरीत हम इस सस्ते सामान को इम्पोर्ट कर अपने उद्योगों की कठिनाइयों को बढ़ा रहे हैं ! इस तरह ना सिर्फ हम अपने देश के हुनरमंद कामगारों को बेरोजगार बना कर घर बैठा रहे हैं बल्कि उनके आत्मसम्मान को चोट पहुँचा कर उन्हें महा दरिद्रों की श्रेणी में पहुँचा रहे हैं ! अपने देश में व्यापारी को ना सिर्फ अपने लिये कमाना पड़ता है बल्कि उसे अपने सिर पर सवार नौकरशाह और चिर क्षुधित नेताओं की भूख मिटाने के लिये भी जोड़ तोड़ करनी पड़ती है ! नतीजतन भारत के उत्पाद अपने देश में ही मंहगे हो जाते हैं !
यह ध्यान देने की बात है कि इतना संपन्न अमेरिका मात्र 9% बेरोजगारी से चिंतित है और इसे अपनी सरकार की असफलता मान रहा है ! अपने देश में तो यदि परिवार में एक व्यक्ति भी रोज़गार में लगा है तो उस परिवार को बेरोजगार नहीं माना जाता ! हकीकत तो यह है कि हमारे देश में काम करने योग्य जन शक्ति का 40% तो पूर्ण रूप से बेरोजगार है और बाकी 30% आंशिक रूप से व बचे हुए 30% ही पूर्ण रूप से बारोजगार हैं !
लेकिन इस समस्या का हल भी मुश्किल नहीं है ! नीतियों का बदलाव ज़रूरी है ! ऐसे उपक्रम जिसमें अधिक से अधिक मैन पावर का इस्तेमाल हो उन्हें बढ़ावा मिलना चाहिये ! कच्चे माल पर और सुविधाओं पर अनावश्यक टैक्स नहीं लगने चाहिये ! ऑटोमैटिक मशीनों का इस्तेमाल सिर्फ उसी दशा में किया जाना चाहिये जिसमें बेहतर गुणवत्ता का लाभ मिल रहा हो और वह ज़रूरी भी हो ! उदाहरण के लिये हथकरघे से बुनी चादरें, परदे और तौलिए आदि यदि हमको सस्ते बनाने हैं तो कपास, लघु उद्योगों में काम आने वाली बिजली आदि व अन्य सुविधाओं को सस्ता करना होगा ! शायद इसके लिये सब्सीडी भी देनी पड़ेगी ! इस तरह की वस्तुओं को आयातित वस्तुओं के अनहेल्दी कम्पीटीशन से बचाने के लिये उचित नीतियां भी बनानी होंगी ! मकसद सिर्फ एक है कि हमारी जनता को रोज़गार मिले और गरीबी दूर हो ! हो सकता है कि इससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़े लेकिन वह दबाव निश्चित रूप से उस भार से तो कम ही होगा जो गरीबों के नाम से सब्सीडी देने के लिये खर्च किया जायेगा क्योंकि परिपाटी के अनुसार इस योजना में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला तो रहेगा ही रहेगा !
सबसे महत्वपूर्ण बात जो होगी वह यह है कि रोज़गार मिलने पर हमारे देश के गरीब का आत्मसम्मान बढ़ेगा और वह महसूस करेगा कि उसने अपनी मेहनत से रोटी कमाई है ना कि महा दरिद्र की श्रेणी में खड़े होकर सरकारी राशन भीख में माँग कर अपना पेट भरा है !

साभार : साधना वैद जी 

Wednesday, October 5, 2011

चाहे वह औरत हो या मर्द , दुराचारियों को शर्मसार करना ही हमारा कर्तव्य है


देह धंधे के आरोप में पकडी गई औरतों की पोस्ट हमने यहां पब्लिश की थी और आपकी आपत्ति के बाद इस ब्लाग की व्यवस्थापिका महोदया ने पुलिस गिरफ्‌त में मुंह छिपाए हुए उन औरतों के चित्र के बारे में हमसे ईमेल द्वारा बातचीत भी की थी कि क्यों न उस चित्र को हटा दिया जाए ?
लेकिन हमने कहा था कि रावण को हर साल जलाया जाता है और कोई पुरूष यह नहीं कहता कि रावण दहन से पुरूष की मर्यादा कलंकित हो रही है।
भाई उसने काम ऐसे ही किए थे।
जो भी गलत काम करेगा, उसे सरे आम शर्मसार होना ही पडेगा।
समाज के दुराचारियों को शर्मसार करना ही हमारा कर्तव्य है, अब चाहे वह औरत हो या मर्द ताकि कोई और उस ग़लत राह पर चलने का हौसला न करे.
किसी भी गलत तत्व को उसके लिंग के आधार पर बखशा नहीं जाना चाहिए।
और हमारे जवाब से शिखा जी संतुष्ट भी हो गयी थीं.


धन्यवाद !

तिरस्कृत होती ‘‘भारतीय नारी’’ में पुरूषों का योगदान भाग -१

भारतीय नारी पर प्रकाशित नारी देह ब्यापार पर प्रकाशित एक पोस्ट के साथ लगे एक पुलिस महिला के साथ मुहँ छिपाये देह ब्यापार में लिप्त महिलाओं के चित्र पर महिलाओं के सम्मान को बनाये रखने के उद्देश्य से कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियां मैने भी की जिसपर इस ब्लाग की संस्थापक सहित अन्य सुधी पाठकों का सहयोग माँगा परन्तु किसी भी महिला अथवा नारी सम्मान के फरमाबरदारों का कोई संदेश अथवा टिप्पणी नहीं मिली अपितु सम्मानित लेखक महोदय जी ने यह कहा कि मैं उन पुरूषों के चित्र हासिल करूं जो इस ब्यवसाय में लिप्त हैं उन्हें भी स्थान दिया जायेगा।

अपेक्षकृत कुछ कडे शब्दो में प्रतिउत्तर भी प्राप्त हुये। मेरा मानना यह था कि यह सब इस ब्लाग के गुणात्मक विकास के लिये आवश्यक था सो समयानुसार घटित हो रहा था।

Monday, October 3, 2011

अच्छी बात है कि यहां मौत आ जाती है

यह बात एक देश की नहीं है, यह बात एक काल की भी नहीं है।
धर्म कहता है कि सच बोलो और सच बोलने वाले को शासक मार देते हैं हमेशा से,
यह दुनिया हमारे लिए नहीं है।
अच्छी बात है कि यहां मौत आ जाती है।
अगर जीवन अनंत होता यहां पर तो हम कैसे जी पाते ?

पूरी बात जाननेके लिए देखें :
http://loksangharsha.blogspot.com/2011/10/blog-post_03.html

महा भ्रष्ट कांग्रेसियों से भी बदतर है पवित्र गंगा का ढोंग रचाने वाले भाजपाई


कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में वाकयुद्ध प्रारंभ है वह उनको भ्रष्ट कहते हैं और वह उनको। वस्तुस्तिथि यह है कि अगर दोनों में तुलना की जाये तो इस समय महा भ्रष्ट कांग्रेसियों की सरकार में भी ए.राजा से लेकर सुरेश कलमाड़ी और अमर सिंह से लेकर सुधीर कुलकर्णी तक तिहाड़ जेल में पिकनिक मना रहे हैं। वहीँ भाजपा येदुरप्पा से लेकर बंगारू लक्ष्मण तक किसी भी अपने नेता को या सहयोगी दल के नेता को तिहाड़ जेल की पिकनिक नही करा पायी क्यूंकि उसका मानना है कि वह पवित्र गंगा है और उस पवित्र गंगा में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के कथित दामाद से लेकर पीसी धनिया में घोड़े की लीद मिला कर बेचने वाला कार्यकर्ता पवित्र गंगा के नाम से पवित्र रहता है।
हद तो यहाँ तक हो गयी कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी संजीव भट्ट को शपथ पत्र देने की सजा भुगतनी पड़ रही है। उनको निलंबित कर फर्जी केस गढ़ कर उनके घर में पुलिस द्वारा तोड़ फोड़ की गयी और उनको गिरफ्तार कर पुलिस कस्टडी रिमांड की मांग न्यायालय में की गयी जिस पर न्यायालय ने पुलिस कस्टडी रिमांड के प्रार्थना पत्र को ख़ारिज कर दिया। अडवाणी से लेकर नागपुर मुख्यालय तक किसी भी नेता की नैतिकता जाग्रत नही हुई। संजीव भट्ट की पत्नी ने गृह मंत्री चिदंबरम को पत्र लिखकर संजीव भट्ट की सुरक्षा की मांग की है। इस प्रकरण से पवित्रता का दंभ भरने वाली भाजपा को जरा भी शर्म नही महसूस हुई।

Saturday, September 3, 2011

राम मंदिर के बारे में सही नज़रिया क्या है ?

नफ़रत किसी समस्या का हल नहीं होती
आज एक भाई का लेख पढ़ा जो वास्तव में एक ग़ैर मुस्लिम भाई हैं लेकिन दावा करते हैं कि उन्होंने देवबंद के मदरसे से क़ुरआन और हदीस की तालीम हासिल की है और उनका हाल यह है कि इस्लाम की पारिभाषिक शब्दावली को भी ठीक से नहीं लिख सकते।
एक पोस्ट में उन्होंने वाक़या ए मैराज पर ऐतराज़ जताया है और पैग़ंबर साहब स. को सताने वाले ज़ालिमों को सत्य का पुजारी घोषित कर दिया है।
यह हिंदी ब्लॉगिंग है, यहां कोई भी ब्लॉगर कुछ भी कर सकता है लेकिन हक़ीक़त यह होती है कि वे दूसरों का तो क्या अपना भी भला नहीं कर सकते। जो सत्य को असत्य कह दे नफ़रत की वजह से, उसका भला तब तक हो भी नहीं सकता जब तक कि वह नफ़रत को दिल से निकाल न दे।
हमने उनसे कहा कि
एस. प्रेम जी ! आपके लहजे से इस्लाम और इस्लाम के पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. के लिए कितनी घोर घृणा टपक रही है, इसे हरेक पाठक पहली ही नज़र में जान लेता है।
इस तरह घृणा दिल में रखने के बाद आप किसी भी सच्चाई को नहीं समझ सकते।
मैराज हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पेश आई। उसे बेशक आपने नहीं देखा और आप क़ुबूल भी कर सकते हैं और इंकार भी कर सकते हैं लेकिन हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अरब समाज में बिना सूद क़र्ज़ के लेन देन की व्यवस्था की जो कि आज भी दुनिया के सबसे विकसित देश अपने नागरिकों के लिए नहीं कर पाए हैं।
उन्होंने लड़कियों के जीवित गाड़े जाने की प्रथा का पूरी तरह ख़ात्मा कर दिया।
लोगों को ग़ुलाम आज़ाद करने की प्रेरणा दी।
ग़रीबों और ज़रूरतमंदों का हक़ मालदारों के माल में मुक़र्रर किया जिसे मुसलमान आज उनके जाने के लगभग 1400 साल बाद भी निभा रहा है।
इस तरह के बहुत से काम उनके जीवन में देखे जा सकते हैं।
इन कामों को दुनिया के जिस चिंतक ने भी देखा, उसी ने सराहा।
लेकिन आपने इन सब कामों को नज़रअंदाज़ कर दिया।
जैसे ये काम कुछ भी हैसियत न रखते हों।
ऐसा काम वही आदमी करता है जिसके दिल में कूट कूट कर नफ़रत भरी हो और जिसे सत्य की तलाश न हो।
जिन लोगों ने मुहम्मद साहब को उनके शहर में तरह तरह से तकलीफ़ें बिना बात दीं और फिर मक्का से निकाल दिया, उन्हें आपने सत्य का पुजारी घोषित कर दिया ?
अगर ये सत्य के पुजारी थे तो फिर ये सत्य से क्यों फिर गए और थोड़े दिन बाद ही मुसलमान हो गए। पूरा मक्का ही मुसलमान हो गया और आज तक वहां मुसलमान ही हैं और आज भी वहां बिना सूद के ही लेन देन होता है और ज़कात का सिस्टम आज भी क़ायम है।
आप ख़ुद को ज़्यादा लायक़ समझते हैं तो इससे बेहतर व्यवस्था इस देश में या कम से कम अपने गांव देहात में ही स्थापित करके दिखाएं।
मालिक आप पर दया करे,

आमीन !
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राम मंदिर के बारे में सही नज़रिया क्या है ?
1. जनाब ए आली चुन्नू साहब ! लेखक का दिल ख़ुश हो जाता है जबकि उसके लेख को गहराई से पढ़ ले कोई और आपने हमारा दिल सचमुच ख़ुश कर दिया है और इस ख़ुशी में हम ‘राम मंदिर‘ बनाने लिए भी तैयार हैं और उसमें तन-धन लगाने के लिए भी क्योंकि मन तो पहले से ही लगा हुआ है।
इस बात को हम आज नहीं कह रहे हैं बल्कि जब अयोध्या पर हाई कोर्ट का फ़ैसला भी नहीं आया था हमने तभी कह दिया था कि
‘हम चाहते कि अयोध्या में बने राम मंदिर‘
लेकिन  पहले यह तो जान लीजिये कि 'राम' और रामचंद्र में अंतर क्या है ?
 औरमंदिर किस राम का बनना चाहिए ?
2. दूसरी बात यह है कि मंगोल अब की बात हैं और श्री रामचंद्र जी को हुए 12 लाख 96 हज़ार साल हो चुके हैं एकॉर्डिंग टू पंडितीय कैलकुलेशन, सो आपको पता होना चाहिए कि ऐसे में मंगोल ख़ुद श्री रामचंद्र जी के ही वंशज हुए।
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महासभाई मानसिकता के लोग मुसलमानों में केवल कमियां ही क्यों देखते हैं ?
भाई चुन्नू साहब ! ज़रा ध्यान दीजिए कि हम ऊपर अपने लेख में कह चुके हैं कि मुसलमानों को तौबा करके सुधर जाना चाहिए और सभी लोगों के साथ भलाई का बर्ताव करना चाहिए।
ऐसे में आपका ऐतराज़ जायज़ नहीं है।
...और साथ ही हमने यह भी कहा है कि मुसलमानों को चाहिए कि वे गुनाह से तौबा करके नेकी का जीवन जिएं।

इस तरह की अच्छी बातों से भरी हुई पोस्ट पर भी आपका ऐतराज़ जताना तो यह बताता है कि एक मुसलमान चाहे कितना ही अच्छा और सही लिख ले लेकिन आप जैसे महासभाई मानसिकता के लोग हमेशा उसमें केवल कमियां ही देखेंगे ?
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मुसलमानों पर ऐतराज़ के चक्कर में नशे की हिमायत
चुन्नू भाई साहब ! आप मांस का औचित्य सिद्ध करते हैं तो हमें कोई आपत्ति नहीं है लेकिन आप नशे को भी समाज का अभिन्न अंग बताएं तो हमें आपत्ति है।
नशे से कितने घर तबाह और बर्बाद हैं , अगर आप इस पर एक नज़र डाल लें तो आप कहते कि हां नशा समाज के लिए वर्जित होना चाहिए जैसे कि इस्लाम में है।
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‘शराबन तहूरा‘ अर्थात पवित्र पेय
आपने ख़ुद ही कह दिया है कि जन्नत की शराब दुनिया की शराब से भिन्न होगी।
दरअस्ल पूरा नाम ‘शराबन तहूरा‘ अर्थात पवित्र पेय है। अरबी में शराब हरेक पीने वाली चीज़ के लिए आता है जैसे कि हिंदी में पेय हरेक पीने वाली चीज़ को कहा जाता है। इसके साथ ‘तहूरा‘ शब्द और बढ़ा दिया गया , जिससे किसी को भी ग़लतफ़हमी न रहे लेकिन इसके बावजूद आप ख़ुद तो ग़लतफ़हमी में हों या न हों लेकिन दूसरों को ग़लतफ़हमी में डाल रहे हैं।
पेय पदार्थ को अरबी में 'शराब' कहते हैं और 'तहूरा' का अर्थ पवित्र होता है। हमारा रब जन्नत में 'शराबन तहूरा' अर्थात पवित्र पेय पिलाएगा। इसमें ऐतराज़ कैसा ?
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मुसलमानों पर बेवजह ऐतराज़ क्यों ?
भाई चुन्नू जी ! हमारी समझ में यही नहीं आता कि जब मुसलमान ख़ुद को श्री रामचंद्र जी से नहीं जोड़ते थे तब आप जैसे लोग कहते थे कि मुसलमानों को चाहिए कि वे श्री रामचंद्र जी को अपना पूर्वज मान लें और अब जब हमने मानना शुरू कर दिया है तो आपका फ़र्ज़ था कि आप हमारा हौसला बढ़ाते लेकिन अब आप ऐतराज़ कर रहे हैं कि हम ख़ुद को श्री रामचंद्र जी का वंशज क्यों बता रहे हैं ?
आखि़र आप लोग कन्फ़्यूज़ क्यों हैं ?
आपको पता क्यों नहीं है कि आप मुसलमानों को किस रूप में देखना चाहते हैं ?

धर्म को तो अंबेडकर जी ने भी नहीं नकारा, तब आप क्यों धर्म का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं ?
भाई विनोद हौसलेवाला जी ! धर्म के नाम पर लोगों का शोषण किया गया, उनकी इज़्ज़त लूटी गई और आज भी ये सब धर्म के नाम पर चल रहा है लेकिन आपको जानना चाहिए कि यह सब ‘धर्म के नाम पर किया गया‘, न कि धर्म के अनुसार किया गया।
विरोध पाखंड और ज़ुल्म का किया जाना चाहिए जिसे अधर्म कहा जाता है जबकि आप विरोध कर रहे हैं ‘धर्म‘ का ।
धर्म का विरोध तो कभी बाबा साहब अंबेडकर ने भी नहीं किया।
उन्होंने हिन्दू धर्म की कुरीतियों के विरूद्ध आवाज़ उठाई और जब देखा कि इसे सुधारना संभव नहीं है तो उन्होंने उसका त्याग करके बौद्ध मत ग्रहण कर लिया।
इसके बाद उन्होंने बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रचार किया।
आपकी भाषा में कहा जाय तो उन्होंने ‘बौद्ध धर्म की पीपड़ी बजाई‘।

क्या आप बाबा साहब के लिए ऐसे शब्द बोल सकते हैं।
अगर नहीं बोल सकते तो फिर आप दूसरों के महापुरूषों के लिए भी खिल्ली उड़ाने वाले शब्द न बोलें।
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तर्क कीजिए लेकिन शालीनता से
भाई विनोद हौसलेवाला जी ! आपने अंशु जी के लेख का हवाला तारीख़ के साथ दिया है। यह तरीक़ा पत्र पत्रिकाओं में चलता है नेट पर नहीं। लिंक बनाने का तरीक़ा हमारी एक पोस्ट में सिखाया गया है जिसका लिंक इस पोस्ट में दिया हुआ है।
अंशु जी ने सवाल रामचंद्र जी के बारे में किया और नाम अल्लाह का भी ले दिया।
रामचंद्र जी के बारे में जवाब तलब पहले आप उनसे कर लीजिए जो उनका मंदिर बनाने की मुहिम छेड़कर अरबों रूपया डकार गए हैं और अल्लाह के बारे में कोई ऐतराज़ हो तो सवाल अलग से कर लीजिए।
इंशा अल्लाह आपको जवाब दिया जाएगा।

प्लीज़ चीज़ों को गड्डमड्ड मत कीजिए।
हमने अपील की है कि शालीनता के साथ अपने तर्क पेश करें।
आपने तर्क तो पेश किया लेकिन शालीनता भूल गए ?
जो कि पोस्ट का शीर्षक भी है।
 यह लिंक देखें :

नफ़रत दिल में रखने के बाद आप किसी भी सच्चाई को नहीं समझ सकते

आज एक भाई का लेख पढ़ा जो वास्तव में एक ग़ैर मुस्लिम भाई हैं लेकिन दावा करते हैं कि उन्होंने देवबंद के मदरसे से क़ुरआन और हदीस की तालीम हासिल की है और उनका हाल यह है कि इस्लाम की पारिभाषिक शब्दावली को भी ठीक से नहीं लिख सकते।
एक पोस्ट में उन्होंने वाक़या ए मैराज पर ऐतराज़ जताया है और पैग़ंबर साहब स. को सताने वाले ज़ालिमों को सत्य का पुजारी घोषित कर दिया है।
यह हिंदी ब्लॉगिंग है, यहां कोई भी ब्लॉगर कुछ भी कर सकता है लेकिन हक़ीक़त यह होती है कि वे दूसरों का तो क्या अपना भी भला नहीं कर सकते। जो सत्य को असत्य कह दे नफ़रत की वजह से, उसका भला तब तक हो भी नहीं सकता जब तक कि वह नफ़रत को दिल से निकाल न दे।
हमने उनसे कहा कि 
एस. प्रेम जी ! आपके लहजे से इस्लाम और इस्लाम के पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. के लिए कितनी घोर घृणा टपक रही है, इसे हरेक पाठक पहली ही नज़र में जान लेता है।
इस तरह घृणा दिल में रखने के बाद आप किसी भी सच्चाई को नहीं समझ सकते।
मैराज हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पेश आई। उसे बेशक आपने नहीं देखा और आप क़ुबूल भी कर सकते हैं और इंकार भी कर सकते हैं लेकिन हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अरब समाज में बिना सूद क़र्ज़ के लेन देन की व्यवस्था की जो कि आज भी दुनिया के सबसे विकसित देश अपने नागरिकों के लिए नहीं कर पाए हैं।
उन्होंने लड़कियों के जीवित गाड़े जाने की प्रथा का पूरी तरह ख़ात्मा कर दिया।
लोगों को ग़ुलाम आज़ाद करने की प्रेरणा दी।
ग़रीबों और ज़रूरतमंदों का हक़ मालदारों के माल में मुक़र्रर किया जिसे मुसलमान आज उनके जाने के लगभग 1400 साल बाद भी निभा रहा है।
इस तरह के बहुत से काम उनके जीवन में देखे जा सकते हैं।
इन कामों को दुनिया के जिस चिंतक ने भी देखा, उसी ने सराहा।
लेकिन आपने इन सब कामों को नज़रअंदाज़ कर दिया।
जैसे ये काम कुछ भी हैसियत न रखते हों।
ऐसा काम वही आदमी करता है जिसके दिल में कूट कूट कर नफ़रत भरी हो और जिसे सत्य की तलाश न हो।
जिन लोगों ने मुहम्मद साहब को उनके शहर में तरह तरह से तकलीफ़ें बिना बात दीं और फिर मक्का से निकाल दिया, उन्हें आपने सत्य का पुजारी घोषित कर दिया ?
अगर ये सत्य के पुजारी थे तो फिर ये सत्य से क्यों फिर गए और थोड़े दिन बाद ही मुसलमान हो गए। पूरा मक्का ही मुसलमान हो गया और आज तक वहां मुसलमान ही हैं और आज भी वहां बिना सूद के ही लेन देन होता है और ज़कात का सिस्टम आज भी क़ायम है।
आप ख़ुद को ज़्यादा लायक़ समझते हैं तो इससे बेहतर व्यवस्था इस देश में या कम से कम अपने गांव देहात में ही स्थापित करके दिखाएं।
मालिक आप पर दया करे,

आमीन !
आप शिक्षित और सभ्य हैं। ज्ञान की बात के अवसर पर इस तरह अज्ञान की बातें करना महान आर्य परंपरा पर कलंक लगाना है। अतः आपसे हमारी विनम्र विनती है कि हमारा काम आपसी नफ़रतों को मिटाना है और इसके लिए आपस में एक दूसरे की परंपराओं और मान्यताओं को जानना बहुत ज़रूरी है। हमारे स्वभाव को समझने के लिए आप यह पोस्ट देखिए
हमारा यह प्रयास कैसा लगा ?
आप भी बताइयेगा।
देखिए अलग-अलग लेखकों के कुछ लिंक्स :
1- अच्छी टिप्पणियाँ ही ला सकती हैं प्यार की बहार Hindi Blogging Guide (22)
http://hbfint.blogspot.com/2011/08/hindi-blogging-guide-22.html

2- औरत हया है और हया ही सिखाती है , ‘स्लट वॉक‘ के संदर्भ में
http://hbfint.blogspot.com/2011/08/blog-post_5673.html 
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Thursday, September 1, 2011

लगा दीजिए मंदिरों का माल दलितों और ग़रीब द्विजों के विकास में Masjid E Rasheed, Deoband

देवबंद की मस्जिद ए रशीद
ईद के मौक़े पर हमने देवबंद के बारे में एक पोस्ट लिखी और कहा कि

हिंदू मुस्लिम की मुहब्बत का ताजमहल है देवबंद


लेकिन जो लोग हिन्दू मुस्लिम के प्रेम के दुश्मन हैं, ऐसे मौक़ों पर वे ज़रूर आते हैं। कुछ शरारती तत्व आ गए और पोस्ट के विषय से हटकर क़ुरआन में कमियां बताने लगे।
देखिए उनके ऐतराज़ और हमारे जवाब इस लिंक पर
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/%E0%A4%B9-%E0%A4%A6-%E0%A4%AE-%E0%A4%B8-%E0%A4%B2-%E0%A4%AE-%E0%A4%95-%E0%A4%AE-%E0%A4%B9%E0%A4%AC-%E0%A4%AC%E0%A4%A4-%E0%A4%95-%E0%A4%A4-%E0%A4%9C%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%B2-%E0%A4%B9-%E0%A4%A6-%E0%A4%B5%E0%A4%AC-%E0%A4%A6
भंडाफोड़ू उर्फ बी.एन. शर्मा जी ! ब्लॉगस्पॉट के हमारे ब्लॉग पर तो आपकी आने की कभी हिम्मत नहीं हुई और आप यहां चले आते हैं, ऐसा अन्याय क्यों ?
क़ुरआन में युद्ध के आदेश पर आपके ऐतराज़ को फ़िज़ूल बता रहे हैं स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य जी ।
देखिए उनके कथन का एक अंश और लिंक पर जाकर पढ़िए पूरी किताब।
आपके आने से हम बहुत ख़ुश हैं और इस ख़ुशी का कारण आप ही जैसे विद्वान जान भी सकते हैं। वर्ना हम तो पिछले कई महीनों से बोर हो रहे थे।
आपका सादर धन्यवाद !
स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य जी का महान शोध
मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिर : ।
विदुष्टं तस्य मेधिरास्तेषां ॠवांस्युत्तिर ॥
-ऋग्वेद , मण्डल 1 , सूक्त 11 , मन्त्र 7
भावार्थ - बुद्धिमान मनुष्यों को इश्वर आदेश देता है कि -
साम , दाम, दण्ड , और भेद की युक्त से दुष्ट और शत्रु जनों का नाश करके विद्या और चक्रवर्ती राज्य कि यथावत् उन्नति करनी चाहिये तथा जैसे इस संसार में कपटी , छली और दुष्ट पुरुष वृद्धि को प्राप्त न हों , वैसा उपाय निरंतर करना चाहिये ।
-हिंदी भाष्य महर्षि दयानंद
अत: पैम्फलेट में दी गयी आयतें अल्लाह के वे फ़रमान हैं , जिनसे मुस्लमान अपनी व एकेश्वरवादी सत्य धर्म इस्लाम की रक्षा कर सके । वास्तव में ये आयतें व्यवाहरिक सत्य हैं । लेकिन अपने राजनितिक फायदे के लिए कुरआन मजीद की इन आयतों की ग़लत व्याख्या कर उन्हें जनता के बीच बंटवा कर कुछ स्वार्थी लोग , मुसलमानों व विभिन्न धर्मावलम्बियों के बीच क्या लड़ाई-झगडा करने व घृणा फैलाने का बीज बो नहीं रहे ?

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भंडाफोड़ू उर्फ बी.एन. शर्मा जी ! सोमनाथ के बारे में मुख़बिरी भी तो पंडों ने माल के बंटवारे के लालच में ही की थी ग़ज़नी जाकर महमूद ग़ज़नवी से। वर्ना उसे क्या सपना आ रहा था कि सोमनाथ के मंदिर में इतना बड़ा ख़ज़ाना है जिस पर पंडे ऐश मार रहे हैं।
उसने ग़लत काम किया है लेकिन ग़रीब लोग तो यही कहेंगे कि अगर वह उस ख़ज़ाने को (ग़ज़नी की) आर्य प्रजा के विकास में न लगाता तो वह धन भी केरल के पदमनाभ मंदिर की तरह ही ब्लॉक पड़ा रहता।
आपकी आमदनी पर चोट पड़ी तो आपका चिल्लाना वाजिब है।
हम आपकी पीड़ा समझते हैं।
अब सुधार लीजिए अपनी ग़लतियां और लगा दीजिए मंदिरों का माल हरिजनों और दलितों और ग़रीब द्विजों के विकास में, वर्ना कोई न कोई आकर यह भी लूट लेगा।
लुटेरों को आधा दोष दीजिए और आधा दोष ख़ुद पर भी लगाइये। 
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प्यारे भाई शरद जी ! आपकी ईद की मुबारकबाद हमें दिल से क़ुबूल हैं।
देखिए हम किसी पर सवार नहीं हैं और न ही यहां किसी के ब्लॉग पर जाकर हम आपत्ति कर रहे हैं। इसके बावजूद हमारे ब्लॉग पर लोग आकर मज़ाक़ उड़ा रहे हैं इस्लाम का , ऐसा क्यों ?
हमने ईद के संबंध में एक अच्छी पोस्ट लिखी है और इसमें किसी के धर्म की कोई निंदा नहीं है।
क्या किसी को हक़ बनता है कि वह इतनी साफ़ सुथरी पोस्ट पर आकर ऐतराज़ करे ?
और जब कोई ऐतराज़ करता है तो भी हम चुप रह जाते हैं लेकिन फिर वे लोग बार बार आग्रह करते हैं कि हमें जवाब दो।
ऐसे में हम क्या करें ?

...और सत्य तो वही देखेगा जो निष्पक्ष होकर विचार करेगा।

Saturday, August 13, 2011

हमारे बेटे अमन ख़ान की पैदाइश पर Welcome And Prayer

ब्लॉगर के बेटे के जन्म का चर्चा Amn Khan
अच्छाई और बुराई, दोनों ही ख़सलतें हरेक इंसान के अंदर मौजूद होती हैं।
समाज में अमन तब आएगा जब इंसान के अंदर ईमान आएगा, ईमानदारी आएगी।
ईमानदारी की पहली पहचान यह है कि इंसान जिस बात को अपने लिए पसंद करे , दूसरों के लिए भी वही बात पसंद करे।
जो आदमी किसी को दो बोल शुभकामनाओं के भी न दे सके, वह दूसरों को कुछ और भला क्या दे सकता है ?
...हम ख़ुशनसीब हैं कि हमारे बेटे अमन खान की पैदाइश पर मासूम साहब को ख़ुशी हुई और उन्होंने एक लेख लिखकर अपनी ख़ुशी में बहुत से लोगों को शरीक किया और उन्होंने हमारे बेटे को अपना प्यार और आशीर्वाद दिया। कुछ भाई बहनों ने दूसरी पोस्ट्स पर भी अपनी नेक ख्वाहिशात का इज़्हार किया है।
इसके लिए हम अमन से प्यार करने वाले सभी भाई बहनों के तहे दिल से शुक्रगुज़ार हैं।
अल्लाह हम सबको अमन की राह चलाए और हमारी नस्लों को इसी राह का वारिस बनाए,
आमीन ! 
See my comment : 
http://www.amankapaigham.com/2011/08/blog-post_10.html?showComment=1313279550196#c4068502343906902771